तीन तलाक पर एनडीए में ‘तलाक’ के आसार!

राजीव रंजन तिवारी

तीन तलाक के मुद्दे पर केन्द्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटकों के विरोध कारण पशोपेश में पड़ी सरकार को हार का मुंह देखना पड़ा। समझा जा रहा है कि यदि मोदी सरकार तीन तलाक के मुद्दे पर घटक दलों के अनुरूप अपनी रणनीति नहीं बनाती है तो संसद से बाहर भी उसके सहयोगी सियासी दोस्ती को ‘तीन तलाक’ बोल सकते हैं। संसद का गत 15 दिसंबर से शुरू हुआ शीतकालीन सत्र 5 जनवरी को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इस दौरान कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए लेकिन एक बार में तीन तलाक को फौजदारी अपराध बनाने के प्रावधान वाला महत्वपूर्ण विधेयक लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में लंबित हो गया क्योंकि एकजुट विपक्ष इसे प्रवर समिति में भेजने की मांग पर अड़ा रहा। लोकसभा ने एक बार में तीन तलाक या तलाक-ए-बिद्दत को फौजदारी अपराध बनाने के प्रावधान वाले मुस्लिम महिला विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया था। किन्तु राज्य सभा में यह लंबित हो गया क्योंकि एकजुट विपक्ष इसे प्रवर समिति में भेजने की मांग पर अड़ा रहा। आपको बता दें कि सरकार ने तीन तलाक बिल इस सत्र में लोकसभा में पेश किया। मुस्लिम महिला विधेयक, 2017 नामक इस बिल के प्रावधान के मुताबिक इस्लाम धर्म में कोई भी शख्स यदि अपनी पत्नी को तीन तलाक देगा तो उसे तीन वर्ष तक की कैद हो सकती है। अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में तीन तलाक को अमान्य घोषित कर दिया था, जिसके बाद सरकार ने इस संबंध में कानून बनाने का फैसला किया। जैसी कि आशा थी, बिल पेश होने के साथ ही इसका विरोध भी शुरू हो गया।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कई अन्य संगठनों को इस बात पर आपत्ति है कि बिल लाने से पहले सरकार ने संबंधित पक्षों से राय-मशविरा नहीं किया। लेकिन विपक्षी राजनीतिक दल बिल की जरूरत को स्वीकार करते हुए बिल के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति कर रहे हैं। कांग्रेस ने एक बार में तीन तलाक का दावा साबित करने का जिम्मा पीड़ित महिला के बजाय पति पर डालने का सुझाव दिया है। उसकी एक बड़ी आपत्ति सजा वाले प्रावधान पर भी है। कानून विशेषज्ञों का कहना है कि पति के जेल चले जाने के बाद पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण की समस्या पैदा हो जाएगी। पति अगर नौकरी में हुआ तो जेल जाते ही वह बर्खास्त हो जाएगा और उसकी तनख्वाह रुक जाएगी। अगर वह कारोबारी हुआ तो भी उसकी आमदनी पर असर पड़ेगा। ऐसे में बीवी-बच्चों का जीवन कैसे चलेगा? इस आशंका से महिलाएं ऐसे मामलों में सामने आने से कतराएंगी। महिला पति की संपत्ति से गुजारा भत्ता ले सकती है या नहीं, इस बारे में प्रस्तावित कानून में कोई प्रावधान नहीं है। इस मामले में तलाक अधिकार संरक्षण कानून, 1986 भी लागू नहीं होगा, क्योंकि वह तलाक के बाद की स्थिति में गुजारा भत्ते के लिए बनाया गया था। यूं कहें कि संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार आखिरकार तीन तलाक संबंधी विधेयक राज्यसभा से पारित नहीं करा सकी, जबकि यह लोकसभा में पारित हो चुका है। राज्यसभा में बिल लंबित रहने के कारण अब सरकार के पास इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए बहुत सीमित विकल्प हैं। सरकार के पास एक ही विकल्प है कि वह अध्यादेश जारी कर दे। लेकिन यह उच्च सदन के प्रति असम्मान होगा। आमतौर पर अध्यादेश तब जारी किया जाता है जब सत्र न चल रहा हो और बिल को सदन में पेश न किया गया हो। उन्होंने कहा, ‘जब सदन में विधेयक पेश कर दिया गया हो तो इस पर अध्यादेश लाना सदन के प्रति सम्मान नहीं समझा जाता, लेकिन पूर्व में कुछ ऐसे उदाहरण रहे हैं कि सदन में विधेयक होने के बावजूद अध्यादेश जारी किया गया। दरअसल, राज्यसभा में विपक्ष बिल को सिलेक्ट कमिटी को भेजने की मांग पर अड़ गया, जिससे सरकार इसे पारित नहीं करा सकी। हालांकि सरकार ने उच्च सदन में इसे चर्चा के लिए रख दिया है। सरकार इस विधेयक को सिलेक्ट कमिटी के पास भी भेज सकती थी।

