आरएसएस की अविराम एवं भाव यात्रा का ध्येय पथ

पुस्तक समीक्षा
ध्येय पथ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक
लोकेन्द्र सिंह
जनसंचार माध्यमों में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंध में भ्रामक जानकारी आती है, तब सामान्य व्यक्ति चकित हो उठते हैं, क्योंकि उनके जीवन में संघ किसी और रूप में उपस्थित रहता है, जबकि आरएसएस विरोधी ताकतों द्वारा मीडिया में संघ की छवि किसी और रूप में प्रस्तुत की जाती है। संघ ने लंबे समय तक इस प्रकार के दुष्प्रचार का खण्डन नहीं किया। अब भी बहुत आवश्यकता होने पर ही संघ अपना पक्ष रखता है। दरअसलए इसके पीछे संघ का यह विचार रहा। कथनी नहीं, व्यवहार से स्वयं को समाज के समक्ष प्रस्तुत करो। विजयदशमी, 1925 से अब तक संघ के स्वयंसेवकों ने यही किया। परिणामस्वरूप सुनियोजित विरोध, कुप्रचार और षड्यंत्रों के बाद भी संघ अपने ध्येय पथ पर बढ़ता रहा। इसी संदर्भ में यह भी देखना होगा कि जब भी संघ को जानने या समझने का प्रश्न आता है तब वरिष्ठ प्रचारक यही कहते हैं। संघ को समझना है, तो शाखा में आना होगा। अर्थात् शाखा आए बिना संघ को नहीं समझा जा सकता। संभवतः प्रारंभिक वर्षों में संघ के संबंध में द्वितीयक स्रोत उपलब्ध नहीं रहे होंगे, यथा – प्रामाणिक पुस्तकें। जो साहित्य लिखा भी गया था, वह संघ के विरोध में तथाकथित प्रगतिशील खेमे द्वारा लिखा गया। संघ स्वयं भी संगठन के कार्य में निष्ठा के साथ जुड़ा रहा। प्रसिद्धिपरांगमुखता की नीति के कारण प्रचार से दूर रहा। किंतु, आज संघ के संबंध में सब प्रकार का साहित्य लिखा जा रहा है, उपलब्ध है। यह साहित्य हमें संघ का प्राथमिक और सैद्धांतिक परिचय तो दे ही देता है। इसी क्रम में एक महत्वपूर्ण पुस्तक है -ध्येय पथ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक। पुस्तक का संपादन लेखक एवं पत्रकारिता के आचार्य प्रो. संजय द्विवेदी ने किया है। यह पुस्तक संघ पर उपलब्ध अन्य पुस्तकों से भिन्न है। दरअसल, पुस्तक में संघ के किसी एक पक्ष को रेखांकित नहीं किया गया है और न ही एक प्रकार की दृष्टिकोण से संघ को देखा गया है। पुस्तक में संघ के विराट स्वरूप को दिखाने का एक प्रयास संपादक ने किया है। सामग्री की विविधता एवं विभिन्न दृष्टिकोणध्विचार ध्येय पथ को शेष पुस्तकों से अलग दिखाते हैं।
संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने संघ की दशक की यात्रा का निकट से अनुभव किया है, इसलिए उनके संपादन में इस यात्रा के लगभग सभी पड़ाव शामिल हो पाए हैं। चूँकि संघ का स्वरूप इतना विराट है कि उसको एक पुस्तक में प्रस्तुत कर देना संभव नहीं है। इसके बाद भी यह कठिन कार्य करने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक भ्रम के उन जालों को भी हटाने का महत्वपूर्ण कार्य करती है, जो हिटलर के प्रचार मंत्री गोएबल्स की संतानों ने फैलाए हैं। इस संबंध में संपादक प्रो. द्विवेदी की संपादकीय के शुरुआती पैराग्राफ से होकर गुजरना चाहिए। उन्होंने लिखा हैण् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ऐसा क्या है कि वह देश के तमाम बुद्धिजीवियों की आलोचना के केंद्र में रहता है। ऐसा क्या है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी उसे संदेह की नजर से देखता है। बिना यह जाने की उसका मूल विचार क्या है। आरएसएस को न जानने वाले और जानकर भी उसकी गलत व्याख्या करने वालों की तादाद इतनी है कि पूरा सच सामने नहीं आ पाता। आरएसएस के बारे में बहुत से भ्रम हैं। कुछ तो विरोधियों द्वारा प्रचारित हैं तो कुछ ऐसे हैं जिनकी गलत व्याख्या कर विज्ञापित किया गया है। आरएसएस की काम करने की प्रक्रिया ऐसी है कि वह काम तो करता है, प्रचार नहीं करता। इसलिए वह कही बातों का खंडन करने भी आगे नहीं आता है। ऐसा संगठन जो प्रचार में भरोसा नहीं करता और उसके कैडर को सतत प्रसिद्धि से दूर रहने का पाठ ही पढ़ाया गया है, वह अपनी अच्छाइयों को बताने के लिए आगे नहीं आता, न ही गलत छप रही बातों का खंडन करने का अभ्यासी है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आरएसएस के बारे में जो कहा जा ता है, वह कितना सच है।
