क्या सेनापति विहीन हरियाणा कांग्रेस जीत पायेगी चुनावी जंग?

जगमोहन ठाकन

कर्नाटक के हालिया प्रकरण से उत्साहित कांग्रेसी वर्कर हरियाणा में भी जीत की गुणा-भाग में लग गया है और प्रदेश के नेतागण आगामी चुनावों में बागडोर अपने-अपने हाथ में लेने हेतु अपनी-अपनी डफली बजाने लगे हैं। परन्तु हरियाणा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं तथा आमजन, जो कांग्रेस की तरफ रुख करना चाहते हैं, के सामने सबसे बड़ी असमंजस की स्थिति यह बनी हुई है कि आखिर ये चुनाव प्रदेश के किस नेता के सेनापतित्व में लड़ा जायेगा?
भले ही हरियाणा विधानसभा का कार्यकाल अक्टूबर, 2019 तक का है परन्तु अगर कांग्रेस एवं भाजपा की गतिविधियों पर दृष्टि डाली जाये तो राज्य के राजनीतिक पंडितों के इस आंकलन में दम लगता है कि राज्य की विधानसभा के चुनाव भी लोकसभा के चुनावों के साथ ही 2019 के प्रारम्भिक दिनों में भी हो सकते हैं क्योंकि राज्य में अक्टूबर, 2014 के विधानसभा चुनावों में मोदी लहर के बावजूद 90 में से भाजपा को केवल 47 सीटें ही मिल पाई थी, जो बहुमत से मात्र दो सीटें ही अधिक थी। राज्य में भाजपा के पास प्रदेश स्तरीय ऐसा कोई तिलिस्मी नेता नहीं है जो अपने दम पर भाजपा को अक्टूबर 2019 की विधानसभा के लिए बहुमत दिला दे। अत: राजनैतिक आंकलनकर्ता मानते हैं कि राज्य में भाजपा को दोबारा जीत के लिए पुन: मोदी की पीठ पर सवार होना पड़ेगा और इसके लिए सबसे मुफीद समय लोकसभा चुनाव के साथ ही चुनाव करवाना है। भाजपा में वर्तमान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के अलावा उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी कैप्टन अभिमन्यु, ओ पी धनखड़ तथा रामबिलास शर्मा भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजरें गड़ाए हुए हैं।


कांग्रेस में भी आगामी विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री पद की पगड़ी अपने सर पर धारण करने हेतु प्रमुख रूप से छह क्षत्रप अपनी ताकत हाईकमांड के सामने सिद्ध करने के लिए जोर आजमाइश कर रहे हैं परन्तु कांग्रेस के लिए एक बुरा समाचार यह है कि ये सभी नेता कांग्रेस की मजबूती के लिए नहीं अपितु अपनी-अपनी जड़ें मजबूत करने में लगे हैं। कयास यह भी लगाये जा रहे हैं कि विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश में पार्टी अध्यक्ष के पद को लेकर रस्साकसी की जा रही है। हर क्षत्रप यह चाहता है कि प्रदेश कांग्रेस की बागडोर अपने हाथों में लेकर वे अधिक से अधिक सीटों पर अपने चहेतों को टिकट दिला पाएंगे ताकि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में अपनी दावेदारी को मजबूत बना सकें।
वर्तमान में कांग्रेस के छह क्षत्रपाूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा, वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर, कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला, पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के पुत्र कुलदीप बिश्नोई, पूर्व मुख्यमंत्री बंसी लाल की पुत्र वधू किरण चौधरी तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री कुमारी शैलजा अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। भले ही ये सारे क्षत्रप यह कह रहे हों कि वे पार्टी की मजबूती के लिए काम कर रहे हैं पर जनता जानती है कि कांग्रेस पार्टी की तरफ किसी का ध्यान नहीं है। सब अपने पैक्स बनाने हेतु जिम में जोर आजमाइश कर रहे हैं हालाँकि जनभावना कांग्रेस के प्रति सॉफ्ट दिखाई पड़ रही है।
