क्या राजस्थान भाजपा झेल पायेगी घनश्याम तिवाड़ी का झटका?

 

जगमोहन ठाकन

जिसका डर था बेदर्दी, वो ही बात हो गयी’

आखिरकार 1980 से लेकर 2013 के विधान सभा चुनावों में छ: बार जीत दर्ज कर विधायक बने भाजपा के दिग्गज नेता एवं भाजपा को नर्सरी से लेकर पूर्ण पेड़ बनाने तक सींचने वाले राजस्थान के तेज तर्रार घनश्याम तिवाड़ी भाजपा को अलविदा कह ही गये। वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से 36 का आंकड़ा रखने वाले तिवाड़ी गत चार वर्षों से उपेक्षा झेल रहे थे और समय-समय पर पार्टी एवं अपनी ही प्रदेश सरकार की बेरुखी के चलते पार्टी में अपमानित एवं घुटन महसूस कर रहे थे। घनश्याम तिवाड़ी निरंतर चार वर्षों से प्रदेश के वर्तमान नेतृत्व के खिलाफ जहर बुझे बाण प्रक्षेपण कर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे थे। परन्तु न जाने क्यों प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तिवाड़ी को कोई तरजीह नहीं दे रही थीं? तिवाड़ी को लगने लगा था कि भाजपा में पार्टी स्तर पर भी उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी जा रही है। हालात यहाँ तक खटीले हो चुके थे कि पार्टी व सरकार के मंचों पर उपेक्षित महसूस कर तिवाड़ी ने अपना सारा आक्रोश अपने एक संगठन ‘दीन दयाल वाहिनी’ के प्लेटफार्म के माध्यम से व्यक्त करना शुरू कर दिया था। तिवाड़ी ने यह कदम कोई अचानक नहीं उठाया है और न ही पार्टी को कोई आश्चर्य हुआ है।
हालाँकि प्रदेश के मुख्यमंत्री के खिलाफ तिवाड़ी के इस विद्रोह को दमित करने या पता नहीं और कुरेदने की मंशा से भाजपा की राष्ट्रीय अनुशासन समिति ने गत वर्ष मई में तिवाड़ी को कारण बताओ नोटिस जारी कर मई की तपती गर्मी को और गर्म कर दिया था। घायल एवं गुस्साए शेर की तरह हाईकमान द्वारा दिए गए कारण बताओ नोटिस से आहत तिवाड़ी ने भी तुरंत अपना स्पष्टीकरण इतने नुकीले जवाब में दिया था कि जिसने भी इस स्पष्टीकरण को पढ़ा अन्दर तक जख्मी हुए बिना नहीं रह पाया।
तिवाड़ी ने अपने पत्र में इंगित किया था कि वे अनुशासनात्मक कार्रवाई से भयभीत नहीं हैं और अपनी न्याय की लड़ाई में न्याय के पथ से विचलित नहीं होंगे। ‘जीवन में सदैव मेरा प्रयास रहा है कि जितनी भी मेरी समझ है, न्याय के पथ पर चलूँ और चाहे कितने भी झंझावत आयें, मैं न्याय के पथ पर से डिगूं नहीं।’ अपने अनुशासनहीनता के आरोपों को सिरे से नकारते हुए तिवाड़ी ने लिखा – ‘मैंने जीवन भर ध्येय, निष्ठा से कार्य किया है, राजनीति को भी विचारधारा आगे बढ़ाने का एक मिशन मानकर काम किया है। मैं पार्टी के खिलाफ गतिविधियाँ और बयानबाजी के आक्षेप को सिरे से नकारता हूँ।’
तिवाड़ी ने न केवल अपने खिलाफ लगाए गए आक्षेपों को नकारा अपितु प्रदेश की मुख्यमंत्री को लपेटे में लेते हुए अपनी लड़ाई को और अधिक पैनापन देते हुए लिखा था ‘राजस्थान में जो वास्तव में अनुशासनहीन है, जिन्हें पार्टी में देशभर में अनुशासनहीनता की महारानी भी कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, उनसे संबंधित कुछ तथ्य आपके सामने रखकर मांग करता हूँ कि राजस्थान की मुख्यमंत्री पर पार्टी अनुशासनहीनता की कारवाई करे।’
तिवाड़ी ने राजे पर मोदी के खिलाफ प्रदेश सांसदों को लामबंद करने तथा मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने से रोकने का भी आरोप लगाया। पार्टी भी तिवाड़ी के आक्रोश एवं विद्रोह को काफी समय से ‘वाच’ कर रही थी, परन्तु तिवाड़ी को पार्टी से निकाल कर उसे जन सहानुभूति का मौका नहीं देना चाहती थी।


