आदर्श स्थापित करेगा सदन

रामकुमार सिंह
कवि, पत्रकार, साहित्यकार, समाजसेवी, जनप्रतिनिधि, मृदुभाषी, सहृदय, सादगी ही जिनकी पहचान हो ऐसी न जाने कितनी और ढेर सारी विशेषताएं किसी एक व्यक्ति में हों, तो उसे विरला ही कहा जा सकता है। उप्र की राजधानी लखनऊ से सटे एक छोटे से जिले उन्नाव की पुरवा तहसील के छोटे से लउवा गांव में जन्में हृदय नारायण दीक्षित जो स्वयं शब्दों के जादूगर हैं, के व्यक्तित्व के बारे में लिखने के लिए कई बड़े विद्वान भी शब्द विहीन हो जायें तो अचरज करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने अपने गृह जनपद में विभिन्न जनमसभाओं को लेकर कई आन्दोलन किए। जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्षों का सफर तय करते हुए अब विधानसभा के सर्वोच्च आसन यानि अध्यक्ष की पीठ पर विराजमान हो चुके हैं। श्री दीक्षित की छवि न सिर्फ एक बेदाग नेता के रूप में हैं, बल्कि वह सभी दलों के बीच बेहद लोकप्रिय भी हैं और उनका सम्मान भी सभी दलों के नेता करते हैं।
1972 में जिला परिषद उन्नाव के सदस्य बनने वाले श्री दीक्षित वर्ष 1985 में पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़कर विधायक बने थे। इसके बाद 1989 में जनता दल, 1991 में जनता पार्टी और 1993 में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के रूप में जीतकर विधानसभा पहुंचे। श्री दीक्षित सपा-बसपा गठबन्धन सरकार में 1995 में संसदीय कार्य एवं पंचायती राज मंत्री रह चुके हैं। वर्ष 2010 से जून 2016 तक भाजपा विधान परिषद सदस्य और दल नेता भी रहे। यदि भाजपा संगठन की बात की जाये तो वह उन्नाव के जिलाध्यक्ष से लेकर प्रदेश उपाध्यक्ष, प्रवक्ता और राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य भी रह चुके हैं। वहीं आपातकाल के दौरान वह 19 महीने जेल में भी रहे थे।
इस बार के चुनाव में उन्होंने उन्नाव के भगवंतनगर से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की है। मुख्यमंत्री योगी के शपथ ग्रहण समारोह में हृदयनारायण दीक्षित को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया था। तभी से यह माना जा रहा था कि वह विधानसभा अध्यक्ष बनेंगे। बाद में उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष के लिए अपना नामांकन किया। इस पद के लिए दूसरे किसी नेता ने नामांकन नहीं किया। इसके बाद से ही तय हो गया था कि श्री दीक्षित ही विधानसभा अध्यक्ष होंगे। बाद में इसकी औपचारिक घोषणा भी हो गई। विधानसभा में पहले ही दिन श्री दीक्षित ने पूर्व से चली आ रही ब्रिटिश लोकतंत्र की परम्परा कि विधान सभा अध्यक्ष को चुनाव के उपरान्त नेता सदन और नेता प्रतिपक्ष द्वारा उन्हे खोज कर पीठासीन किए जाने की परम्परा का त्याग कर नयी परम्परा डाली। वेद और भारतीय संस्कृति का गहरा अध्ययन करने वाले श्री दीक्षित की इन विषयों पर कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, वहीं वह स्तम्भकार भी हैं और अब तक उनके चार हजार आलेख विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा वह पत्रकारिता जगत के कई सम्मानों से भी सम्मानित हो चुके हैं। विधानसभा अध्यक्ष चुने जाने के बाद उन्हें बधाइयां देने को भारी भीड़ उमड़ी। इसी दौरान अध्यक्ष बनने के प्रथम दिन ही उन्होंने अपने व्यस्ततम क्षणों में से समय निकाल कर ‘दस्तक टाइम्स’ के सम्पादक रामकुमार सिंह से विभिन्न विषयों पर चर्चा की।

राजनैतिक जीवन की शुरूआत कैसे हुई?