राजनैतिक विश्लेषक मानते है कि वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर भले ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी की नजदीकी के नाम पर दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बन जाएं पर उनकी पार्टी कैडर व जनमानस में पकड़ नहीं है। छात्र राजनीति के माध्यम से एनएसयूआई के मंच पर सफल पारी निभाने के बाद एवं राष्ट्रीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर राजनीति सीखकर मुख्य राजनीतिक धारा में अशोक तंवर को जगह देने के उद्देश्य से अशोक तंवर को वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में पहली बार कांग्रेस हाईकमांड द्वारा सीधा सिरसा लोकसभा से उम्मीदवार बनाया गया था, जिसमें वे विजयी भी रहे थे परन्तु 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्हें सिरसा से हार का मुह देखना पड़ा। वर्ष 2014 में ही तंवर को प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस की बागडोर सौंपी गयी। सिरसा से पारिवारिक कांग्रेसी नेत्री पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं दिग्गज हरिजन नेता चौधरी दलबीर सिंह की पुत्री कुमारी शैलजा को इस कारण अपना गृह क्षेत्र त्यागकर अम्बाला का आसरा लेना पड़ा था। इस बदलाव से भी हरिजन मतदाताओं में रोष पनपा था। भले ही अशोक तंवर भी हरियाणा के झज्जर जिले के एक हरिजन परिवार से ताल्लुक रखते हैं, परन्तु प्रदेश के हरिजनों को तंवर में अपना रहनुमा नजर नहीं आया। हालाँकि यह प्रचारित भी किया गया कि एक नवयुवक हरिजन को प्रदेश अध्यक्ष की बागडोर सौंपी गयी है, परन्तु यह भी सर्वविदित है कि तंवर को यह बागडोर इसलिए नहीं सौंपी गयी कि वह हरियाणा के एक सामान्य हरिजन परिवार का पुत्र है, बल्कि इसलिए सौंपी गयी थी कि तंवर राहुल गाँधी का विश्वासपात्र है तथा दिग्गज कांग्रेसी नेता एवं देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा के दामाद ललित माकन का दामाद है। अशोक तंवर को स्थापित करने के चक्कर में सिरसा जिले में कुमारी शैलजा के पारिवारिक प्रभाव को भी कमजोर कर दिया गया, जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है। दोनों ही हरिजन क्षत्रपों अशोक तंवर तथा कुमारी शैलजा में इतना मादा नहीं है कि अपने दम पर कांग्रेस को सत्तासीन करवा सकें, वे केवल अपनी सीट तो निकाल सकते हैं पर इतने सक्षम नहीं हैं कि अपने किसी सहयोगी या चहेते को जीत दिलवा सकें।
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं गैर जाट की राजनीति के सहारे राजनीति के पीएचडी कहलाने वाले भजन लाल ने दलबदल के दांव पेचों से प्रदेश की गद्दी तो पा ली थी परन्तु कभी गाँधी परिवार के वफादार नहीं रहे। श्रीमती इंदिरा गाँधी के बुरे दिनों में साथ छोड़कर बाबू जग जीवन राम की कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी पार्टी का दामन थाम झूला झूलने वाले भजन लाल ने पुन: कांग्रेस का जहाज पकड़ लिया था। परन्तु स्वर्गवासी होने से पहले एक बार फिर कांग्रेस की पोटली से कूदकर अपनी अलग पार्टी ‘हरियाणा जनहित कांग्रेस (बीएल)’ का गठन कर अपने चहेते पुत्र कुलदीप बिश्नोई को प्रदेश की गद्दी पर बैठाने का सपना पाला था, जो जमीनी हकीकत पर पनप ना सका। कुलदीप बिश्नोई ने अपने पिता द्वारा गठित हरियाणा जनहित कांग्रेस की तरफ से वर्ष 2014 के विधानसभा चुनावों में प्रदेश की 90 में से 65 सीटों पर अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, जिनमें से 58 की जमानत जब्त हो गयी थी और अधिकतर के वोट सैंकड़ों से ऊपर नहीं जा पाए। खुद भजन लाल के परिवार से चुनाव लड़ने वाले स्वयं कुलदीप बिश्नोई तथा उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई को छोड़कर कोई भी जीत का मुंह नहीं देख पाया। भजन लाल का दूसरा पुत्र चंदर मोहन भजन लाल के ही गृह नगर हिसार के हलके नलवा से इनेलो के उम्मीदवार से हार गया तथा भजन लाल का भतीजा दूड़ा राम फतेहाबाद से पराजित हो गया। अपने दम पर राजनैतिक जहाज ना खे सकने के कारण भजन लाल सुत कुलदीप बिश्नोई ने पुन: कांग्रेस के दिग्गजों की शरण लेकर अपने दो विधायकों को वर्ष 2916 में कांग्रेस की टीम में शामिल कर दिया। अब उन्हें आभास हो गया था कि समुन्द्र के बिना नदी का कोई शरण स्थल नहीं है। हालाँकि कुलदीप बिश्नोई भी पिता के कदमों पर चलकर गैर जाट की राजनीति के सहारे प्रदेश की कुर्सी पाना चाहते हैं परन्तु अब उनकी खोखली जड़ें लोगों में प्रकट हो चुकी हैं और फिलहाल के माहौल में बिश्नोई की राजनीति मृतप्राय सी हो चुकी है, भले ही वे अपने को राजनैतिक रूप से जिन्दा सिद्ध करने के लिए छटपटाहट कर रहे हों।
