एक हाथ में कुरान हो, एक में कम्प्यूटर : नरेंद्र मोदी

- in फीचर्ड, स्तम्भ

मोदी सरकार को आज चार साल हो चुके हैं और पांचवें में थोड़ा ही समय रहता है। विपक्ष के बहुत से लोग उनसे नाना प्रकार के हिसाब मांग रहे हैं, जिनमें कुछ को छोड़कर बाकी सभी निरर्थक हैं। यहां लेखक प्रारंभ करना चाहेगा मुस्लिम समाज से कि जहां भाजपा की बात आते ही माथे पर बल पड़ जाते हैं और ऐसा प्रतीत होता कि मानो क्या वाही-तबाही बक दी है। मुस्लिमों ने अपना स्वभाव यह बना लिया है कि कुछ भी हो, भाजपा से कोई मामला नहीं करना। यदि मुस्लिम समाज को आगे बढ़ना है तो उसे कुछ यू-टर्न करने होंगे। आज का मुसलमान यदि यह समझे कि वह भाजपा, संघ और मोदी को दूर-परे रख कर प्रगति की दौड़ में आगे बढ़ जाएगा तो यह उसकी खुशफहमी है।

मुसलमान को अब यह समझ लेना चाहिए कि आज भाजपा देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन चुकी है और यह कि उसको दरकिनार कर वह किसी भी क्षेत्र में अपना सिक्का नहीं जमा सकता। पहला यू-टर्न बकौल वरिष्ठ मुस्लिम चिंतक एवं भाजपा प्रवक्ता, जफर इस्लाम, यह लेना होगा कि अब वह यह सोचना छोड़ दें कि कांग्रेस या राहुल गांधी उसके मसीहा बन सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या मुसलमानों के साथ यह हो गई है कि वे कांग्रेस को इस प्रकार से मतदान करतेच चले आए हैं कि मानो अल्लाह मियां ने कह दिया हो या कुरान में लिखा हो, ‘ऐ मुसलमानों, कांग्रेस को वोट दो!’ मुस्लिमों को इस मानसिकता बाहर आना होगा और समझना होगा कि जो कांग्रेस पिछली आधी शताब्दी से उनको बतौर वोट बैंक इस्तेमाल करती चली आई है और उर्दू, आरक्षण, सरकारी नौकरी के नाम में उनका जज्बाती शोषण करती चली आई है। साथ ही कांग्रेस ने मुसलमानों को भाजपा और आरएसएस के नाम से भी न केवल डरा कर रखा बल्कि अपने दौर में उसने सांप्रदायिक दंगे इंजीनियर कराए ताकि मुस्लिम समझें कि संघी उनके साथ मार-काट कर रहे हैं। दूसरा यू-टर्न मुस्लिमों को यह लेना होगा कि उन्हें यह बात समझनी होगी कि आज के दौर में मोदी, भाजपा और आरएसएस एक सच्चाई हैं और रहेंगे, चाहे वे सत्ता में रहें या न रहें बड़े खेद का विषय है कि मुस्लिमों ने अपना मिज़ाज यह बना लिया है कि हर चीज में उसे साजिश नजर आती है और वह भाजपा या मोदी की हर बात पर शक करता है। मुसलमान को यह जान लेना चाहिए कि मोदी और भाजपा आज की सच्चाई हैं। आप जितना उन्हें गाली दोगे, बुरा-भला कहोगे, अपनी ही हानि करोगे और उनके इस मानसिक द्वंद में मुस्लिमों की जगहंसाई हो रही है। अक्लमंद कौमें वे होती हैं कि जो समय के साथ बदलती हैं और अड़ियल टट्टू का रवैया छोड़ देती हैं। मुसलमानों ने हजरत मुहम्मद (सल्ल.) और कुरान का रास्ता छोड़ दिया। हिंदुओं ने हजरत मुहम्मद (सल्ल.) और इस्लाम की अच्छी बातों को अपनाया है और वे आगे निकल गए हैं।

