गुजरात में सत्ताधारी भाजपा को चुनौती देती कांग्रेस

रहीम खान

भारत में अर्थ व्यवस्था की मजबूती के लिये महत्वपूण् माने जाने वाले गुजरात राज्य विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। प्रथम दृष्टि में राज्य के पूरे राजनीतिक परिदृश्य पर नजर दौडाई जाय तो हम पाते है कि सत्ताधारी भाजपा की पकड़ बहुत मजबूत है। संख्या के आधार पर भी सारे समीकरण भाजपा के पक्ष में है। जैसे 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश के सभी 26 सीटों पर भाजपा के सांसद है, राज्यसभा 4 में से 3 पर भाजपा के सदस्य है। वहीं 2012 के विधानसभा चुनाव में 43.9 प्रतिशत वोट शेयर के साथ भाजपा को 115 एवं 38.9 प्रतिशत शेयर के साथ कांग्रेस को 61 सीट मिली थी। जबकि लोकसभा 2014 में 60.1 प्रतिशत वोट शेयर के भाजपा को 26 और 33.5 प्रतिशत वोट शेयर के साथ कांग्रेस को किसी भी सीट पर जीत प्राप्त नहीं हुई थी। इसी तारतम्य में 3 माह पूर्व राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस को शून्य पर पहुंचाने के लिये भाजपा ने योजनाबद्ध तरीके से कांग्रेस के 15 विधायक को तोड दिया था। इसके बावजूद अहमद पटेल लडखडाते हुए सही पर अपनी सीट बचाने में कामयाब हो गये।

लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव जो समय पूर्व ही हाईप्रोफाइल बन गये यहां पर प्रदेश की राजनीति में कमजोर दिखने वाली कांग्रेस पार्टी ने स्थानीय समीकरणों के आधार पर पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, दलित नेता जिग्नेश मेवानी, ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर और आदिवासी नेता छोटू भाई वासवा के साथ हाथ मिलाकर जिस नये समीकरण के साथ चुनावी मैदान में प्रवेश किया उसने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से सत्ताधारी भाजपा के माथे पर सिलवटे ला दी है। हालांकि हार्दिक पटेल ने कांग्रेस को प्रत्यक्ष रूप से अपनी शर्तो के आधार पर समर्थन किया है। इसमें उनके कुछ साथियों को टिकट भी दी गई है परन्तु वह कांग्रेस के साथ चुनावी सभा में भाग नहीं लेगें। अपने बनाई लाईन पर ही काम करेगें जबकि दूसरे नेता कांग्रेस के साथ हमकदम बनकर चुनावी अभियान को गति प्रदान करने में लगे हुए है। गुजरात में केन्द्र की भाजपा सरकार के नोटबंदी, जीएसटी जैसे निर्णय ने व्यापारी वर्ग को बुरी तरह प्रभावित किया है। इतना ही नहीं गुजरात विकास अर्थात मॉडल की जो बात की जाती थी वह भी सब हवा हवाई लग रही है। यही कारण है कि कांग्रेस का दिया नारा विकास पागल हो गया गुजरात की जनता के दिलो दिमाग पर गहरा असर छोड रहा है। जिस समय चुनाव अभियान का श्रीगणेश हुआ उस समय हर तरह से भाजपा निश्चित थी कि उसे यहां पर कोई चुनौती नहीं है परन्तु अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल गई है। जिसको ध्यान में रखते हुए स्वयं प्रधानमंत्री प्रदेश में 30 से ज्यादा रैली उनके मंत्रीमंडल के आधे सदस्य भाजपा शसित राज्यों के 10 से ज्यादा मुख्यमंत्री, प्रदेश की सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए तैनात किये गये है। कांग्रेस के युवा सांसद राहुल गांधी ने अपनी कार्यप्रणाली में भारी सुधार लाते हुए जो नई शैली में राजनीतिक कार्यो में सक्रियता बनाई है उससे उनके प्रति लोगों की धारणा बदल रहीं है। और जनता में भी इस बात की चर्चा है कि विरासत में मिली राजनीति के गुणों को संभालने में राहुल गांधी अपने आप को फिट कर रहे है। हालांकि कांग्रेस के लिये सब कुछ इतना आसान वहां बिल्कुल नहीं है।

गुजरात के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जिस प्रकार से कांग्रेस को वही दूसरे घिसे पीटे आतंकवाद, पाकिस्तान के मुद्दों पर घेरने का प्रयास किया जा रहा है वह जनता में गहरा असर छोड़ता नजर नहीं आ रहा है। उनका वंशवाद के खिलाफ विकास की लडाई की बात भी इसलिये फिकी साबित हो रही है कि स्वयं भाजपा के भीतर अनेक राजनेताओं के पुत्र और परिवार के सदस्य आज सत्ता की चाशनी चख रहे है। भाजपा का चुनाव अभियान देखते हुए लग रहा है कि कहीं न कहीं गुजरात में उनका आत्मविश्वास डगमगा गया है। जिसके चक्कर में वह यह निर्णय नहीं ले पा रहे है कि किस तरह से अपने विरोधियों की बातों को बेअसर किया जाये। भाजपा के मजबूत वोट बैंक कहे जाने वाले पाटीदार, ओबीसी और दलित वर्ग का आज उससे दूर छिटकते जा रहे हें जिसको सहेजने के कारण भाजपा को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में भाजपा के भीतर सत्ता की लड़ाई तेज हुई है। भले ही वह सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं पड़ती परन्तु नेताओं में वर्चस्व के लिये आपसी खींचातानी बढ़ी है। टिकट वितरण में भी जिस प्रकार से भाजपा के भीतर नाराजगी देखने मिली वह इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। हालांकि भाजपा नेताओं के द्वारा गुजरात चुनाव को साम्प्रदायिकता की ओर मोडने के लिये अनाप शनाप बेतुकी बयानबाजी करके पुराने घीसेपीटे मुद्दे को रेस करने में लगे हुए है। इसके बावजूद कांग्रेस की सभाओं को जिस प्रकार का जनसमर्थन प्राप्त हो रहा है अगर यह माप वोटों में तब्दील हो गया फिर सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं शत प्रतिशत बढ जायेगी हार्दिक पटेल और उनकी तिकड़ी को पस्त करने के लिये भाजपा जितने भी प्रयास कर रही है उसको उतना प्रभावशील समर्थन प्राप्त नहीं हो रहा है। भाजपा का लाभ पहुंचाने के नजरिये से कांग्रेस से अलग हुए शंकर सिंह वाघेला की पार्टी का पूरे चुनाव अभियान में कहीं कोई अता पता नहीं है।

