अपना ये हजरतगंज

प्रसंगवश : ज्ञानेन्द्र शर्मा

apana ye hazaratganjमन करता है इस कॉलम को पढ़ने वाले और उनके मित्रों से यह अनुरोध करूं कि इस साल के जितने दिन शेष हैं और उनकी डायरियों के जो पन्ने बचे हैं, उनमें इस बार वे नई इबारत लिखें। वे रोज डायरी भरें और अपनी राजधानी लखनऊ की दुर्दशा का बखान तीन-चार वाक्यों में कर दें। सबसे पहले तो यह लिखें कि हजरतगंज चौराहे पर किसी प्रदर्शन या आंदोलन की वजह से जो जाम लगा था या अव्यवस्था फैली थी तो किस कारण से। तरह-तरह के अांदोलन करने वाले या प्रदर्शन करने वाले कौन थे। वे किस दल से सम्बद्ध थे। उन दलों के नाम डायरी में अंकित कर और उसके आगे लिखें कि आगे जो भी चुनाव होगा, उसमें वे उन्हें वोट नहीं देंगे। 
जिस किसी दल के कारण आम आदमी की सामान्य जिन्दगी में दखल हुआ, जिन्दगी दुश्वार हुई, उनका नाम डायरी में मोटे अक्षरों में लिखें और अपनी प्रतिज्ञा को शब्द दें कि उन्हें किसी हाल में वोट नहीं देंगे। फिर जब वोट डालने की बारी आएगी तो इस डायरी के पन्ने पलटकर ही मतदान केन्द्र तक जाएं। इन दलों की इस राजनीति का जवाब जब तक नहीं दिया जाएगा तब तक इनकी दादागीरी खत्म नहीं होगी। वे सोचते हैं कि सड़क जाम करके वे जनता का ध्यान खींचते हैं, अपनी राजनीति को पुष्पमंडित करते हैं, अपना नाम अखबारों में छपवाकर अपने नेताओं का ध्यान ख्ीांचते हैं यानी अपनी राजनीति चमकाते हैं। अपनी डायरी में जब आप इनका नाम लिखना प्रारम्भ करेंगे तो इनकी नेतागीरी धरी की धरी रह जाएगी और उन्हें अपने किए पर पछतावा होने लगेगा।
हजरतगंज में गांधी प्रतिमा और अब अम्बेडकर प्रतिमा भी इन आंदोलनकारियों के निशाने पर होती हैं। वे इनके इर्दगिर्द जमा होकर शोर मचाते हैं, सारा ट्रैफिक रोक देते हैं, आसपास के लोगों को, खरीदारों को, दुकानदारों को और मजदूरों को रुला देते हैं। तो इनको माफ क्यों किया जाय? जब वे अस्पताल जाने वालों को, मुसीबत के मारे बीमारों को, स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों को, बुजुर्गों को, महिलाओं को नहीं बक्शते तो आप क्यों उन्हें बक्शते हैं? जब उन्हें आप पर दया नहीं आती, आपसे उनकी कोई सहानुभूति नहीं होती तो फिर आप इन्हें क्यों छोड़ें, इन्हें सजा देने की क्यों ना ठानें?
हजरतगंज चौराहे के आसपास पहले से सड़क जाम आम बात है। अब ऊपर से वहीं मुख्यमंत्री का नया कार्यालय बन रहा है। पता नहीं, सरकार के किस विद्वान ने मुख्यमंत्री को अपना कार्यालय इसी हजरतगंज में बनवाने की सलाह दी। जिसने भी दी हो, उसे यह सजा देनी चाहिए कि वह रोज हजरतगंज के चौराहे से अपनी गाड़ी खुद चलाते हुए निकलें। ल्ल