दागी हो गयी सीबीआई!

- in दस्तक-विशेष

देवव्रत
अब तक जिस पर देशभर में आंख मूंदकर विश्वास किया जाता रहा, उसी की साख इन दिनों दांव पर लगी है। यह कोई और नहीं देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेन्सियों में शुमार होने वाली केन्द्रीय जांच ब्यूरो यानि सीबीआई है। सीबीआई एक ऐसा नाम है जो देश के हर नागरिक की जुबान पर चढ़ा है। देश के किसी कोने में छोटी वारदात हो जाये या फिर कोई बड़ी, मांग सबसे पहले सीबीआई जांच की ही होती है। यानि भले ही यह संस्था अपनी विश्वसनीयता समय के साथ खो चुकी हो लेकिन फिर भी लोगों का भरोसा सीबीआई पर कुछ हद तक बाकी रह गया है। लेकिन इसकी साख पर सवाल की बरसात इन दिनों तेज हो गयी है। इसके दो पूर्व निदेशकों के खिलाफ जांच शुरू होने के कारण इसकी साख को और भी बट्टा लगा है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि जांच एजेन्सी को भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे अपने ही पूर्व निदेशक एपी सिंह के घर छापा मारना पड़ा। यहां तक तो ठीक था लेकिन इस छापे में भ्रष्टाचार में उनकी संलिप्तता के कई दस्तावेजी सबूत जब मिले तो कई लोग निरुत्तर हो गए।
इस पूर्व नौकरशाह पर देश के एक बड़े मांस व्यापारी और हवाला कारोबारी मोईन कुरैशी से बड़ी मात्रा में धनराशि लेने और गुपचुप उसकी मदद करने के आरोप हैं। एफआईआर भी प्रवर्तन निदेशालय की शिकायत पर दर्ज की गई है। इसमें मांस व्यापारी समेत कई और लोगों के नाम शामिल हैं। मांस कारोबारी मोईन पर आरोप है कि उसने कुछ खास लोकसेवकों को हवाला के जरिए भारी मात्रा में राशि चुकाई और बड़ी मात्रा में टैक्स चोरी भी की। करीब दो सौ करोड़ रुपए की हेराफेरी और लेन-देन का मामला बताया जा रहा है। उधर, आयकर विभाग ने कोयला घोटाले के मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में पहले भी यह सूचना दी थी कि एपी सिंह के रिश्ते कुरैशी से रहे हैं। बात यहां तक रहती तब भी पच जाती लेकिन सीबीआई के एक और पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा भी इसी मांस कारोबारी को मदद पहुंचाने के आरोप में पहले से ही जांच के घेरे में हैं। दरअसल रंजीत सिन्हा ने सीबीआई प्रमुख रहते हुए अपने घर पर मांस व्यापारी से नब्बे बार मुलाकात की थी। साफ है कि भ्रष्टाचारियों को पकड़ने के लिए बनी संस्था ही सिर से पांव तक स्वयं भ्रष्टाचार में डूब चुकी है।
कांग्रेस की जब केन्द्र में इन्दिरा गांधी के नेतृत्व में सरकार हुआ करती थी तो सीबीआई को विपक्ष ‘कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन’ की संज्ञा देता था। केन्द्र में जिसकी सरकार होती है सीबीआई उसी के इशारे पर नाचती कई बार दिखी भी है। वहीं सर्वोच्च न्यायालय ने भी सीबीआई को ‘तोते’ की संज्ञा देकर इशारों में ही बहुत कुछ कह दिया था। कोयला घोटाला हो मोईन का प्रकरण दोनों ही मामले मनमोहन सिंह सरकार के समय के हैं।
उस दौरान कई घोटाले हुए और भ्रष्टाचार को लेकर अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई गई। हो सकता है कि इन आरोपियों के हौसले इसलिए भी बुलंद रहे हों और उन्होंने यही सोचा हो कि फिलहाल, उनके खिलाफ कोई जांच पड़ताल नहीं होने जा रही है। सीबीआई तोता नहीं बल्कि एक स्वतंत्र एजेंसी है और एक निदेशक जांच के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ये लोगों सहित केन्द्र सरकार को बताने वाले जोगिंदर सिंह ही थे। जोगिंदर सिंह भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब भी सीबीआई का जिक्र आता है तो जोगिंदर सिंह की कार्यशैली को हमेशा कोर्ट ही नहीं बल्कि अधिकारी भी याद करते हैं।