अपनी नई पार्टी के तहत लड़ेंगे चुनाव
अब तिवाड़ी ने पार्टी में अपने खिलाफ हालात देखकर भाजपा से नाता तोड़कर अपनी स्वयं की पार्टी बना ली है, जिसका नाम रखा गया है – भारत वाहिनी पार्टी। चुनाव आयोग ने 20 जून को ही इसे मान्यता प्रदान की है। 25 जून, 2018 को प्रेस से बात करते हुए उन्होंने इस्तीफे का ऐलान किया है। घनश्याम तिवाड़ी अब आगामी विधानसभा चुनाव में ‘भारत वाहिनी पार्टी’ की कमान संभालेंगे, जिसके संस्थापक उनके बेटे अखिलेश तिवाड़ी हैं। उनकी पार्टी सभी 200 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगी तथा समान विचारधारा वाले लोगों का सहयोग लेगी। भाजपा से इस्तीफ़ा देते हुए तिवाड़ी ने भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर कई गंभीर आरोप जड़े हैं। प्रेस वार्ता में तिवाड़ी ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, अमित शाह के नाम जारी अपने कथन में कहा – ‘पिछले चार वर्ष में मैं कई बार आपके ध्यान में राजस्थान के भ्रष्टाचार और कुशासन की बात लाया हूँ। मैं लगातार आपके ध्यान में यह भी लाता रहा हूँ कि राजस्थान की भाजपा को किस प्रकार एक व्यक्ति के द्वारा हथिया लिया गया है। किस प्रकार राजस्थान भाजपा एक व्यक्ति की निजी दुकान में बदल गयी है। मैं आपको यह भी बतलाता रहा हूँ कि इससे राजस्थान प्रदेश का भी अहित हो रहा है और राजस्थान में पार्टी का भी। लेकिन आपने कभी कुछ नहीं किया। उलटे सत्ता के गुरूर में आपने पार्टी के निष्ठावान लोगों को ही प्रताड़ित एवं बदनाम करने की कोशिश की। स्पष्ट है कि पहले राजस्थान के भ्रष्टाचार के साथ आपका समझौता हुआ और अब आपने उसके सामने घुटने भी टेक दिए हैं।’
तिवाड़ी के उपरोक्त कथन से इतना तो स्पष्ट है कि पार्टी हाईकमान द्वारा भी तिवाड़ी को कोई घास नहीं डाली जा रही थी और प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की भी हैसियत इतनी अधिक मजबूत हो चुकी है कि खुद पार्टी हाईकमान उन्हें कुछ कह सकने या हटा पाने में असमर्थ है। इसका साफ़ संकेत है कि राजे विरोधी कुछ तत्वों की आगामी विधानसभा चुनावों में भी क्या गत होने वाली है। यहाँ यह भी निष्कर्ष निकल रहा है कि पार्टी में अंदरखाने तिवाड़ी के साथ सहानुभूति रखने वालों के लिए कोई उज्जवल भविष्य नहीं है। शायद यही वजह है कि तिवाड़ी ने यह संकेत दिया है कि कुछ अन्य लोग भाजपा से भी उसके साथ आयेंगे।
प्रदेश में बताया अघोषित आपातकाल
तिवाड़ी ने कहा – ‘पच्चीस जून को भाजपा आपातकाल के खिलाफ दिवस मना रही है। परन्तु राजस्थान प्रदेश और देश में आज जो अघोषित आपातकाल लागू है वह घोषित आपातकाल से अधिक खतरनाक है। इस अघोषित आपातकाल के खिलाफ मैं जनता की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष करने को तत्पर हूँ और कमर कसकर तैयार हूँ। वर्तमान में देश-प्रदेश में लगे अघोषित आपातकाल के विरुद्ध ईश्वर मुझे मैदान में उतार रहे हैं यह भी उनकी कृपा ही है। संघ के स्वयंसेवक तथा जनसंघ के युवा पदाधिकारी के रूप में मैंने भी आपातकाल के खिलाफ आन्दोलन में भाग लिया था। इसके कारण मुझे जिन अमानवीय यातनाओं से गुजरना पड़ा था वे पार्टी तथा संघ के लोगों को सर्वविदित हैं। मुझे दी गयी उन यातनाओं के विरोध में जे.