सरकार के पास यह विकल्प भी था कि विपक्ष जो कह रहा है उसके आधार पर वह स्वयं ही संशोधन ले आती। सुप्रीम कोर्ट वरिष्ठ वकील और राज्यसभा में कांग्रेस सदस्य विवेक तनखा भी मानते हैं कि इस बारे में अध्यादेश लाने के लिए कानूनी तौर पर सरकार के लिए कोई मनाही नहीं है। हालांकि परंपरा यही रही है कि संसद में लंबित विधेयक पर अध्यादेश नहीं लाया जाता। सुप्रीम कोर्ट ने 6 माह में कानून बनाने का जो आदेश दिया था, वह अल्पमत का दृष्टिकोण है। इस बारे में बहुमत वाले दृष्टिकोण में इसका कोई जिक्र नहीं है। कांग्रेस का मानना है कि इस मामले में जल्दबाजी दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर जो रोक लगाई है, वह स्वयं अपने में एक कानून है। गौरतलब है कि तीन तलाक पर सियासी घमासान के आसार थे। शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन यह हंगामें की भेंट चढ़ गया, क्योंकि विपक्ष कांग्रेस समेत एनडीए के घटक दल तेलुगुदेशम पार्टी, बिजू जनता दल भी कमर कसे हुए थे। कांग्रेस ने व्हीप जारी कर अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने के निर्देश दिए थे। संसद के ऊपरी सदन में मजबूत विपक्ष इस बिल को सिलेक्ट कमिटी में भेजने पर अड़ा था, वहीं सरकार इस पर झुकने को तैयार नहीं थी। वहीं बीजेपी ने भी व्हीप जारी कर अपने सांसदों से सदन में रहने को कहा था। अब इसे बजट सत्र तक का इंतजार करना पड़ सकता है। टीएमके सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि सरकार तीन तलाक के मुद्दे पर सिर्फ राजनीति करना चाहती है। तीन तलाक प्रथा के खिलाफ आए विधेयक पर राजनीतिक दलों के बीच पिछले दिनों जो सहमति दिखी थी, अब उसमें दरार दिख है। लोकसभा में इसे सत्तापक्ष के साथ ही लगभग पूरे विपक्ष का भी साथ मिला था। इसी आधार पर यह संभावना थी कि राज्यसभा में भी यह आसानी से पारित हो जाएगा। लेकिन इससे उलट विधेयक पर गतिरोध ही नजर आया। विपक्ष इसे प्रवर समिति को भेजने की मांग पर अड़ा रहा। जबकि सरकार इसे पारित कराने की नाकाम कवायद करती रही। राज्यसभा में सत्तापक्ष का बहुमत नहीं है। लिहाजा, विपक्ष की सहमति न होने से विधेयक फिलहाल लटक गया।

राज्यसभा में 3 जनवरी को विपक्ष अपनी पूरी तैयारी से और पूरे संख्याबल के साथ मौजूद था और सदन में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने सभापति से कहा कि वे चाहें तो विधेयक प्रवर समिति को सौंपने की मांग पर मत-विभाजन करा लें। ऐसा कराना सत्तापक्ष के लिए खतरे से खाली नहीं होता, क्योंकि बीजू जनता दल, अन्नाद्रमुक और तेलुगू देशम जैसी पार्टियां भी विधेयक को मौजूदा स्वरूप में पारित कराने के पक्ष में नहीं हैं। अगर प्रवर समिति के मसले पर मत-विभाजन होता, तो सत्तापक्ष की किरकिरी भी हो सकती थी। दूसरी तरफ, इसमें विपक्ष की एक राजनीतिक जीत नजर आती। आखिरकार यह विधेयक इस बार पारित नहीं हो सका। इसका अर्थ है कि बजट सत्र में भी इस पर रस्साकशी होगी। क्या सरकार की इसमें दिलचस्पी है, क्या सत्तापक्ष को इसमें कोई लाभ दिख रहा है? उत्तर प्रदेश के चुनाव से लेकर अब तक भाजपा जिस तरह से लगातार तीन तलाक के मुद्दे को जोर-शोर से उठाती रही है, उससे उसकी दिलचस्पी जाहिर है। एक तरफ वह मुसलिम महिलाओं की हितैषी दिखना चाहती है और दूसरी तरफ, अपने को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले दलों को सांसत में रखना चाहती है। विधेयक के मौजूदा स्वरूप का विरोध अगर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियों तक सीमित रहता, तो भाजपा की रणनीतिक राह आसान होती। लेकिन जिस तरह से विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर अन्नाद्रमुक और तेलुगू देशम जैसी पार्टियां भी नाराज हैं उससे विधेयक की राह तो मुश्किल हुई ही है, भाजपा की रणनीति भी निष्कंटक नहीं रह गई है। कहा जा रहा है कि यदि इसी तरह गतिरोध कायम रहा तो एनडीए के घटक दलों में फूट पड़ सकती है और वे भाजपा से अलग यानी कांग्रेस के साथ जाने के बारे में सोच सकते हैं।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए लेखक के निजी विचार हैं। दस्तक टाइम्स उसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।)