लेकिन मनमोहन सरकार की केन्द्र से विदाई होने के बाद नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी। लेकिन इस सरकार में भी सीबीआई सरकार की ही कठपुतली नजर आयी। यह चौंकाने वाली बात ही थी कि सीबीआई जैसी प्रमुख जांच एजेन्सी दो दिसंबर 2016 से स्थाई निदेशक के बिना काम कर रहा थी। बाद में सरकार ने राकेश अस्थाना को कार्यवाहक निदेशक नियुक्त किया। श्री अस्थाना गुजरात काडर के 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। उनके मुताबिक उनकी साफ-सुथरी छवि रही है और वे सीबीआई में एसपी और डीआईजी के तौर पर काम कर चुके हैं, फिलहाल वे सीबीआई में अतिरिक्त निदेशक के रूप में काम कर रहे हैं, ऐसा सीबीआई के पहले के निदेशकों के चयन में नहीं हुआ। मोदी सरकार को निदेशक अनिल सिन्हा की सेवानिवृति से पहले चुनाव समिति की अहम बैठक बुलानी थी, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया और अस्थाना को अतिरिक्त दायित्व दे दिया। एक पूर्व सीबीआई अधिकारी का कहना है कि इस तरह अस्थाई नियुक्ति पहले कभी नहीं हुई। यह विशेष रूप से चौंकाने वाली घटना है।
नियुक्ति के बाद आरोप लगे कि श्री अस्थाना को यह काम इसलिए मिला क्योंकि उनकी भाजपा नेताओं से नजदीकी है। वे गुजरात काडर के हैं (जहां मोदी मुख्यमंत्री रहे और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह गृहमंत्री) और वहां महत्वपूर्ण जांचों का हिस्सा थे। इसमें 2002 का गोधारा कांड भी शामिल है, जिसकी जांच स्पेशल इंवेस्टिगेटिव टीम ने की थी। श्री अस्थाना भारतीय पुलिस सेवा के अन्य कई अधिकारियों से जूनियर हैं। जबकि भारत-तिब्बत बॉर्डर पुलिस के महानिदेशक कृष्ण चौधरी 1979 बैच के अधिकारी हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के प्रमुख शरद कुमार, जिनकी सेवाएं बढ़ाई गई थीं, 1979 बैच के हैं। यह भी दिलचस्प तथ्य है कि श्री अस्थाना को अब तक महानिदेशक के पैनल में शामिल नहीं किया गया है। उन्हें बीते साल गुजरात से बुलाकर अप्रैल में सह निदेशक बनाया गया था। फिर दो दिन पहले जब अनिल सिन्हा को ऑफिस से इस्तीफा देना था, सरकार ने सबसे वरिष्ठ सीबीआई अधिकारी, विशेष निदेशक आरके दत्ता का गृह मंत्रालय में ट्रांसफर कर दिया और अस्थाना को कार्यवाहक निदेशक बनाने के लिए रास्ता साफ कर दिया।
उधर, सुप्रीम कोर्ट में स्वयं सेवी संस्था कॉमन कॉज की ओर से दाखिल की गई जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि सरकार ने राकेश अस्थाना को सीबीआई का निदेशक बनाने के लिए बिल्कुल बदनीयती का, मनमाना और अवैध तरीका अपनाया है। याचिका में कहा गया था कि केंद्र सरकार ने चयन समिति की बैठक नहीं बुलाई, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं, हालांकि उन्हें पूरी तरह पता था कि दो दिसंबर 2016 को अनिल सिन्हा सीबीआई के निदेशक पद से इस्तीफा देंगे। जानबूझकर की गई यह लापरवाही 1946 के डीएसपीई एक्ट का पूरी तरह से उल्लंघन है, जिसमें 2013 के लोकपाल एक्ट से संशोधन किया गया था। अस्थाना को दायित्व देने से पहले इस पद के लिए कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम आ रहे थे।
इशरत जहां के एनकाउंटर मामले में भी सीबीआई की जांच संदेह के घेरे में आई। राजनीतिक दांव-पेंच के बाद एजेंसी को अंतत: मानना पड़ा कि गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री के खिलाफ चार्जशीट फाइल करने के लिए कोई प्रमाण नहीं है। दिलचस्प है कि प्रवर्तन निदेशालय ने हाल में सीबीआई को रंजीत सिन्हा और एक अन्य पूर्व निदेशक एपी सिंह की जांच करने के लिए लिखा है। एपी सिंह पर मोईन कुरैशी से मिले होने का आरोप है, जिसकी जांच प्रवर्तन निदेशालय कर रहा था।