ध्येय पथ ऐसे ही अनेक प्रश्नों के उत्तर हमारे सामने प्रस्तुत करती है। संघ की वास्तविक तस्वीर को हमारे सामने प्रस्तुत करती है। संघ को बदनाम करने में संलग्न विरोधी ताकतों के झूठ उजागर करने का महत्वपूर्ण कार्य इस पुस्तक ने किया है। आजकल बड़े जोर से एक झूठ बोला जा रहा हैए बल्कि उस झूठ के सहारे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके कार्यकर्ताओं की देशभक्ति को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में संघ ने हिस्सा नहीं लिया, अपितु उसके पदाधिकारियों ने अपने कार्यकर्ताओं को आंदोलन का हिस्सा बनने से रोकने के प्रयास किए। देश की स्वतंत्रता में संघ का कोई योगदान नहीं है। संघ एक राष्ट्रनिष्ठ संगठन है। संघ के स्वयंसेवक देश के गौरव के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा सकते हैं। समाज में संघ की ऐसी छवि बन गई है। सशक्त छवि। संघ और उसके स्वयंसेवक देशभक्ति के पर्याय हो गए हैं। ऐसे में संघ विरोधी ताकतों ने स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित उक्त झूठ को अपना हथियार बना लिया है। यह ताकतें बार-बार संघ को इस हथियार से क्षत-विक्षत करने का प्रयास कर रही हैं। ध्येय पथ ने अपने शुरुआती अध्याय में ही संघ विरोधी ताकतों के इस हथियार को कुंद करने का बंदोबस्त कर दिया है। स्वतंत्रता संग्राम एवं संघ अध्याय में वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष बल्देवभाई शर्मा, डॉ. मनोज चतुर्वेदी और राजेन्द्र नाथ तिवारी के आलेखों में प्रमाण और संदर्भ सहित यह सिद्ध किया गया है कि संघ और उसके स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता आंदोलन में न केवल हिस्सा लियाए अपितु अपने स्तर पर भी ब्रिटिश सरकार का विरोध किया। संघ की देशभक्ति ने ब्रिटिश सरकार के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी थीं।
इतिहास विकास एवं भावयात्रा अध्याय में कुछ ग्यारह आलेख शामिल हैंए जिनमें प्रख्यात बुद्धिजीवी केएन गोविन्दाचार्य का लेख भी शामिल है। गोविन्दाचार्य संघ की यात्रा के सहयात्री भी रहे हैं। इसलिए जब वह लिखते हैं कि संघ की यह यात्रा श्रचना और सृजन की अविराम यात्राश् हैए तो शब्द कहीं अधिक जीवंत होकर उनके कथन के साक्षी बनते हैं। गोविन्दाचार्य का यह लेख और इस अध्याय में शामिल अन्य लेख संघ के इतिहासए उसके उद्देश्यए कार्यप्रणाली और उसके स्वरूप से परिचित कराने का कार्य करते हैं। इसके आगे के अध्याय में आरएसएस के श्सामाजिक योगदानश् की चर्चा की गई है। यह ज्ञात तथ्य है कि नित्य समाजसेवा करने वाला दुनिया का एकमात्र संगठन संघ ही है। देशभर में संघ की प्रेरणा से डेढ़ लाख से अधिक सेवा कार्य संचालित किए जा रहे हैं। संघ के सेवा विभाग की वेबसाइट श्सेवागाथा डॉट ओआरजीश् पर उपलब्ध आंकड़े के अनुसार सेवाकार्यों की संख्या लगभग एक लाख सत्तर हजार है। संघ का मानना है कि वास्तविक एवं स्थायी परिवर्तन समाज जागरण से ही संभव है। इसलिए वह श्व्यक्ति निर्माणश् के कार्य को ही अपना मुख्य कार्य मानता है। समाज को जागृत करनेए समाज में समरसता बढ़ानेए समाज का सशक्त एवं स्वावलंबी बनाने में संघ की भूमिका का सम्मान स्वयं महात्मा गांधी ने भी किया है। एक लेखक वर्ग ने संघ के प्रति अपने राजनीतिक दुराग्रह एवं पूर्वाग्रहों के कारण समाज में उसके