कलह की पिच पर क्रिकेट

- in संपादकीय

टीम इंडिया के कोच चयन के साथ ही भारतीय क्रिकेट में एक ऐसी निरंकुश व्यवस्था जन्म लेती दिख रही है जिसके समक्ष क्रिकेट बोर्ड भी असहाय दिख रहा है। टीम इंडिया के कोच चुने जाने के बाद रवि शास्त्री अंगुली पकड़कर पहुंचा पकड़ने का काम करते दिख रहे हैं। जब उन्हें कोच बनना था तो उन्हें सलाहकार समिति यानी सीएसी का हर सुझाव मंजूर था। यहां तक कि जहीर के बॉलिंग सलाहकार और द्रविड़ के विदेशी दौरों पर टीम के साथ जुड़ने से भी उन्हें कोई परहेज नहीं था, लेकिन कोच की कमान मिलते ही उन्होंने सपोर्ट स्टाफ अपने हिसाब से चुनने का राग अलापना शुरू कर दिया। उन्होंने पहले भरत अरुण और फिर इंग्लैंड दौरे के लिए जेसन गिलेस्पी के नाम बॉलिंग कोच के लिए सुझाए थे, लेकिन ये नाम खारिज किए जाने पर वह मौन रहे। इसके बाद जैसे ही कोच चुन लिए गए उनका सुर बदल गया। मजबूरी में बोर्ड को उनके सामने झुकना पड़ा और उसने जहीर एवं द्रविड़ के बारे में यह कहा कि इनकी सेवाएं जरूरत पड़ने पर ही ली जाएंगी। सवाल है कि यह कौन तय करेगा कि जहीर और द्रविड़ की जरूरत है या नहीं? क्या खुद रवि शास्त्री? रवि शास्त्री के ऐसे रुख के बाद सचिन, सौरव और लक्ष्मण पर भी सवाल उठ रहे हैं। ध्यान रहे कि वे पहले से ही इस सवाल से दो-चार हैं कि जब कोच का चयन कप्तान विराट कोहली की ही पसंद से होना था तो फिर अन्य खिलाड़ियों के इंटरव्यू लेने की कवायद क्यों की गई?

कोच का चयन करने वाली समिति के सदस्यों सचिन, सौरव और लक्ष्मण की काबिलियत पर संदेह नहीं। इसी तरह सलाहकारों के तौर पर द्रविड़ और जहीर चयन पर भी कोई अंगुली नहीं उठाई जा सकती। तीन सदस्यों की समिति ने टीम इंडिया के लिए हर लिहाज से काबिल दो दिग्गजों का चयन किया है। इस चयन के समय मौजूद बोर्ड के सीईओ अमिताभ चौधरी और सचिव राहुल जौहरी की यह जिम्मेदारी बनती थी कि वे इन दोनों दिग्गजों से उनके उपलब्ध रहने या न रहने के बारे में जानकारी हासिल कर लेते। अगर जहीर खान टीम इंडिया के लिए सौ दिन से अधिक उपलब्ध ही नहीं होंगे तो फिर उनकी काबिलियत का टीम इंडिया के लिए उपयोग कैसे हो सकता है? अगर जहीर का दिल्ली डेयरडेविल्स के साथ चार करोड़ का करार आड़े आ रहा है तो उसे बातचीत के बाद उसी तरह क्यों नहीं सुलझाया गया जैसे द्रविड़ के इंडिया-ए और अंडर-19 टीम का कोच बने रहने के सवाल को सुलझाया गया था? क्या बोर्ड के ये दोनों अधिकारी यह बुनियादी बात भी नहीं जानते कि टीम इंडिया के लिए कम से कम 200 से 250 दिन उपलब्ध रहना जरूरी होता है? एक सवाल यह भी है कि क्या जहीर खान के लिए किसी क्लब को सेवाएं देना टीम इंडिया को सेवाएं देने देने से अधिक अहम है?

सुप्रीम कोर्ट की चुनी हुई प्रशासकों की समिति यानी सीओए भी इस पूरे मामले में कम जिम्मेदार नहीं है। उसने इस मामले में एक तरह से आग में घी डालने का काम किया है। पहली बात तो यह है कि टीम इंडिया का कोच कौन होगा और उसकी घोषणा कब की जाएगी, यह काम बोर्ड का है, सीओए का नहीं। उसे लोढा कमिटी की सिफारिशों को लागू करने के लिए लाया गया है, न कि कोच के मसले पर हड़बड़ाहट दिखाने के लिए। माना कि उसे सुप्रीम कोर्ट को बोर्ड से संबंधित बहुत सी चीजें स्पष्ट करनी हैं, लेकिन अगर वह अपने दायरे तक ही सीमित रहती तो अच्छा होता। यह हास्यास्पद है कि उसके दबाव के चलते कोच के चयन का काम आनन-फानन किया गया। आदर्श स्थिति तो यह होती कि श्रीलंका दौरे तक संजय बांगड़ को अंतरिम कोच नियुक्त कर दिया जाता और फिर स्थिति का पूरा आकलन करने के बाद नए कोच की घोषणा की जाती। आज स्थिति यह है कि कप्तान और कोच से लेकर सीओए, सीएसी और बोर्ड, सभी पर अंगुली उठ रही है। इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता कि सचिन, सौरव और लक्ष्मण को बोर्ड को पत्र लिखकर यह सफाई देनी पड़ी कि उन्होंने बहुत मेहनत और ईमानदारी से अपना काम किया है।
किसी को टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली को यह बताना चाहिए कि वह अभी इतने बड़े या सफल कप्तान नहीं हैं कि उन कामों में भी हस्तक्षेप करें जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। यह ठीक है कि उनकी बल्लेबाजी क्षमता का पूरा देश कायल है और ऐसे खिलाड़ी कम ही होते हैं, लेकिन कप्तान के तौर पर उन्हें अभी बहुत कुछ साबित करना है। क्रिकेट प्रेमी भूले नहीं हैं कि चैंपियंस ट्रॉफी में वह कप्तान के तौर पर धौनी पर निर्भर दिखाई दिए थे। कई बार तो धौनी ही कप्तानी करते दिखाई देते थे। खेल भावना के लिहाज से यह अच्छा आचरण है, लेकिन अगर विराट ने ऐसा ही रवैया कोच के मसले पर भी दिखाया होता तो उनका कद और बड़ा होता। विराट को अनिल कुंबले जैसे काबिल कोच की सख्ती पसंद नहीं थी। उन्हें शास्त्री जैसे कोच पसंद हैं जो गॉले टेस्ट में हार के बाद टीम इंडिया के साथ पार्टी करते देखे गए थे। शायद उन्हें कोच के तौर पर ऐसा व्यक्ति पसंद है जो मैदान के बाहर उनकी और टीम की अनुशासनहीनता को भी नजरअंदाज करे। समझौतावादी कोच विराट के लिए बेहतर हो सकता है, टीम इंडिया के लिए नहीं।