एक और यू-टर्न, बकौल चीफ इमाम, उमैर इलियासी, मुस्लिमों को यह लेना होगा कि यदि मोदी या भाजपा मुस्लिमों के संबंध में भले ही जबानी जमा-खर्च करते हुए कोई अच्छी बात कहते हैं तो बजाय उसका मजाक उड़ाने के या उल्टे-सीधे कमेंट देने के, उस बात को पकड़ लेना चाहिए और बार-बार उनका पीछा लेना चाहिए कि आपने मुस्लिमों के संबंध में जो बात कही थी, उसको अब जमीनी सच्चाई बनाइए। ऐसा नहीं होता, बल्कि सोशल मीडिया ट्रोलिंग शुरू हो जाती। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों मोदी की ओर से मुस्लिमों के संबंध में कुछ अच्छी बातें कही गईं, जैसे, ‘‘मैं चाहता हूं कि मुसलमानों के एक हाथ में कुरान हो और दूसरे में कम्प्यूटर!’’ मोदी ने एक और बढ़िया बात अब से कुछ समय पूर्व, दिल्ली में आयोजित ‘‘वर्ल्ड सूफी कांफ्रेंस’’ में कहा था कि उन्हें अल्लाह के 99 नामें में सभी नाम बड़े प्यारे लगते हैं। यहीं पर उन्होंने कहा था कि वे मुस्लिमों को अपनी संतान की भांति मानते हैं और उने बराबरी का सुलूक करना चाहते हैं। जिस समय इस सूफी कांफ्रेंस में मोदी इस्लाम और कुरान की प्रशंसा कर रहे थे तो अफ्रीका, पश्चिम मध्य एशिया एवं कुछ अरब देशों से आए सूफी संत बार-बार कह रहे थे, ‘‘हिय्याकुमल्लाह, मोदी!’’ ‘‘अफवान-अल-हबीबी, मोदी!’’ हालांकि मोदी अंग्रेजी में बोल रहे थे मगर उनकी बात यह अरब सूफी संत सुन कर उनकी प्रशंसा कर रहे थे। यह एक कुदरती उसूल है कि जब किसी के पिन मारते चले जाएंगे, उसे गाली दिए चले जाएंगे, उसके विरुद्ध वाही-तबाही बकेंगे, तो कुदरती है कि वह आपसे किनारा कर लेगा। यदि मुसलमान बुद्धिमान होते तो मोदी के साथ, भाजपा के साथ, संघ के नेताओं के साथ, वार्तालाप करते, बातचीत से पुल बनाते, और रंजिशों को समाप्त करते, उन्होंने मुखालिफत को कम करने के बजाय आगे ही बढ़ाया है। लेकिन इसका एक कारण है, और वह है पिछले कुछ दिनों से चल रही बेगुनाह मुस्लिमों की कभी गाय के नाम में, कभी पाकिस्तानी के नाम में तो कभी किसी और कारण, हत्याएं।

भारत जैसे सांप्रदायिक सद्भाव वाले देश में यदि ऐसा हो तो दिल छलनी-छलनी हो जाता है। भाजपा सरकार की विडम्बना यह है कि जब भी इस प्रकार की जब भी इस प्रकार की घटनाएं, बिसहेड़ा के अखलाक से लेकर, पहलू खान से होती हुई रकबर तक जिन लोगों ने किया, उन्हें विपक्ष और संघ से रंजिश रखने वालों ने भाजपा के खाते में डाल दिया। कोई भी सरकार, नहीं चाहेगी कि उसके दौर में इस प्रकार की घटनाएं हों। यह तो भाजपा के लिए बदकिस्मती वे राइट विंग के लोग हैं, जिनका सरकार या भाजपा से कोई लेना-देना नहीं है, मगर वे किसी भी मुसलमान को बेदर्दी से कत्ल करके गेरुए वस्त्रों में, छाती ठोंक कर बोलते हैं उन्होंने उस मुस्लिम की हत्या इसलिए की क्योंकि उसने गौहत्या की थी, अथवा हिंदू लड़की से प्रेम किया था। जहां मुस्लिमों को यू-टर्न लेना है कि भाजपा, मोदी या संघ के विरुद्ध जहर न उगलें, उनके बीच 5-10 कट्टरपंथी लोगों को अतिवादी बनने पर न उकसाएं, वहीं सरकार को भी यह देखना होगा कि अब तक लगभग जितने भी 50 के निकट बेगुनाह मुस्लिमों की हत्याएं हुई हैं, न केवल उन पर सख्ती के साथ रोक लगे बल्कि जो लोग इसमें शामिल पाए जाएं, उनको न्यायालय में केस कर ईमानदारी के साथ लम्बे अर्से तक कारागार में डाला जाए ताकि दूसरों के लिए उदाहरण बनें और भारत जैसे, गंगा-जमुनी तहजीब और साझा विरासत वाले देश में, हर हिंदू-मुस्लिम के दिल और जबान पर हरदिल अजीज हिंदी कवि, कुमार विशवास का यह शेर गुनगुनाया जाए, ‘‘आ मिटा दें, दिलों पे जो सियाही आ गई है, मेरी दिवाली तू मना ले, तेरी ईद मैं मनाऊं।’’ जब तक एक सामान्य, मार्केट में चलने वाले, बस में सफर करने वाले, या किसी दफ्तर में काम करने वाले, पुल नहीं बनेगा, प्यार नहीं होगा, ता यह देश बिखर जाएगा। यह शताब्दी भारत की शताब्दी है और भारत विश्व का अग्रणी देश बनेगा, मगर यह जब तक नहीं हो सकता है कि जब तक यह खून-खराबा नहीं रुकता और संघ को बदनाम करने वाले इन कातिलों को सरकार सजा नहीं देती। इन पंक्तियों के अंत में जहां मुस्लिमों को यह यू-टर्न लेना होगा संघ, भाजपा और मोदी के विरुद्ध आग नहीं उगलनी होगी, उसी प्रकार से भाजपा और संघ को, बकौल मोदी इस बात को जमीनी सच्चाई पर लाना होगा कि मुस्लिम उनकी संतान की माफिक हैं और उन्हें उनके साथ बराबरी का सुलूक करना होगा। आखिर लेखक का एक शेर-
‘‘कोई मुश्किल नहीं हिंदू या मुसलमां होना,
हां, बड़ी बात है, इस दौर में इंसां होना!’’

फिरोज बख्त अहमद
(लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार एवं मौलाना आज़ाद के पौत्र हैं)