भले की गुजरात में जातिगत समीकरणों का जो खेल है उसमें 2 प्रतिशत ब्राम्हण, 2 प्रतिशत बनिये, 5 प्रतिशत राजपूत, 12 प्रतिशत पाटीदार, 8 प्रतिशत दलित, 15प्रतिशत आदिवासी, 40 प्रतिशत ओबीसी और 16 प्रतिशत अन्य शामिल है। कच्छ में जहां 54 सीटों में 22 सीटे पटेल और 27 सीट ओबीसी, मध्य गुजरात की 68 सीटों में 18 सीटे आदिवासी बाहुल्य, 16 सीटों पर ठाकुर, कोली का प्रभुत्व है, 15 सीटों पर पाटीदार व 6 सीटों पर मुस्लिमों का दबदबा है। उत्तर गुजरात की 32 सीटों पर 12 में पाटीदार, 10 पर ठाकुर, एवं 4 सीटों पर आदिवासी व 1 सीट पर अनुसूचित जाति का वर्चस्व है। दक्षिण गुजरात की 28 सीटों में अधिकतर पर आदिवासी मतदाता ही निर्णायक होते है। 6 सीट पर पाटीदार और 6 सीट पर कोली पटेल एवं 1 सीट पर अनुसूचित जाति का प्रभुत्व माना जाता है। इन सब में पटेल और पाटीदार जो भाजपा के मजबूत वोट बैंक माने जाते है आज उनमें बाहरी तौर पर बिखराव दिख रहा है यह वोटों में किस प्रकार परिवर्तित होता। फिलहाल कुछ कहना जल्दबाजी होगी।

बहरहाल दो चरणों में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम पर 18 दिसम्बर को सभी की नजरे लगी रहेगी क्योंकि यहां के चुनाव परिणाम अगर परिवर्तित होते है तो आने वाले लोकसभा चुनाव और उसके पूर्व मध्यप्रदेश छत्तीसगढ राजस्थान विधानसभा चुनाव नतीजे पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावनाएं बढ जायेगी। इसलिये भाजपा साम दाम दंड भेद का उपयोग करते हुए हर हाल में यहां जीतने के लिये एड़ी चोटी की मेहनत कर रही है। उसका खेल बिगाडने के लिये हार्दिक पटेल तिकडी रास्ते में सबसे बड़ा रोडा बनी हुई है। इस तीकडी पर जनमानस पर जितना प्रभाव होगा उतना ही नुकसना भाजपा और लाभ कांग्रेस के खाते में जायेगा। स्थानीय निकायों के चुनाव में गुजरात के भीतर कांग्रेस को जो समर्थन प्राप्त हुआ उसने उसके आत्मविश्वास को मजबूती प्रदान करने का प्रयास किया है। हालांकि सोशल मीडिया केम्पन में कांग्रेस हर तरह से भाजपा को मात देने में सफल रही है। पिछले चुनाव उससे लग इस चुनाव में कांग्रेस की रणनीतियां भाजपा को नेक टू नेक मात देने की बनने से चुनाव रोचक हो गया है। भले ही सत्ता के सारे समीकरण भाजपा के पक्ष में दिख रहे हो। परन्तु जैसे जैसे मतदान की तारीख निकट आ रही है। वैसे वैसे परिस्थितियां भी बदल रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिये यह चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। अगर भाजपा सरकार बनाने में सफल हो गई तो इनका प्रभाव और अधिक बढ जायेगा। अगर विफल हो गये तो फिर पार्टी के भीतर बगावत के सुर उठेगें। गुजराज की सियासी जंग में एक तरफा लगने वाले राजनीति का यह मुकाबला आज बराबरी पर आकर खडा हुआ है। पाटीदार ओबीसी और दलित आंदोलन के साथ नोटबंदी, एवं जीएसट जैसे निर्णय से नाराज व्यापारी वर्ग अंतिम क्षणों में क्या निर्णय लेते है या यूं कहे कि इनका समर्थन जिस तरफ झुकेगा वहीं दल प्रदेश की सत्ता में जीत का परचम लहरायेगा। गुजरात की प्रतिकूल राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस ने अपने आप को वहां ठोस विकल्प के रूप में सहयोगियों के माध्यम से खड़ा तो कर लिया है लेकिन जनसमर्थन उनके साथ कितना जायेगा यह सवालों के घेरे में है।