मेरे तरुणाई के कालखण्ड में पुलिस, गुण्डों व सामंतों की बर्बरता चरम पर थी। उसी से आक्रोशित होकर मैंने जनसंगठन किया और इसके खिलाफ जनान्दोलन किया। तब मन में कोई भी राजनैतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं थी। किसी दल का साथ भी नहीं था। तब मैं स्नातकोत्तर कर रहा था। हमारे आन्दोलनों से प्रशासन पर प्रभाव हुआ और दबाव भी बना। चीजों में सुधार आना शुरू हुआ। गरीबों की बात सुनी जाने लगी। मैं जिस गांव का हूं वहां कोई भी शिक्षित नहीं था, यहां तक कि मेरे माता-पिता भी। मैंने अर्थशास्त्र से एमए किया। वैसे, मुझे पढ़ने में बहुत रूचि थी, सिर्फ कोर्स ही नहीं प्रकृति के रहस्यों का जानने की उत्सुकता बहुत अधिक थी। इसलिए मैं पढ़ता बहुत था। इस दौरान जिला परिषद उन्नाव में सदस्य चुना गया और फिर 1985 में निर्दलीय विधायक।
तब से अब मैं राजनीति में कितना बदलाव आया है, क्या वास्तव में राजनीति बदल गयी है?
बेशक, राजनीति बदली है। केवल राजनीति नहीं बदलती। समाज में कोई व्यवस्था एकहरी नहीं होती। समय के साथ बहुत सी चीजों में बदलाव आया है। अब तो पहले की तरह कथा और पूजा भी नहीं होती। समाज में बदलाव आया और सामाजिक स्थितियों-परिस्थितियों में भी। राजनीति भी समाज का एक हिस्सा ही है। व्यापार बदला, सरोकार बदला यानि हर चीज बदल गयी। ऐसे में जब हर चीज बदली है तो राजनीति भी बदलेगी ही। हां, पहले लोग गांधी, लोहिया, तिलक, पटेल को अपना आदर्श मानते थे। मैं भी गांधी से बहुत प्रभावित था और आज भी हूं। लोग इन्हें देखकर अपने जीवन को गढ़ते थे। अब उस तरह का प्रभाव लोगों पर कम पड़ता है। लोग गांधी के विचारों से प्रभावित तो होते हैं लेकिन उनके जैसी जीवन शैली नहीं अपना पाते। धन का प्रभाव भी बढ़ा है।
आप उच्च सदन में भी रहे हैं और अब तो विधानसभा के अध्यक्ष हैं। क्या आपको लगता है कि सदन की गरिमा कम हुई है?
नहीं, मैं यह नहीं मानता। सदन की गरिमा कम नहीं हुई है। हां, यह बात भी जरूर है सदन में किसी क्षण कोई घटना घटित हो गयी, कोई उत्तेजना आ गयी उस समय जो कुछ अप्रिय घटित हुआ उस क्षण के लिए आप कह सकते हैं कि सदन आहत हुआ। लेकिन पूरे सदन की गरिमा कम हुई, ऐसा मैं नहीं मानता। ऐसा इसलिए नहीं मानता क्योंकि भारत के राष्ट्र जीवन में ऋग्वेद की रचना में पहले से विचार विमर्श की परिपाटी है। तब भी सभा और समितियों की परि दुनिया की किसी भी सभ्यता में आस्था पर प्रश्न उठाने की अनुमति नहीं है। लेकिन यहां ईश्वर पर भी प्रश्न उठाये जाते हैं। हमारे वेदों में प्रश्न को देवता कहा गया है। संसदीय जनतंत्र का जनक इग्लैण्ड नहीं, यह भारत में तो पहले से था। बल्कि महाभारत के एक पर्व का नाम ही सभा पर्व है। हमारे देश में लोकतंत्र की नींव बहुत ही गहरी और मजबूत है। हमारे राष्ट्रीय जीवन में सभा और सभा अध्यक्ष के बीच किसी प्रकार का अन्र्तद्वन्द व अन्तर्विरोध नहीं दिखाई पड़ता है। दुनिया के सबसे पुराने ग्रन्थ ऋग्वेद में लिखा है कि सभापति का स्थान शिव के समान है और हमारे देश की धरती पर इस देश की परम्परा में, यहां के ज्ञान, प्रज्ञान व अनुभूति में जो सभापति है वह शिव की तरह है तो अध्यक्ष को यूरोपीय परिपाटी की तरह कहीं छुपने, घुसने व भागने की आवश्यकता नहीं है। राजा सभा में वैसे ही जाता है जैसे आकाश से कहीं से बहता हुआ निर्झर जल, इसलिए सभा कितनी महत्वपूर्ण है कि राजा भी वहां जाता है तो झुकता है।
नये सदस्यों से क्या संदेश देंगे?
