टॉयलेट- एक मिशन कथा

-नवीन जोशी

“दरवाजा बंद करो भई, दरवाजा बंद. दरवाजा बंद करो, बीमारी बंद…” अमिताभ बच्चन अपने निराले अंदाज़ में गाते हैं। गाते क्या हैं, देशवासियों को ललकारते हैं कि खुले में शौच करना बंद करो, शौचालय बनवाओ और उसका इस्तेमाल करो ताकि बीमारियां न फैलें। उधर, विद्या बालन मक्खियों से बतियाती सुनाई देती हैं- “अब देखो यहां तुम गन्दगी पर बैठी हो, फिर मुन्ने के खाने पर बैठोगी और उसे बीमार करोगी।” दादी को हैरत होती है- “हाय दैया, विद्या बालन मक्खियों से बतिया रही हैं” तो मैडम बालन जवाब देती हैं-“क्या करूं दादी, आप लोग तो सुनेंगी नहीं, सोचा मक्खियों को ही समझा दूं।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन साल से भाषण दे रहे हैं। लाखों शौचालय बना दिये हैं उन्होंने। राज्यों के मुख्यमंत्री ‘खुले में शौच मुक्त’ गांवों की घोषणा करते जा रहे हैं। अपने उत्तर प्रदेश के संन्यासी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी बड़े जोश में 2018 तक पूरे प्रदेश को ‘खुले में शौच मुक्त’ करने की घोषणा कर चुके हैं।
प्रधानमंत्री से प्रेरणा लेकर एक फिल्म भी बन चुकी है- “टॉयलेट- एक प्रेम कथा”। मजेदार फिल्म है। नायिका को शादी के बाद ससुराल में शौचालय नहीं मिलता। गांव की दूसरी महिलाओं की तरह मुंह अंधेरे लोटा लेकर खुले में जाना उसे मंजूर नहीं और मथुरा के पण्डित ससुर जी को घर में शौचालय बनवाना घोर पातक लगता है। कुछ रोचक नाटकीय प्रसंग हैं। जैसे- कुछ दिन सुबह-सुबह नायक-नायिका की मोटरसाइकिल पर रेलवे स्टेशन तक की दौड़ ताकि नायिका वहां दो मिनट रुकने वाली ट्रेन के शौचालय का प्रयोग कर सके। अंत अति नाटकीय है, जिसमें फिल्मकार मोदी जी से भी ज्यादा जोश से घर-घर शौचालय बनवाने का प्रेरक भाषण झाड़ता है। इतने संदेशों के बावजूद लखनऊ के नयी-नवेली मेट्रो में एक बुजुर्गवार अपनी धोती समेटे डिब्बे के भीतर सू-सू करते मोबाइल कैमरे में दर्ज कर लिये जाते हैं। वह वीडियो वाट्स-ऐप पर वायरल हुआ। अब उन बेचारों का क्या दोष? ट्रेनें हमारे यहां लघु और दीर्घशंका के लिए बहुत उपयुक्त जगह मानी जाती रही हैं।
“टॉयलेट- एक प्रेम कथा” की नायिका ही नहीं, ट्रेनों के शौचालय हमारे देश में बहुत सारे लोगों को बड़ी राहत प्रदान करते हैं। जनता को हैरत है कि मेट्रो के आलीशान कोच में टॉयलेट क्यों नहीं बनवाये गये! मेट्रो वालों ने विदेशी कोच मंगवा लिए या उसकी तर्ज पर अपने यहां डिब्बे बना लिए। उन्होंने भारतीय यात्रियों का ध्यान रखा ही नहीं।
