गुजरात चुवाव पर प्रभावी रहा भावनात्मक वोट!

-डॉ. भरत मिश्र प्राची

हिमाचल प्रदेश एवं गुजरात राज्य के चुनाव परिणाम आ चुके है जहां भाजपा को बहुमत मिला है। हिमाचल प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर के कारण पूर्व में ही सत्ता परिवर्तन के लक्षण पहले से ही आ रहे थे, चुनाव उपरान्त भाजपा की जीत इस बात की प्रतीक है पर गुजरात में भाजपा की जीत वहां की पूर्व भाजपा सरकार की कार्यशौली पर न होकर भावनात्मक प्रभाव से प्रभावित रही जहां पूरे चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री भावना की धारा में गुजरात की जनता को डुबोते रहे जहां गुजरात की जनता नोटबंदी एवं जीएसटी के उभरे दर्द को भूल गई। जिसका परिणम रहा जो गुजरात में पूर्व में विकास के नाम वोट बरसे थे , इस चुनाव में विकास की जगह भावनात्मक वोट ज्यादा पड़े जो भाजपा को फिर से सत्ता तक पहुंचा गये । इस तरह के हालात का सारा का सारा श्रेय नरेन्द्र मोदी को जाता है। गुजरात चुनाव में जब गुजरात का बेटा शामिल हो और जहां उसकी प्रतिष्ठा का सवाल हो, चुनाव में भावनात्मक पहलू का जागृृत होना स्वाभाविक है। गुजरात चुनाव में कुछ ऐसा ही देखने को मिला।

गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी का एक नया स्वरूप उजागर हुआ जो एक नई पृष्ठभूमि को उजागर करता है जहां वे अपने पुराने चोला को उतार कर नये तेवर के साथ अक्रामक भूमिका में अपने विपक्ष पर प्रहार करते दिखते रहे जिससे ऐसा लगने लगा कि कांग्रेस के अब अच्छे दिन लौटने वाले है। गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी का वर्तमान तेवर एक परिपक्व नेतृत्व की झलक दे रहा है जहां वे सत्ता पक्ष को घेरते हुए अपनी बात गुजरात की जनता के समक्ष रखने में जरा सा भी नहीं हिचकते एवं दृढ़ विश्वास के साथ जनमत को अपनी ओर आकर्षित करते हुए नजर आते दिख रहे है। उनके इस तेवर से सत्ता पक्ष भी तिलमिला गया । इस तरह के हालात ने गुजरात चुनाव पर मुद्दों के वजाय भावनात्मक प्रभाव उजागर करने का प्रयास करने के लिये सत्ता पक्ष को मजबूर कर दिया । जिस परिवेश को हवा राहुल के अपने ही लोगों ने ही दी । इस तरह की विषम चुनौतियों को झेलते हुए राहुल गांधी ने अपने तेज तेवर शालीनता के सथ बनाये रखा। इस दौरान पूर्व की भांति कहीं भी वे उतेजित नजर नहीं आये। इस तरह के हालात ने कांग्रेस को गुजरात में सत्ता के करीब लाकर खड़ा कर दिया । इससे कांग्रेसियों में एक नया उत्साह पैदा हुआ है। इसे वे गुजरात में अपनी जीत मानकर चल रहे है। जिसका प्रभाव आगामी चुनावों पर पड़ेगा ।

राहुल गांधी के नये तेवर के साथ गुजरात चुनाव सम्पन्न हो गये जिसपर पूरे देश की नजर टिकी रहीं। ,जहां पूरे समय तक सत्ता पक्ष पर वे प्रहार करते रहे। अब परिणाम भी सामने है। गुजरात चुनाव में जीत भले ही भाजपा की रही हो पर राहुल गांधी पूरे चुनाव में प्रमुख भूमिका में कुशल नेतृत्व में उभरते दिखाई दिये जिसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पूरे समय गुजरात में रहने पर मजबूर ही नहीं कर दिया बल्कि विचलित भी कर दिया जहां वे अपने गरिमापूर्ण पद से भटकते नजर आये।राहुल गांधी के नेतृृत्व में एक नये तेवर की झलक मिली है, जहां से कांग्रेस के अच्छे दिन की शुरूआत हो सकती है। गुजरात चुनाव का परिणाम कांग्रेस के पक्ष में जैसा भी गया , पहले से बेहतर माना जा सकता है जिसका सारा श्रेय राहुल गांधी के नेतृृत्व को मिलता है । जहां पूरे देश में कांग्रेस के अस्तित्व को फिर से स्थापित करने में पूरी मदद मिल सकती है। गुजरात में कांग्रेस सत्ता के आस – पास दिखाई दे रही है तो भी कांग्रेस की यह सफलता ही मानी जायेगी। गुजरात में मिली भाजपा की इस सफलता में निश्चित तौर पर गुजरात के लोगों का भावनात्मक पक्ष जुडा हुआ है़। इस तरह के हालात देश के अन्य भागों में नहीं उभरेंगे, जहां विधान सभा के चुनाव होने हैं। वहां गुजरात चुनाव में राहुल गांधी के द्वारा उठाये नोटबंदी एवं जीएसटी मुद्दे जीवन्त हो चलेंगे ,जहां कांग्रेस को सफलता मिल सकती है।

गुजरात चुनाव उपरान्त आये परिणाम पर चर्चा के दौरान भाजपा द्वारा जीत का सेहरा विकास के नाम दिया रहा है जबकि वास्तव में गुजरात में भाजपा की जीत के सही वारिस भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी एवं कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर है जिन्होंने गुजरात चुनााव को भावनात्मक रंग दे दिया । इस वास्तविक तथ्य का नजारा चर्चा के दौरन आ तो रहा है पर भाजपा के गले नहीं उतर रहा है। वह इस जीत को विकास की जीत मान रही है। जबकि गुजरात चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा कहीं से भी विकास मुद्दे की बात उभर कर सामने नहीं आई। कारण कुछ भी हो, आकड़े जो भी हो , चुनाव में जो जीता वहीं सिकन्दर होता है। चुनाव के परिणाम को ईवीएम से भी जोड़ा जा रहा है। जहां ईवीएम के आकड़े पर संदेहात्मक तर्क दिया जा रहा है। जबकि इस तरह के तर्क बेबुनियादी माने जा सकते है। जीत तो ईवीएम सही, हार तो गलत । इस तरह के प्रसंग भविष्य में भी उठते रहेंगे। गुजरात के चुनाव निश्चित तौर पर भविष्य में होने वाले चुनाव में राजनीतिक दलों की रूप रेखा तय करेंगे। जहां केवल विकास का ही मुद्दा निर्णायक पृष्ठभूमि में होगा।