योगदान को कभी रेखांकित नहीं किया। राजनीतिक असर इस कदर था कि तटस्थ लेखकों का ध्यान भी संघकार्यों के प्रति नहीं गया। प्रख्यात साहित्यकार एवं कवि डॉण् देवेन्द्र दीपक ने अपने आलेख श्राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदीश् में इस ओर संकेत किया है। उन्होंने लिखा है कि राज्यसभा सदस्य पंण् बनारसीदास चतुर्वेदी ने श्साप्ताहिक हिन्दुस्तानश् में छपे अपने लेख में विभिन्न संस्थानों की हिंदी सेवा की विस्तार से चर्चा की। इस लेख को पढ़कर जब डॉण् दीपक ने उनको पत्र लिख कर यह जानना चाहा कि उन्होंने हिंदी के विस्तार में संघ के योगदान का उल्लेख क्यों नहीं कियाघ् तब पंण् बनारसीदास चतुर्वेदी ने इसे अपनी चूक मानते हुए अपने उत्तर में लिखा थाण् श्राजनीतिक कारणों से ध्यान उधर नहीं जाता।श् इसी प्रकार का एक और उदाहरण आता हैए जब डॉण् दीपक ने हिंदी साहित्य सम्मेलनए प्रयाग के शताब्दी वर्ष पर प्रकाशित स्मारिका में श्राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदीश् विषय पर लेख लिखने का प्रस्ताव दिया। इस संबंध में उन्हें जो उत्तर प्राप्त हुआए वह संघ के प्रति राजनीतिक दबाव को भी प्रकट करता हैण् श्सरए क्षमा करें। हमारी ग्रांट बंद हो जाएगी।श् बहरहालए हिंदी के विस्तार में संघ का जो योगदान हैए वह अनुकरणीय है।

संघ की जब शुरुआत हुई तो उसमें मराठी भाषा कार्यकर्ता अधिक थे, तब भी संघ का समूचा कार्य हिंदी में ही होता था। तृतीय वर्ष के संघ शिक्षावर्ग में देश के लगभग सभी प्रांतों से स्वयंसेवक प्रशिक्षण हेतु आते हैं। सबका प्रशिक्षण हिंदी भाषा में होता है। संघ ने प्रारंभ से ही बिना किसी आंदोलन और प्रचार के हिंदी का विस्तार किया है। उल्लेखनीय है कि संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने दो मार्चए 1950 को रोहतक में हरियाणा प्रांतीय हिंदी सम्मेलन में हिंदी को विश्वभाषा बनाने का आह्वान किया था। यहाँ यह भी समझना आवश्यक होगा कि संघ हिंदी को राष्ट्रभाषा एवं विश्वभाषा बनाने का आग्रही हैए किंतु भारतीय भाषाओं की मजबूती का भी पक्षधर है। संघ मातृभाषाओं में शिक्षा एवं संवाद का हिमायती है। यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा कि मेरे गुरुजी सुरेश चित्रांशी अकसर मुझे बताते हैं कि जब देश में आपातकाल थोपा गया थाए तब संघ के कार्यकर्ताओं को खोजण्खोज कर जेल में डाला जा रहा था। उन्हें प्रताडि़त किया जा रहा था। यातनाएं दी जा रही थीं। पुलिस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह रहता था कि संघ के स्वयंसेवक की पहचान कैसे होए संघ के कार्यकर्ता पर कोई पहचान पत्र तो होता नहीं और न ही संघ में उनका पंजीयन होता है। ऐसे में कई कार्यकर्ता अपने हिंदी उच्चारण के कारण में पकड़े गए। यानी भाषा से उनकी पहचान की गई।

संगठनात्मक योगदान अध्याय में संघ के प्रचारक मुकुल कानिटकर का महत्वपूर्ण लेख शामिल है, जिसमें उन्होंने भारतीय शिक्षण मंडल का विस्तृत परिचय दिया है। यह मात्र एक संगठन का परिचय नहीं है, बल्कि एक झलक है कि संघ की प्रेरणा से विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे अनेक संगठन कार्य कर रहे हैं। कुछेक संगठनों का अत्यंत संक्षिप्त परिचय इस समीक्षा, लेख के अकिंचन लेखक ने भी आलेख बीज से वटवृक्ष में देने का प्रयास किया है। अकसर आरएसएस का उल्लेख भारतीय जनता पार्टी के साथ ही किया जाता है। दरअसल संघ की सांस्कृतिक पहचान पर राजनीतिक लेबल चस्पा करने का यह तुच्छ प्रयास है। विरोधी प्रयास करते हैं कि संघ को राजनीतिक संगठन साबित कर समाज में उसके विस्तार एवं स्वीकार्यता को सीमित किया जाए। किंतु वह सफल नहीं हो पाते क्योंकि संघ को समझते नहीं हैं। संघ और राजनीति अध्याय में इसी लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि संघ के लिए प्राथमिकता में नहीं है राजनीति।

