अल्पकाल में ही विदा हो जाती है होली :  हृदयनारायण दीक्षित

होली आई। गई। होली प्रकृति का सौन्दर्य है। साधारण नहीं। अति साधारण। तब प्रकृति अपनी पूरी आभा से खिलती है। यह निरपेक्ष होकर स्वयं को प्रकट करती है। मनुष्य इसे उत्सव रूप में लेते हैं, तो लें या न लें। लेते रहे तो ठीक है। प्रकृति अपनी संपूर्ण अभिव्यक्ति में मनुष्य की परवाह नहीं करती। जीवन के व्यावहारिक लक्ष्य में स्वयं की अभिव्यक्ति हैं। जीवन के सारे कर्म स्वयं को प्रकट करने का माध्यम है। सृष्टि के प्रथम ऊषाकाल से ही प्रकृति के सभी अंग स्वयं को प्रकट करते रहे हैं। वनस्पतियां खिलती हैं, वाद्य खुलते हैं, बुद्धि खुल रही है। ज्ञान का द्वार खुलता है। सांख्य प्रकृति रहस्यों में खुलता है। वेदांत सबको खोलकर एक ही ब्रह्म की अभिव्यक्ति करता है। सारा स्थापत्य अभिव्यक्ति है। गीत, काव्य और सारे सृजन उसी की अभिव्यक्ति हैं। होली स्वयं को खोलने और स्वयं के भीतर प्रकृति का सारा मधुरस पीने की मुहूर्त है। मधुरस अतिरिक्त उल्लास और बोध का संवाहक है। उल्लास दिग्दिगंत फैलता है। दशोदिशाएं रस, रंग, गंध और गीत से भर जाती हैं। लेकिन लोक उल्लास की यह मंगल संधि अल्पकाल में ही विदा हो जाती है। मन करता है कि यह होली सदा रहे लेकिन हम होली की विदाई रोक नहीं सकते। आती है तो जीवन के सारे कोने रस से भर जाते हैं और जाती है तो रिक्ति पैदा करती है।
रिक्त ही अतिरिक्त की माता है। किसी को भी रिक्त होना नहीं सुहाता। अतिरिक्त में सबकी रूचि है। व्याकरण की माने तो ष्रिक्तष् सामान्य खालीपन है और अतिरिक्त असामान्य। रिक्त के पहले अति विशेषण से यही अर्थ निकलता है। लेकिन व्यवहार में सबको अतिरिक्त धन चाहिए, अतिरिक्त प्यार, अतिरिक्त प्रतिष्ठा और अतिरिक्त यश सम्मान प्रतिष्ठा। कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह अतिरिक्त या विशेष खालीपन ही आनंद के आने का स्थान खाली करता है। हम तमाम विचारों, आशा और अभिलाषाओं से भरेपूरे हैं। कमरे में कबाड़ होने से किसी मित्र के लिए जगह नहीं बचती। इसके लिए रिक्त कक्ष चाहिए। प्रकृति रिक्त प्रिय नहीं है। जहां जहां रिक्तता होती है प्रकृति उसे भरने का प्रयास करती है। वायु देव वायु शून्य रिक्त को भरने के लिए ही आंधी के रूप में भागते हैं। यही हाल जल का है। जल भी रस रिक्त को भरने के लिए प्रवाहमान रहते हैं। जान पड़ता है कि प्रकृति की दृष्टि में रिक्त का ध्यान ज्यादा महत्वपूर्ण है। अतिरिक्त का ध्यान स्वाभाविक ही ज्यादा होगा।
प्रकृति सत्य, शिव और सुंदर से भरीपूरी है। लेकिन हमारी बुद्धि में इच्छानुसार तमाम अनुपयोगी और अवांछनीय विचार होते हैं। चित्त में सत्य और शिव सुंदर के लिए स्थान नहीं है। दूर कोई सुंदर गीत गुनगुना रहा है। गीत भीतर घुसने को व्याकुल है लेकिन चित्त भरा है। गीत काव्य के लिए जगह नहीं। आधुनिक ढंग से कहें तो हमारा चित्त ओवरलोडिंग का शिकार है। मोबाइल उपकरण में नाम संक्षिप्त संदेश सहित तमाम आंकड़े भरने की सीमा है। हम नए मित्रों का नाम चित्र डालने के लिए कुछ पुराने नाम काटते हैं, नए को जगह देते हैं। चित्त में भरे अनुपयोगी के प्रति हमारा ध्यान नहीं जाता। फूल की गंध सत्य, शिव के साथ सुंदर भी है लेकिन हम रिक्त नहीं हैं। मित्र ने हमारा हाथ अपने हाथ में लिया है पूरे प्यार के साथ। लेकिन प्रेम के लिए जगह नहीं। प्रेम ऊष्मा भीतर नहीं जाती। एक मित्र द्वारा दूसरे का हाथ पकड़ना आनंदकारी घटना है। तब दोनो मित्रों के मन, बुद्धि और आत्म हाथ की उंगलियों पर उतर आते हैं। हम हाथ हो जाते हैं और आनंद अपनी पूरी वाद्यमंडली के साथ चित्त को आनंदगोत्री बना देता है।
