अविश्वास प्रस्ताव बनाम चुनाव की तैयारी

जितेंद्र शुक्ल देवव्रत

चाहे सत्ता पक्ष या फिर विपक्ष, पता सभी को था कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के बाद जब मतदान होगा तो स्थितियां क्या होंगी। लेकिन इस प्रस्ताव के जरिए सभी विपक्षी दलों के अलावा सत्तापक्ष भी अपना लक्ष्य साधते दिखा। करीब 12 घण्टे की कभी गरम तो कभी नरम बहस और आरोप-प्रत्यारोप के बीच विपक्ष ने जहां केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की नाकामियां गिनायीं तो वहीं सरकार की ओर से न सिर्फ रटा-रटाया उत्तर दिया गया बल्कि 70 सालों का हिसाब भी मांगा गया। हालांकि यह अविश्वास प्रस्ताव प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस नहीं बल्कि कभी भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का हिस्सा रही तेलुगु देशम पार्टी लेकर आयी थी लेकिन बहस के दौरान सत्तापक्ष के नेताओं ने सबसे ज्यादा हमला कांग्रेस पर बोला। यह समझ से परे था कि जब सत्तापक्ष विशेषकर भाजपा कांग्रेस को सबसे कमजोर पार्टी मानती और कहती है तो फिर उसके निशाने पर सिर्फ कांग्रेस ही क्यों? खैर, अविश्वास प्रस्ताव के जरिए जहां विपक्ष को अपनी एकता को परखने का मौका मिला वहीं मतदान में उसे हराकर मोदी सरकार ने जनता के बीच यह संदेश देने का प्रयास किया कि सारे विपक्षी दल मिलकर भी उसका बाल भी बांका नहीं कर पाये। दरअसल भाजपा को इसी साल के अंतिम तिमाही में तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनावों की चिंता खाये जा रही है। कारण यह है कि इन राज्यों में से दो राज्य मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ऐसे हैं जहां भाजपा 15 सालों से सत्ता में है, ऐसे में इन राज्यों में सत्ता विरोधी लहर के संकेत मिल रहे हैं। वहीं राजस्थान में भी उल्टी बयार बह रही है। अब सवाल यह है कि ऐन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यदि भाजपा की सरकारें यहां से विदा हो जाती हैं तो फिर मोदी विरोधी मुखर हो जायेंगे और लोकसभा चुनाव में भाजपा की राह कांटों भरी हो जायेगी। ऐसे में इस बात की भी प्रबल संभावना है कि मोदी सरकार इन तीन राज्यों के साथ ही लोकसभा का भी चुनाव करा सकती है।
भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की साल 2014 में बनी सरकार के कार्यकाल को सवा चार साल का समय हो गया है। इस दौरान सरकार द्वारा लिए गए कई निर्णयों की आलोचना विपक्ष ने खुलकर की और उसे संसद से लेकर सड़क तक घेरा। जब बारी अविश्वास प्रस्ताव की आयी तो फिर विपक्ष ने एकजुट होकर सरकार पर हमला बोला। यह बात सही है कि अविश्वास प्रस्ताव सरकार को गिराने के लिए नहीं बल्कि उसे घेरने के लिए ही लाया गया था। देश का अब तक का संसदीय इतिहास गवाह है कि प्रत्येक अविश्वास प्रस्तावों का उद्देश्य हमेशा सरकारें गिराना नहीं होता। लेकिन कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव के जरिए तमाम महत्वपूर्ण मसलों पर अपनी बात देश की जनता तक पहुंचाने का पुरजोर प्रयास किया। ‘मॉब लिंचिंग’ की बढ़ती घटनाएं, किसानों की आत्महत्याएं, कृषि उपज के कम दाम, फसलों के समर्थन मूल्य (एमएसपी) में अपेक्षित बढ़ोत्तरी न होना, रोजगार की कमी, दलितों व महिलाओं के उत्पीड़न की बढ़ती घटनाएं, महंगाई और अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का भाव जैसे अनेक मुद्दे समीचीन थे जिनको लेकर विपक्ष ने मोदी सरकार को घेरा। मुख्यत: सारी कवायद इसे मौके के रूप में भी भुनाने और ज्यादा से ज्यादा छोटे और क्षेत्रीय दलों को साथ जोड़ने की थी ताकि 2019 में मोदी सरकार के सामने संयुक्त विपक्ष की चुनौती पेश करने के मकसद को हासिल किया जा सके।