सुनते हैं, पता नहीं सच है या कोरी गप्प, कि शुरू में ट्रेन में शौचालय नहीं होते थे। कुछ समय पहले हमें एक ई-मेल मिला था, जिसमें वह मजेदार किस्सा बखाना गया था जिसके कारण ट्रेन के डिब्बों में शौचालय बनवाये गये। किस्सा यूं है कि एक बंगाली महाशय (सरदार जी नहीं !) ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। सुबह किसी स्थान पर ट्रेन रुकी तो वे उतर कर पास के खेत में शौच के लिए चले गये। इतमीनान से निपट रहे थे कि ट्रेन ने सीटी दी और चल पड़ी। बंगाली महाशय अधखुली धोती समेटे, लोटा थामे ट्रेन के पीछे-पीछे भागे, चीखते-चिल्लाते। ट्रेन नहीं रुकी। इस घटना या कहिए दुर्घटना के बाद बंगाली बाबू ने टूटी-फूटी अंग्रेजी में अपना दुखड़ा रेलवे मिनिस्टर को लिखा। उस चिट्ठी का मजमून बड़ा मजेदार था। खैर, कहते हैं कि रेलवे मिनिस्टर साहब उस शौच-दर्द से द्रवित हो गये और उन्होंने ट्रेनों में शौचालय बनवाने के आदेश जारी कर दिये।
अपने देश की विशाल आबादी रोज सुबह ट्रेन-यात्रा तो कर नहीं सकती। सो, वह लोटा-डिब्बा लेकर ट्रेन की पटरियों के किनारे-किनारे बैठ जाती है। पटरियों के किनारे सुबह-सुबह जो दृश्य दिखाई देता है, वह विश्वविख्यात है। कई विदेशी यात्री उस पर रोचक टिप्पणियां लिख चुके हैं। पटरियों के दोनों तरफ रेलवे की जमीन पर अवैध रूप से बसी झुग्गी-झोपड़ियों वाले ही नहीं, साहबों की कोठियों के चाकर, बाइयां, होटलों-ढाबों के सेवक भी डिब्बा-बोतल लेकर सुबह-सुबह पटरियों की तरफ दौड़ते हैं।
अमिताभ बच्चन का गाना सुनकर ट्रेन की पटरियों के किनारे बैठे लोग क्या सोचते हैं? विद्या बालन के डॉयलॉग सुनकर दादी और उनकी बहू-बेटियां हंसती हैं या गम्भीर होती हैं? हो सकता है, उनमें से ज्यादातर लोग सामने रखे डिब्बे या बोतल को देखते हुए अमिताभ वाला गाना गुनगुनाते हों। अभिनेताओं के गाने या अभिनेत्रियों के डॉयलॉग का जीवन के यथार्थ से क्या कोई सम्बंध होता है? वे रूपहले पर्दे पर जो-जो करते-कहते हैं, वैसा हमारे जीवन में तो होता दिखता नहीं! मनोरंजन अवश्य हो जाता है।
इसीलिए तो प्रशासन के दवाब में शौचालय बनवा लेने के बावजूद बहुत सारे लोग खेतों और पटरियों की तरफ ही दौड़ रहे हैं। अब नारा चूंकि प्रधानमंत्री जी ने दिया है, इसलिए प्रशासन सुबह-सुबह खुले में निपटने जा रहे लोगों को दौड़ा रहा है। बिजनौर से खबर आयी थी कि वहां नगर पालिकाओं के कर्मचारी खुले में बैठे लोगों की तरफ टॉर्च चमकाते हैं, सीटी बजाते हैं। रिश्वत का नया बहाना यह बना या नहीं, अभी किसी चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया नहीं!.
सबसे मजेदार खबर रांची से आयी है। वहां खुले में निपटने वाले आदमियों की लुंगी छीन ली जा रही है। रांची नगर निगम ने इस अभियान का नाम “हल्ला बोल, लुंगी खोल’ रखा है। ताकि निपटने वाले बिना लुंगी घर लौटें तो शर्म खाएं। कहीं-कहीं उनका लोटा-डिब्बा लूट लिया जा रहा है। स्वच्छ भारत मिशन का सर्वोत्तम पुरस्कार टॉर्च चमकाने वालों को मिलेगा या लुंगी लूटने वालों को?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)