झाड़ू-पोंछा करने वाली महिला बन गई लेखिका, चुनौती भरा संघर्ष

नई दिल्ली : झाड़ू-पोंछा करने वाली महिला ‘आलो आंधारि’ नाम की किताब लिखी। दिल्ली के पास गुड़गांव के एक घर में काम करती थी। झाड़ू-पोछा करने और खाना बनाने के साथ इसी घर में बेबी हालदार ने किताब लिखी। लोग आज उन्हें मशहूर लेखिका के तौर पर जानते हैं। कई मुश्किलों का सामना करते हुए भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनकी अब तक चार सफल किताबें छप चुकी हैं। वास्तव में ‘आलो आंधारि’ बेबी हलदार की दुख भरी जिंदगी का दास्तान है। 12 साल की उम्र में बेबी की अपने 14 साल बड़े आदमी के साथ शादी हो गई। 13 साल की उम्र में एक बच्चे को जन्म दिया। कम उम्र में वह 3 बच्चों की मां बन गई। पति खूब प्रताड़ित करता था। एक दिन तंग आकर उन्होंने अपने बच्चों को लेकर कहीं दूर जाने का फैसला कर लिया। शादी से पहले भी उनकी जिंदगी आसान नहीं थी। उनकी सौतेली मां थी जिसने भी कम प्रताड़ित नहीं किया था। बच्चों को लेकर एक नए संघर्ष पर निकल चुकी बेबी हलदार ने पेट पालने के लिए लोगों के घर का काम शुरू किया। बेबी को प्रोफेसर प्रबोध कुमार के घर काम करने का मौका मिला और यहीं से उनकी जिंदगी बदली। प्रो. प्रबोध कुमार के घर ही कामवाली बाई से लेखिका बनीं। उसे पढ़ने का शौक था। काम के साथ-साथ वह प्रोफेसर के घर रखी किताबों को देखती थी। कुमार ने भी उन्हें पढ़ाई को लेकर उसे प्रोत्साहित किया और अपनी जिंदगी के बारे में लिखने के लिए प्रेरित किया। बस फिर क्या था दिनभर घर का काम करती और समय निकालकर लिखती रहती। मन की बातें शब्दों में वह पिरोने लगी। धीरे-धीरे उसने अपनी जिंदगी की पूरी कहानी लिख डाली। प्रबोध जी ने उनकी कहानी को पढ़ा और बाद में उसे किताब का रूप दे दिया और नाम ‘ आलो आंधारी’ रखा गया। जिस प्रोफेसर प्रबोध कुमार ने बेबी हलदार का पूरा साथ दिया, वह एंथ्रोपोलॉजी के एक रिटायर्ड प्रोफेसर हैं। वही उनके अनुवादक है और हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक मुंशी प्रेमचंद के पोते हैं।
गौरतलब है कि बंगाली में लिखा गया उनका जिंदगी नामा पहले हिंदी में प्रकाशित हुआ। बाद में किताब का अंग्रेजी में ‘अ लाइफ लेस्स ऑर्डिनरी’ नाम से अनुवाद किया गया। लोगो ने इसे खूब पसंद किया।न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनकी आत्मकथा को ‘Angela’s Ashes’ का भारतीय संस्करण लिखा है। धीरे-धीरे इस किताब को कई भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवादित किया गया। लेखिका बनने के बाद बेबी हलदार को पेरिस और फ्रैंकफर्ट जैसी जगहों पर जाने का मौका भी मिला। वह कई साहित्यिक समारोहों का हिस्सा भी बनीं। दुनिया के कई देशों में लिट्रेचर फेस्टिवल में शामिल हो चुकी हैं।