इस मुस्लिम लेखक को आखिर मोदी क्यों पसंद है?

फिरोज बख्त अहमद : लेखक पिछले लगभग 5 दशकों से विभिन्न सरकारों को देखता चला आया है, जिनमें प्रधानमंत्री के पद पर, उसकी नजर से पण्डित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर षास्त्री, इन्दिरा गांधी, मोराजी भाई रणछोर देसाई, चैधरी चरन सिंह, राजीव गांधी, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव, एचडी देवगौड़ा, आई के गुजराल, अटल बिहारी वाजपयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र दामोदर दास मोदी गुजरे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इन सभी प्रधानमंत्रियों और बीच में कुछ समय के लिए आए उप प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा का भी, देश को शीर्ष पर ले जाने के लिए बड़ा योगदान रहा है। लेखक यदि इन सभी प्रधानमंत्रियों में से, उच्च कोटि के प्रधानमंत्रियों की बात करे तो उनमें, मुख्य नाम हैं- पण्डित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपयी, राजीव गांधी और नरेंद्र मोदी। यदि पण्डित नेहरू ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में, महात्मा गांधी, मौलाना आजाद और सरदार पटेल के साथ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी तो लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देकर एक ईमानदार प्रधानमंत्री के तौर पर कार्य किया। खेद का विषय तो यह है कि आज तक यह गुत्थी नहीं सुलझ पाई है कि आखिर ताश्कंद में, किस प्रकार से उनका देहांत हुआ-या यह कहा जाए, कि हत्या की गई! इसके बाद, इंदिरा गांधी जो कि एक वीरांगना थीं, उन्होंने अपने पिता नेहरू द्वारा दी गई वैज्ञानिक योजनाओं को आगे बढ़ाया और भारत को एक परमाणु शक्ति के दौर में लेकर गईं। उधरा राजीव गांधी, पाइलट से प्रधानंत्री बनते तो उन्होंने भारत को कम्प्यूटर शक्ति दी। जहां तक अटल बिहारी वाजपयी का संबंध है तो उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि किस प्रकार से नाना प्रकार के गुटों को एक साथ लेकर सरकार चलाई जा सकती है। अब बात आती है, मौजूदा प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी की। मोदी ने प्रधानमंत्रित्व पद के लिए यह साबित कर दिया कि गरीब परिवार का एक चाय वाला भी कि जिसकी मां ने दूसरों के धर में काम करके अपने बच्चों को पाला, वह भी प्रधानमंत्री बन सकता है। इस प्रकार का संघर्श विश्व में बहुत लोगों ने नहीं किया और आस-पास मोदी जैसा उदाहरण, हमें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा में मिलता है कि जिन्होंने दो बार राष्ट्रपति पद पर अपना वर्चस्व बनाए रखा। मोदी के रूप में हमें एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है कि जो बेतहाताशा ईमानदार व्यक्ति है और जिसने पूर्ण रूप से अपने नारे, ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ पर कार्यरत रहने का साहस दिखाया है। यदि हम मोदी के परिवार वालों के ऊपर एक नजर डालें तो पाएंगे कि चाहे वह उनकी पत्नी हों, उनके चाचा हों, उनके भाई हों, उनके भतीजे हों या अन्य कोई संबंधी हो, सभी बहुत छोटे लोग हैं, मामूली नौकरियां या काम धंधे कर, अपना पेट पाल रहे हैं। यदि मोदी चाहते तो मायावती, मुलायम, ममता आदि की तरह अपने रिश्तेदारों को करोड़ों रूपए की गाड़ियों, बंगलों, बैंक बैंलेंस आदि की सुविधा दिला सकते थे, मगर उन्होंने अपनी छप्पन इंच की छाती की चैड़ाई को इसीलिए बनाए रखा है कि ईमानदारी और देषभक्ति उनका तकिया कलाम है। साथ ही साथ, लेखक यहां यह बात भी दर्शाना चाहेगा कि उसने अपने जीवन में जब-जब प्रधानमंत्री तो छोड़िए, मंत्रियों को भी छोड़िए, सांसदों को भी छोड़िए बल्कि विधायकों या पार्शदों से भी किसी की मदद के लिए मिलना चाहा तो, न तो कभी उसका फोन उठाया गया और न ही उसे कोई समय दिया गया। मोदी के बारे में लेखक ने सुना था कि वह किसी भी आम आदमी से मिलने से नहीं कतराते, जिसके कारण, निम्न से निम्नतम वर्ग का व्यक्ति भी उनके मुलाकात करने में सक्षम रहते हैं। लेख को, एक कार्यकर्ता ने मोदी की ईमेल आईडी दी क्योंकि वह उनसे मदद चाहता था। लेखक ने उस ईमेल पर मोदी को चिट्ठी लिखी कि उनकी पार्टी के एक कार्यकर्ता को सहायता की आवष्यकता है और वह समय दें। विस्मय की बात है कि यह ईमेल डालने के तीसरे दिन ही, प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आ गया कि मोदीजी लेखक से मिलने के इच्छुक हैं। 