नाराज कार्यकर्ताओं की अनदेखी पार्टी के लिए नुकसानदेह

- in दस्तक-विशेष
– डॉ हिदायत अहमद खान

इसमें शक नहीं कि किसी भी राजनीतिक पार्टी को खड़ा करने से लेकर सत्ता तक पहुंचाने में जमीनी और समर्पित कार्यकर्ताओं की भूमिका अहम होती है। वैसे भी जब सार्वजनिक जीवन में किसी नेता की जय-जयकार होती है और उनके कार्यों को सराहा जाता है तो यही माना जाता है कि उसके पीछे ईमानदार, सत्यनिष्ठ और मेहनती कार्यकर्ताओं की मजबूत दीवार है। इसी प्रकार यह भी एक गवाही ही है कि पार्टी कार्यकर्ता संतुष्ट व प्रसन्न हैं, इसलिए नेताजी की जय-जयकार हो रही है। अब आप ही सोचिए कि जब यही कार्यकर्ता किन्हीं वजहों से अपने नेता या पार्टी से नाराज हो जाएं तो उनका क्या हश्र होने वाला है। ऐसे में तो नेता को पैर रखने के लिए भी जगह मिलना मुश्किल हो जाना चाहिए, क्योंकि बिना कार्यकर्ता कोई नेता सार्वजनिक जीवन में मंच पर खड़ा ही नहीं हो सकता है। कुल मिलाकर पार्टी स्तर पर किसी को बतौर नेता स्थापित करने से लेकर चुनाव में पार्टी टिकट दिलाने और फिर चुनाव जिताने से लेकर क्षेत्र में योजनाबद्ध तरीके से बेहतर तरक्की करने तक की अहम जिम्मेदारी कार्यकर्ता ही निभाता है। इसलिए राजनीतिक पार्टियां कभी भी अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को नाराज करने या उन्हें नजरअंदाज करने का साहस कतई नहीं करतीं।

यह अलग बात है कि मध्य प्रदेश में इसके उलट होता हुआ दिखाई दिया है, जहां नाराज कार्यकर्ता नेताजी के खिलाफ नारे लगाते रहे और उन्हें नजरअंदाज कर नेताजी और अन्य यही कहते देखे गए कि वो तो विरोधी पार्टी के लोग हैं जो उन्हें बदनाम करने में लगे हुए हैं और उनकी नारेबाजी से किसी को कोई टिकट थोड़े ही दे देगा। चूंकि मध्य प्रदेश में लगातार तीन बार से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और बतौर मुखिया शिवराज सिंह चौहान मजबूती के साथ सरकार की कमान अपने हाथों में लिए हुए हैं, अत: यहां कार्यकर्ताओं की उपेक्षा समझ से परे है। पार्टी की सरकार होने पर कार्यकर्ताओं में नाराजगी का कोई सवाल नहीं उठना चाहिए। बावजूद इसके अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि पार्टी कार्यकर्ता खासे नाराज हैं और उनकी नाराजगी भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के समक्ष नारेबाजी के तौर पर सामने आ रही है। यह मामला वैसे तो श्योपुर का बताया जाता है जहां प्रदेशाध्यक्ष चौहान कार्यकर्ता सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे और उनके सामने ही भाजपा विधायक दुर्गालाल विजय के खिलाफ कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी करते हुए बुलंद आवाज में कहा कि ‘भाजपा से बैर नहीं, दुर्गा तेरी खैर नहीं’। यहां नारे लगाते कार्यकर्ताओं की सुनने की बजाय उन्हें कांग्रेसी और विरोधी बता दिया गया और उस पर करेला और नीमचढ़ा जैसी बात यह हुई कि पत्रकारों से ही यह कहा गया कि इस तरह से नारेबाजी करके कोई टिकट नहीं पा सकता और न ही किसी को कोई टिकट ही दिला सकता है।

कुल मिलाकर नाराज लोगों की सुनने और उन्हें शांत करने की बजाय उन्हें अपने से दूर झटकने जैसा काम कर दिया गया। यह ऐसा मामला है जो कि प्रदेश के अन्य हिस्सों के कार्यकर्ताओं की स्थिति को भी बयां करता है। दरअसल इसी स्थिति में प्रदेश के अधिकांश कार्यकर्ता अपने आपको पाते हैं और कहते हैं कि पार्टी के जिम्मेदार लोग सत्ता के नशे में चूर अपने पैरों तले की जमीन को खिसकाने में लगे हुए हैं। यही वजह है कि न तो पीड़ित किसानों की सुनी जा रही है और न ही गरीबों की ओर ही ध्यान दिया जा रहा है। शिक्षित बेरोजगारों का हाल बुरा है, क्योंकि उनके भविष्य को संवारने की बात करने वाले सत्ता के मद में चूर हो चुके हैं। अपने स्वयं के भविष्य को सुनहरा बनाने के बाद मानों इनका गरीबी और बेरोजगारी दिखाने वाला चश्मा आंखों से उतर चुका है। यही वजह है कि चारों ओर हरियाली ही हरियाली नजर आ रही है। हद यह है कि अपने करीबी जो दु:खी और चिंतित के साथ ही साथ अब नाराज भी हैं वो भी नजर नहीं आ रहे हैं।

यह स्थिति किसी एक नेता के लिए नहीं बल्कि पार्टी के लिए नुक्सानदेह हैं। अत: भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व समेत प्रदेश के कर्ताधर्ताओं को सलाह दी जा रही है कि वो पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी को खत्म करने की दिशा में आगे आएं ताकि प्रदेश की शिवराज सरकार द्वारा किए गए जनहितकारी कार्यों का सुचारु ढंग से प्रचार-प्रसार किया जा सके। ये प्रचारक और प्रसारक कोई और नहीं ये ही समर्पित कार्यकर्ता होते हैं, जिन्हें धिक्कारने और अलग-थलग करने का काम कुछ स्वयंभू क्षत्रप नेता कर रहे हैं। अगर समय रहते इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाले समय में पार्टी व सरकार के खिलाफ बड़ा जनआंदोलन भी खड़ा होता हुआ दिखाई दे सकता है। ऐसे में जबकि स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के नाराज कर्मचारियों और अधिकारियों से वन-टू-वन कर रहे हैं तो आखिर वो तो अपने परिवार के सदस्य हैं आखिर उनसे इसी तरह वन-टू-वन करने में हर्ज भी क्या है। कांग्रेस के भाग्य से चुनावी छींका टूटे उससे पहले यदि नींद से भाजपा और सरकार जाग जाए तो बेहतर होगा, अन्यथा दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए अगले वर्ष विधानसभा चुनाव हैं ही।

जय हिन्द!