ध्येय पथ में संपादक प्रो. द्विवेदी ने शक्ति और संघ अध्याय को शामिल कर उचित ही जवाब उन मूढ़ों को दिया है, जो बिना जाने यह आरोप लगाते हैं कि संघ में महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। डॉ. प्रेरणा चतुर्वेदी और संगीता सचदेव ने अपने आलेखों में इस बात पर विस्तार से प्रकाश डाला है कि संघ किस विधि स्त्री शक्ति के मध्य कार्य कर रहा है। संघ न केवल महिलाओं के मध्य कार्य कर रहा हैए बल्कि समाज में स्त्री शक्ति की भूमिका को सशक्त कर रहा है। राष्ट्रसेविका समिति एवं दुर्गा वाहिनी जैसे संगठन मातृशक्ति में आत्मविश्वास भर रहे हैं। इसके अलावा अन्य संगठनों के माध्यम से भी मातृशक्ति अपना योगदान दे रही है। इसके साथ ही एक अध्याय में यह भी बताया गया है कि संघ अब भी अपनी नीति प्रसिद्धिपरांगमुखता में भरोसा करता है, किंतु अब उसने जनसंचार माध्यमों से मित्रता करना प्रारंभ कर दिया है। जनसंचार माध्यमों से यह मित्रता संघ के प्रचार के लिए नहीं है, संघ को आज तो कतई प्रचार की आवश्यकता नहीं है, यह मित्रता तो समाज में चल रहे सकारात्मक एवं रचनात्मक कार्यों के प्रचार-प्रसार के लिए है। इसके अलावा समाज से संवाद बढ़ाना भी एक उद्देश्य है, ताकि संघ विरोधियों द्वारा फैलाए भ्रमों का समुचित प्रत्युत्तर दिया जा सके। इसके साथ ही और भी महत्वपूर्ण आलेख इस पुस्तक में शामिल हैं, जो संघ के प्रति हमारी समझ को बढ़ाते हैं। पुस्तक के आखिर में संघ: एक परिचय, दृष्टि और दर्शन अध्याय को शामिल किया गया है। यह अध्याय हमें संघ की बुनियादी रचना और जानकारी देता है, यथा – आरएसएस क्या है, उसका उद्देश्य, शाखा क्या है, शाखा में क्या होता है, स्वयंसेवक की परिभाषा क्या है। इसके साथ ही ऐसे और भी प्रश्नों के माध्यम से जानकारी देने का प्रयास किया गया है, जो अमूमन पूछे जाते हैं।
बारह अध्यायों में 36 आलेखों को समेटे ध्येय पथ वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को समर्पित है। पुस्तक में कुछ 262 पृष्ठ हैं। मुखपृष्ठ आकर्षक बन पड़ा है, जो बरबस ही पाठकों को आकर्षित करता है। पुस्तक का प्रकाशन दिल्ली के यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स ने किया है। प्रकाशक ने जनवरी 2018 में दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में पुस्तक को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया था, जिसे पाठकों ने हाथों हाथ लिया। अपनी समृद्ध एवं विविध सामग्री के कारण पुस्तक ने संघ संबंधी साहित्य में शीघ्र ही अपना स्थान बना लिया है। संघ को जानने और समझने का प्रयास करने वाले सभी प्रकार के लोगों को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। इस पुस्तक-चर्चा आलेख को मैं लेखक प्रो. संजय द्विवेदी के संपादकीय के अंतिम हिस्से के साथ पूर्ण करना चाहूँगा। एक संगठन जब अपनी सौ साल की आयु पूरी करने की तरफ बढ़ रहा है तो उसके बारे में उठे सवालों, जिज्ञासाओं, उसके अवदान, उसकी भविष्य की तैयारियों पर बातचीत होनी ही चाहिए। आशा है कि यह पुस्तक इस सिलसिले में एक अग्रगामी भूमिका निभाएगी तथा विमर्श और चिंतन के नये द्वार खोलेगी।
पुस्तक – ध्येय पथ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौ दशक
संपादक – प्रो. संजय द्विवेदी
मूल्य – 250 रुपये पेपरबैक, 650 रूपए सजिल्द
पृष्ठ – रू 262
प्रकाशक – यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स
1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

( समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक हैं और विश्व संवाद केंद्र, भोपाल के कार्यकारी निदेशक हैं। )