खूब पढ़ें नये हों या पुराने। सभी क्षेत्र की जनता के चुने हुए हैं, जनता ने उन्हें प्रतिष्ठित बनाया है। ऐसे में उन्हें अतिरिक्त श्रम करना चाहिए। उन्हें आठ के बजाये दस घण्टे काम करना चाहिए। वे कानून बनाने की प्रक्रिया में, प्रश्न करने की प्रक्रिया में, वाद विवाद संवाद में हिस्सा लें। क्षेत्र की समस्यायें उठायें।
क्या सदन आज भी सार्थक बहस और जनहित से जुड़े मुद्दो पर चर्चा का मंच है?
जी हां, सदन आज भी सार्थक बहस और चर्चा का मंच बिल्कुल है। संविधान ने केन्द्र व राज्य की सरकार को सदन के प्रति जवाबदेह बनाया है। सरकार का इससे फायदा होता है। जब कोई प्रश्न सदन में विपक्ष की तरफ से आता है तो सरकार को भी अपनी कमियों का पता चलता है। यह सरकार की निंदा नहीं होती। सदनों का चलना, ज्यादा समय तक चलना, नियमानुसार चलना यह आवश्यक है। इससे प्रशासनिक तंत्र में सक्रियता आती है और जड़ता टूटती है। सदन का कोई विकल्प नहीं है।
क्या सदन की बैठक बुलाना रस्म अदायगी सरीखा हो गया हैं क्यों ऐसा पूर्व की कुछ सरकारों में परिलक्षित हुआ है?
अब मैं विधानसभा अध्यक्ष पद पर आसीन हो चुका हूं, इसलिए पूर्व की सरकारों पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। हां, कुछ सरकारों में ऐसी इच्छा कम दिखायी देती थी। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चाहते हैं कि सदन चले। जबकि वैसे मुख्यमंत्री लोग चाहते रहे हैं कि सदन न चले ताकि आलोचना न हो। मुख्यमंत्री तो तैयार हैं खूब सदन चले, खूब बहस हो। यही इच्छा अन्य दलों ने भी व्यक्त की है। मेरी आपकी प्रतिष्ठित पत्रिका के माध्यम से सभी दलों का आहवान करता हूं कि उप्र के सदन और विधानसभा को सभी मिलकर इतना सुन्दर बनायें। देशभर की अन्य विधानसभाओं में यह संदेश जाये कि उप्र में ज्यादा बहस होती है, ज्यादा गुणवत्तापूर्ण बहस होती है। यहां ज्यादा शालीन व्यवहार होता है, शिष्टाचार होता है, यह संदेश अन्य विधानसभाओं को जाये और उप्र विधानसभा सभी का प्रेरणास्त्रोत बने। सत्ता पक्ष भी इसके लिए तैयार हो और विपक्ष भी तो फिर बाधा कहां है।
विपक्षी सदस्यों द्वारा सदन में हंगामा और व्यवधान पैदा किया तो क्या आप उन्हें सदन से बाहर करने जैसा कदम उठायेंगे?