पी. और अटल जी सहित देशभर की जेलों में बंद नेताओं ने दो दिन का उपवास भी किया था। लेकिन पिछले चार वर्ष में देश के ध्यान में यह बात आई है कि घोषित आपातकाल अब चाहे ना लगाया जा सके एक अघोषित आपातकाल देश में लगाया जा सकता है, बल्कि लगाया जा चुका है।’
क्या पड़ सकता है राजस्थान की राजनीति पर असर?
भले ही भाजपा की कोई भी विवशता रही हो कि वह अपने एक फायर ब्रिगेड नेता को नहीं पुचकार पाए, परन्तु तिवाड़ी को हलके में लेना भाजपा को अवश्य ही भारी पड़ेगा और पार्टी की दिन प्रतिदिन गिरती छवि और अधिक रसातल की तरफ अग्रसर होगी। तिवाड़ी का प्रदेश के ब्राह्मणों में काफी प्रभाव है और ब्राह्मण काफी समय से भाजपा में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। वैसे भी भाजपा ब्राह्मण जमा राजपूतों की ही मूल पार्टी रही है। गैंगस्टर आनंदपाल के एनकाउंटर के कारण राजपूत भी भाजपा से खार खाए बैठे हैं। राजपूत नेता एवं राजे के मंत्रिमंडल के सदस्य राजेंदर राठौड़ की स्वयं की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी राजे के कदमों में कांटे बिछा सकती है। भाजपा की जीत सुनिशिचित करने वाले जाट मतदाता गत विधानसभा चुनावों में अशोक गहलोत द्वारा जाटों की उपेक्षा से नाराज़ होकर भाजपा के खेमे में इसलिए आये थे कि शायद भाजपा में ही उनकी पूछ हो जाये, परन्तु अब जाट भी अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं और अपने एक युवा तथा संघर्षशील नेता हनुमान बेनीवाल के झंडे तले लामबंद हो रहे हैं। बेनीवाल जाटों समेत अन्य किसान व दलित जातियों के एक नए समीकरण को लेकर लगातार प्रयासरत हैं और काफी हद तक इसमें सफल भी दिख रहे हैं। किसान रैली के रूप में वे लोगों को एक मंच पर लाने में कामयाब भी हो रहे हैं। बेनीवाल की सभाओं में लोगों की उपस्थिति को देखकर भाजपा तथा कांग्रेस दोनों चिंतित हैं और अगर तिवाड़ी भी इस गठबंधन में हिस्सेदारी कर लेते हैं तो कांग्रेस तथा भाजपा दोनों का सत्ता प्राप्ति का आंकलन डगमगा सकता है। आज पूरे देश में थर्ड फ्रंट के नाम पर जिस कद्र विपक्षी नेता इकठ्ठे हो रहे हैं उससे लगने लगा है कि राजस्थान में भाजपा को जमीन देखनी पड़ सकती है और सत्ता से हाथ धोना पड़ सकता है। राजस्थान में बहुजन समाज पार्टी के भी काफी समर्थक हैं और थर्ड फ्रंट बनने पर वे कांग्रेस व भाजपा से दूर छिटक सकते हैं। ‘पन्द्रह लाख हर खाते में आयेंगे’ का नारा अब थोथा पड़ चुका है और गत चुनावों में भले ही इस तबके के लोग इस लोभ में भाजपा को वोट दे गए हों, अबकी बार वे भाजपा से दूरी बनाते नज़र आ रहे हैं।