16 मई, 2016 को उनके संसदीय कार्यालय में समय मिला और 14 मिनट की बातचीत रही जो कि एक प्रधानमंत्री से मिलने के लिए विलक्षण माना जाएगा। इस दौरान काफी बातें हुईं, जिनमें मुस्लिमों और हिंदुओं के बीच सद्भावना का वातावरण एवं संघ व मुसलमानों के बीच दूरियां समाप्त कर पुल बनाने की बात को उन्होंने पसंद किया। मोदी का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि चंद षब्द बोलकर ही वे सामने वाले का दिल जीत लेते हैं और उसको यह महसूस करा देते हैं कि उनके लिए उससे अधिक महत्त्वपूर्ण और कोई व्यक्ति है ही नहीं। यह एक जबर्दस्त कला है उनमें।
चूंकि वे एक गरीब परिवार से हैं, उनके मन में गरीबों के प्रति एक ज्वाला धधकती रहती है कि किस प्रकार से वे उनका उत्थान करें। जहां तक, भारत देश का संबंध है, उनका बस नहीं कि वे देश को विश्व में नंबर एक का स्थान दिला दें। इसके लिए वास्तव में उन्हें एक लम्बा समय दरकार है क्योंकि उन्हें पिछली सरकारों द्वारा किए गए भ्रष्टाचारों, लुटेरों, हिंदू-मुस्लिम दंगे कराने वाले, देश को बेच खाने वालों आदि द्वारा खोदे गए गड्ढे भरने का कार्य करना है। यही नहीं, भारत को नंबर एक बनाने के लिए उनके विजन, नोटबंदी, जीएसटी, आदि को भी एक नया रूप देना है और पिछले दिनों बढ़ी बेरोजगारी से भी निपटना है। ठण्डा-गरम जीवन के साथ चलता ही है, सो बतौर प्रधानमंत्री, उनके साथ भी, ऐसा चल रहा है। हालांकि अभी मोदी के पांच वर्ष पूरे भी नहीं हैं, उनकी बेसुमार उपलब्धियों से देश गर्वान्वित हुआ है। जो लोग, दावा करते हैं कि मोदी ‘एनआरआई’ प्रधानमंत्री हैं उनसे पूछा जाए कि क्या भारत नेहरूजी, इंदिराजी अथवा राजीवजी जैसे पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में क्या कभी चौथा सबसे अधिक बलशाली देश बना है? आज, यूएन द्वारा 25 सबसे ताकतवर देशों की जारी लिस्ट में भारत से आगे केवल अमेरिका, रूस और चीन ही हैं। आज मोटे-मोटे व्यापारी, टैक्स चोरी करते थे, मोदी ने उन पर अंकुश लगाया है और एक लाख करोड़ पर पहुंचा जीएसटी का मासिक टैक्स कलेक्शन, प्रमाणित करता है, एक चाय वाले का दक्ष अर्थशास्त्र। आज भारत ने फ्रांस को छठे नंबर पर पीछे धकेल दिया है। यही नहीं बिजली उत्पादन में भारत ने रूस को पीछे छोड़, अपना तीसरा स्थान बनाया है। टेक्सटाइल उत्पादन में भारत ने इटली को पीछे छोड़ दूसरे नंबर पर जगह पाई है, जैसे मोबाइल उत्पादन और स्टील उत्पादन में भारत आज दूसरे स्थान पर है। चीनी उत्पादन में कि जिसे ‘‘भारत ने ब्राजील को पीछे छोड़ विश्व में प्रथम स्थान बनाया है’’ हां, फौज में भी आज भारत का अमेरिका और चीन के बाद तीसरा स्थान है। जिसका उदाहरण, कुछ समय पूर्व भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में दे ही दिया।
जहां अमेरिका की जीडीपी 4.5 प्रतिशत है, चीन की 6.7 प्रतिशत है तो भारत की 8.2 है। यही कारण है कि जहां 1963 में, नेहरू के दौर में भारत ने चीन से मात खाई थी आज डोकलाम में इस विशालकाय देश को पीछे धकेला है। यही नहीं, 200 साल तक हमारे देश को, गुलाम बनाने वाले ब्रिटेन में 53 देशों की मीटिंग को महाध्यक्ष बनाया गया। उधर यूएन मानवाधिकार परिषद में भारत को 97 वोटों की आवश्यकता थी, मगर मोदी राज में उसे 188 वोट प्राप्त हुए। आज पाकिस्तान गरीबी से इसलिए जूझ रहा है कि पिछले 70 वर्ष में उसकी कमाई का जरिया भारतीय नकली नोटों का व्यापार था जिसे मोदी ने खत्म किया है। यही कारण है कि न केवल लेखक बल्कि सिवाए विपक्ष के, भारत के 100 करोड़ लोग आज मोदी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं।

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