यह अभी काल्पनिक सवाल है। दरअसल, हंगामा तब होता है जब वाद-विवाद का अवसर नहीं मिलता है। उसके शब्द क्रोध में संकुचित हो जाते हैं। हम कोशिश करेंगे कि हर सदस्य को बोलने दिया जाये। उनके शब्दों को कम न किया जाये। मीडिया भी सदन के भीतर के सत्य, शिव व सुन्दर को ज्यादा हाईलाइट करे। विधानसभा के भीतर जो सुन्दर बोल रहा हो उसे मीडिया में स्थान मिलना चाहिए। मैं कई बार बहुत अच्छा बोला पर मीडिया में कहीं नहीं छपा। वैसे मैं आपको एक संदर्भ बताऊ कि जब मैं सदन में नया-नया आया था, तो चूंकि पढ़ने-लिखने का खूब शौक था तो खूब बोलता था, वर्तमान समय के स्वतंत्र भारत के संपादक ज्ञानेन्द्र शर्मा ने हमारा भाषण सुनकर सलाह दी कि आप अखबार में लिखा करें और मैंने पत्र-पत्रिकाओं में लिखना वहीं से प्रारंभ किया।
(साथ में जितेन्द्र शुक्ला)

साहित्य यात्रा
’ ऋग्वेद और डा0 रामबिलास शर्मा। (शिल्पायन प्रकाशन दिल्ली)
ऋग्वेदकालीन समाज, संस्कृति, सभ्यता, अर्थव्यवस्था आदि विषयों पर हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक डॉ0 रामविलास शर्मा की दृष्टि का आलोचनात्मक अध्ययन।
’ मधुविद्या (वी0एल0 मीडिया सोल्यूशन्स, दिल्ली।
वैदिक समाज और दर्शन की अनुभूतियों पर आधारित निबंध
’ सांस्कृतिक राष्ट्रदर्शन। (शिल्पायन प्रकाशन दिल्ली)
भारतीय राष्ट्रभाव के मूलस्रोत, राष्ट्रभाव का विकास, राष्ट्रभाव और राष्ट्रीय एकता के बाधक तत्वों का विवेचन। वैदिककाल से लेकर अब तक के सांस्कृतिक राष्ट्रभाव का दर्शन दिग्दर्शन
’ भारतीय संस्कृति की भूमिका। (विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी)
भारतीय संस्कृति के मूलस्रोत ऋग्वेद और उसके पहले के समाज का अध्ययन। ऋग्वेद के परवर्ती वांग्मय अथर्ववेद, ब्राह्मण उपनिषद्, महाभारत-गीता आदि के संस्कृति तत्वों का विवेचन। भारतीय संस्कृति के प्रवाह से जुड़ी संस्थाओं का अध्ययन।
’ भगवद्गीता (लोकहित प्रकाशन, लखनऊ)
गीता के प्रत्येक श्लोक को ऋग्वेद से लेकर उत्तरवैदिक काल होते हुए आधुनिक संदर्भों तक समझने का प्रयास। गीता के मुख्य विषयों पर अलग से 9 स्वतंत्र अध्याय।
’ सांस्कृतिक अनुभूति राजनीतिक प्रतीति। (विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी)
सांस्कृतिक अनुभूति से जुड़ी राजनीति और संस्कृतिविहीन राजनीति के सरोकारों से जुड़े निबंधो का संकलन।
’ भारतीय समाज राजनैतिक संक्रमण। (विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी)
आधुनिक राजनीति का विवेचन और समाज पर उसके प्रभाव से जुड़े विश्लेषण पर लिखे गये निबंधों का संकलन।
’ जम्बूद्वीपे भरतखण्डे। (लोकहित प्रकाशन, लखनऊ)
विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित राष्ट्रवाद, अल्पसंख्यकवाद और दुनिया के मूलभूत प्रश्नों से जुड़े लेखों का संकलन।
’ संविधान के सामन्त। (पुस्तक पथ, वाराणसी)
दैनिक जागरण में प्रकाशित संवैधानिक संस्थाओं के अपमान से जुड़े लेखो का संकलन।
’ पं0 दीनदयाल उपाध्याय दर्शन, अर्थनीति, राजनीति। (पुस्तकपथ प्रकाशन, दिल्ली)
ऋग्वेद से लेकर शंकराचार्य तक के दर्शन व उपाध्याय जी के एकात्म मानव दर्शन का अध्ययन। अथर्ववेद, महाभारत और कौटिल्य से होते हुए उपाध्याय जी की अर्थनीति का अध्ययन। महाभारत, कौटिल्य और गांधी से होते हुए उपाध्याय जी की राजनीति का अध्ययन।
’ तत्वदर्शी पं0 दीनदयाल उपाध्याय। (पं0 दीनदयाल उपाध्याय प्रकाशन लखनऊ)