हरियाणा कांग्रेस के एक अन्य क्षत्रप, राहुल गाँधी की मीडिया टीम के अगुआ एवं कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता, रणदीप सिंह सुरजेवाला अपने पिता शमशेर सिंह सुरजेवाला के राजनीतिक अनुभव एवं प्रभाव का लाभ उठाते हुए गाँधी परिवार की किचन कैबिनेट के विश्वासपात्र सदस्य हैं। परन्तु उनकी छवि मीडिया नेता से आगे नहीं स्थापित हो पाई है और उनका राजनैतिक प्रभाव क्षेत्र भी अपने विधानसभा हल्का कैथल से बाहर वोट बटोरने की क्षमता नहीं रखता। भले ही उनके भीतर प्रदेश की बागडोर संभालने की उत्कृष्ट इच्छा हिलोरें मार रही हो, मगर अभी जनमानस उन्हें प्रदेश स्तरीय प्रभाव वाला नेता स्वीकार करेगा, इसमें प्रदेश के राजनैतिक विश्लेषकों को शंका है।
हरियाणा के निर्माता कहलाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री एवं संजय गाँधी के नजदीकी सदस्य रहे चौधरी बंसीलाल के उत्तराधिकारी अपनी आपसी फूट के कारण ही अपने गृह जिले में भी हार का मुंह देखने को विवश हैं। बंसीलाल के अग्रज पुत्र रणबीर सिंह महिंद्रा जिले की बाढ़ड़ा हलका सीट से 2014 विधानसभा चुनाव में एक नौसीखिये भाजपा उम्मीदवार से धराशाही हो गए तथा बंसीलाल के ही एक दामाद सोमवीर सिंह हल्का लोहारू से दो बार लगातार 2009 तथा 2014 में पराजय का पलड़ा देख रहे हैं। बंसीलाल की पुत्र वधू एवं हुड्डा मंत्रीमंडल की सदस्य रह चुकीं किरण चौधरी की नाराजगी इन दोनों को पराजित करने में अहम भूमिका निभा चुकी है। दूसरी तरफ इन दोनों की नकारात्मक भूमिका के कारण बंसीलाल की पौत्री एवं किरण चौधरी की पुत्री श्रुति चौधरी भी 2014 के लोकसभा चुनावों में भिवानी लोक सभा क्षेत्र से हारकर मन मसोस कर रह गयी थीं। उतराधिकारियों द्वारा एक-दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में बंसीलाल की विरासत सारे हरियाणा से सिमटकर केवल एक हलके तोशाम तक संकुचित हो गयी है। हालाँकि किरण चौधरी की हाई कमांड तक डायरेक्ट पहुँच है तथा एक दबंग नेत्री की छवि भी जनता में है परन्तु भिवानी जिले से बाहर कमजोर राजनैतिक प्रभाव क्षेत्र तथा परिवार की आपसी फूट उन्हें प्रदेश की सर्वोच्च गद्दी पर बैठने में ब्रेक का काम कर रही है। पर मन की ललक चेहरे पर एवं उनके भाषणों में परिलक्षित अवश्य होती है, समय ही कोई संयोग बैठा दे तो अलग बात है।
हरियाणा कांग्रेस के दिग्गज नेता एवं वर्ष 2004 से 2014 तक लगातार दो पारियों में प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके भूपिंदर सिंह हुड्डा कांग्रेस की भीतरी फूट की विपरीत धाराओं में भी अपनी राजनीतिक नाव सफलतापूर्वक खेने हेतु दिन-रात एक कर रहे हैं। वे प्रदेश में लगातार यात्रायें व सभाएं करके अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाकर खुद का वोटबैंक तैयार कर रहे हैं। क्योंकि हुड्डा समर्थकों का मानना है कि हुड्डा पर भाजपा सरकार द्वारा कसे जा रहे जांच के शिकंजों से बचाने के लिए कांग्रेस हाईकमांड उनकी कोई प्रभावी मदद नहीं कर रही है। उल्लेखनीय है कि हुड्डा पर नेशनल हेराल्ड अखबार की कंपनी एजेएल तथा राबर्ट वाड्रा जमीन मामले में मुख्यमंत्री पद के दुरूपयोग के केस चल रहे हैं और हुड्डा को उनकी ही पार्टी के कुछ लोग इन मामलों की आड़ में कांग्रेस का मुख्य चेहरा बनने की राह में रोड़े अटका रहे है ताकि इस आधार पर उनका मार्ग प्रशस्त हो सके।
अब देखना यह है कि एक-दूसरे की टांग खिंचाई में कहीं कांग्रेस के ये क्षत्रप जिस डाल पर बैठे हैं उसी को ना काट डालें। यूं तो भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है किसी को मालूम नहीं है, पर इतना तो दिख ही रहा है कि कहीं क्षत्रपों की इस एक-दूसरे की पूंछ को अपने मुंह से काटकर पूंछ विहीन कर देने की राजनीति में सब पूंछ विहीन ना हो जाएँ और क्षत्रपों की इस लड़ाई में पार्टी का खो ना हो जाए।