सितार के तारों पर थिरकती उंगलियों और वादक के चेहरे पर आ रहे भावों को देखने के साथ पीने का रस बड़ा है। होली की गंवई फागमण्डली के लोकनृत्य में वादक नर्तक और गायक एक हो जाते हैं। हम रिक्त हों तो सारा आनंद भीतर उतर जाता है। पशु पक्षी भोजन के अलावा सभी भावों में रिक्त रहते हैं। प्यार से देखते ही सरस हो जाते हैं। गाय भैंस य बकरी की पीठ सहलाइए। तब उनकी आखें प्रेम सत्य का झरोखा बन जाती है। कुत्ते अतिरिक्त हैं। मन से ज्यादा खाली हैं। वे प्यार के स्वीकार के लिए ज्यादा तत्पर हैं। लेकिन हम रिक्त नहीं। मन के द्वार खोलिए, खिड़कियां खोलकर देखिए बादल की ओर। पूरी प्रकृति आपके कक्ष में प्रवेश के लिए न जाने कब से तैयार है। वह सीधे फेसबुक पर है। उसका फेसबुक खाता इण्टरनेट या वाई फाई से ही नहीं चलता। बस थोड़ी जगह चाहिए। आने दीजिए- सुप्रभात, चिड़ियों के कलरव, गायों की हलचल, तितली की प्रीतिपूर्ण उड़ान। पृथ्वी और आकाश को मिलता देखे क्षितिज पर। यह प्रेम मिलन का पहला आख्यान है विश्व का। धरती माता और आकाश पिता का मिलन सौभाग्यशाली ही देखते हैं। वे जो रिक्त है। वही अतिरिक्त हैं अतिविशिष्ट।
होली सहित सारे उत्सव रस सृजन के अवसर हैं। अस्तित्व में रस का अनंत अक्षय भंडार है। लेकिन यह रस सबके साझे का है। इसे प्राप्त करने के लिए अपने जीवन में दूसरों को भी साझीदार बनाना होता है। रस प्राप्ति का संधान सरल नहीं है। तैत्तिरीय उपनिषद् के ऋषि ने परम को ष्रसौ वै सःष् गाया है। अस्तित्व के अणु परमाणु में उपस्थित रस प्रतिपल हमारे सामने हैं। उसे सुनिश्चित आस्तिकता और प्रतिपल के अनुसंधान से ही जाना और पाया जा सकता है। हम देखते हैंए देखते समय रस ले सकते हैं। हम छूते हैं, स्वाद लेते हैंए सुनते हैं। इन सबमें रस है। क्या हम इस रस को पहचान सकते हैं। आस्तिकता में बड़ा बल है। फिर रस तो भौतिक प्रपंच ही है। इसे पहचानना कठिन नहीं। हम सबके भीतर भी यह रस नदी नाद जैसा निर्झर बह रहा है। इसी का नाम संवेदना है। संवेदन रसपूर्ण होते हैं और रसपूर्णता संवेदना। रस का स्वाद उल्लास लाता है। उल्लसित जीव बिना गाए या नाचे नहीं रह सकते। तब गीत और नृत्य हमारा चयन नहीं होते। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ईश्वर का गुण बताया हे अर्जुन ईश्वर सभी भूतों के हृदय में उपस्थित है। वही सबको नचाता है। यहां प्रश्न है कि क्यों नचाता है हृदय में उसकी उपस्थिति ही नृत्य कराने के लिए काफी है। ईश्वर बुद्धि में होता तो नृत्य नहीं तर्क कराता।
रिक्ति अनिवार्य है। ऋग्वेद का ऋषि आकाश की ओर देखकर प्रार्थना कर रहा था हे देवो! सभी दिशाओं से हमारे पास सद्विचार आएं।इस स्तुति का मूल बड़ा प्यारा है। हम रिक्त हैं। सद्विचारों के लिए यहां रिक्ति है। वे आएं, किसी भी दिशा या क्षेत्र से आएं। उनका अभिनंदन है। हम सबके हैं। सब हमारे हैं। हमारा रस वैयक्तिक नहीं है। इस रस में सबका साझा है। हम सभी प्राणियों की व्यथा में अश्रुरस बहाते हैं। यह आंसू उनकी व्यथा में बहे, वह आंसू दूसरे की व्यथा में। संसार व्यथा का क्षेत्र भी है लेकिन आंसुओं की मात्रा भी कम नहीं। व्यथा निवारण का रस हैं आंसू। ऐसे ही आंसुओं का पुनर्सृजन काव्य बनता है। वह स-हित होता है। साहित्य कहलाता है। व्यथा की यही बात उल्लास पर भी लागू है। होली का उल्लास रोकने लायक था। इसका रस और कई माह पिया जा सकता था। संभवतः बहुत मित्रों ने यह रस अघाकर पूरी तृप्ति के साथ पिया होगा। मैं अपनी बताता हूूं। जीवन की अस्तव्यस्ता के बीच हमें पता ही नहीं लगा कि कब आई मधुमय फाल्गुनी वायु। उसने कब सहलाया कब बरसा रस और रंग। इसीलिए मन करता है कि होली का पर्व रूके कुछ दिन। थोड़े दिन ही और रहे। जल्दी क्या है? नवसंवत्सर अभी सजधज ही तो रहा है।
                                                                                                                                                                                                                             हृदयनारायण दीक्षित