हालांकि छोटे दलों के अपने मसले भी हैं जिन्हें अविश्वास प्रस्ताव के जरिये देश के सामने रखने का लोभ वे शायद ही छोड़ पाएंगे। अविश्वास प्रस्ताव लाने वाली टीडीपी ने तो एनडीए से दूरी ही इसीलिए बनाई क्योंकि वह चार साल तक मोदी सरकार में शामिल रहकर भी आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिला सकी। साथ ही उसे विधानसभा चुनाव में नुकसान होने की आशंका सताने लगी थी। इसीलिए अब अविश्वास प्रस्ताव के जरिए अपना चेहरा बचाने का प्रयास किया। आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने की मांग बुलंद कर यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि उसने अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ी। वहीं जेडीयू (जनता दल-एकीकृत) यूं तो एनडीए में है मगर वह भी बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग कर रही है। हालांकि उन्होंने विरोध नहीं किया। उधर, टीआरएस के पास राज्य और केंद्र के बीच धन का सही बंटवारा न होने का मसला था। एआईएडीएमके विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को खत्म करने के खिलाफ है। वह नीट (राष्ट्रीय पात्रता एवं प्रवेश परीक्षा, मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए) से भी नाखुश चल रहा था। वहीं जेडीएस (जनता दल-सेक्युलर) के सामने कावेरी नदी के बंटवारे का मुद्दा है। टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) के पास बंगाल में हिंसा का मुद्दा था। पर, एआईएडीएमके का सरकार के साथ आना एनडीए के लिए अच्छा संकेत है तो बीजेडी का वॉकआउट करना विपक्ष खासकर कांग्रेस के लिए झटका है क्योंकि उसने बीजेपी और कांग्रेस दोनों से समान दूरी अपनाई। एआईएडीएमके के साथ आने की वजह से ही सरकार के पक्ष में 325 वोट मिले, जबकि अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में सिर्फ 126 वोट ही मिले। सहयोगी शिवसेना का वोटिंग से दूर रहना सरकार के लिए झटका रहा। अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्षी दलों के वक्ताओं ने सरकार को घेरने, कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन खुद इनके आपसी मतभेद भी खुलकर जाहिर हुए। खुद अविश्वास प्रस्ताव लाने वाली टीडीपी सरकार के साथ-साथ कांग्रेस पर हमलावर रही। यह समझना मुश्किल था कि पार्टी किसके खिलाफ ज्यादा हमलावर है, बीजेपी या कांग्रेस के। टीडीपी ने कांग्रेस पर आंध्र प्रदेश के अवैज्ञानिक बंटवारे का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला। उधर, टीएमसी ने बहस के दौरान जहां मोदी सरकार पर करारा हमला बोला वहीं फिर संकेत दे दिया कि आने वाले आम चुनाव क्षेत्रीय दलों का है। पार्टी नेता सौगत राय ने कहा कि अगला चुनाव सीट दर सीट होने वाला है, जिसमें क्षेत्रीय दल अहम भूमिका निभाएंगे। वहीं विश्वासमत से पहले शिवसेना उलझन में दिखी। बहस से ठीक पहले उसने पूरी कार्यवाही से खुद को अलग कर लिया। शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में सरकार पर करारा हमला करने से गुरेज नहीं किया। वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार ने इस मौके का फायदा अपनी उपलब्धियों के प्रचार के लिए उठाया। विपक्ष पर स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जमकर हमला बोला और 2019 की भिड़ंत का एजेंडा सेट किया। उधर, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भाजपा समेत पूरे संघ परिवार पर सीधा हमला बोला और कहा कि प्रधानमंत्री सामने बैठे होने के बावजूद उनकी आंखों से आंखें नहीं मिला पा रहे क्योंकि सच्चे नहीं रह गये हैं।
नतीजा यह हुआ कि नरेंद्र मोदी की चार साल पुरानी सरकार ने अपनी पूर्व सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को भारी संख्या बल से गिरा दिया। अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में सिर्फ 126 वोट ही मिले जबकि इसके खिलाफ 325 वोट पड़े और इस तरह सदन ने नरेंद्र मोदी सरकार में विश्वास प्रकट किया। इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि सत्ता व विपक्ष दोनों को पता चल गया कि संकट की घड़ी में कौन उनके साथ रहने वाला है और कौन नहीं। लोगों ने यह भी देख ही लिया कि अपराजेय संख्या बल के बावजूद भाजपा इसके खेल में उपचुनावों में हार से पैदा हुए इस अहसास से डरी-डरी दिखी कि मोदी की तथाकथित लहर या सुनामी अब शांत पड़ चुकी है और 2019 में सत्ता में वापस आना है तो उसे कुछ नया करना होगा। अब भाजपा नेतृत्व और स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विपक्षी दलों की कथित एकता और देश के माहौल के हिसाब से अब यह तय करने में जुटे हैं कि आखिर चुनावों में जाना कब मुफीद रहेगा।