नूतन का स्वागत और जाते साल को बिदाई

-जया शर्मा

जिस प्रकार हर नए के आने के सुख से मन रोमांचित हो उठता हैं, उसी तरह जाने वाले की बिदाई भी महत्व रखती हैं। जाने वाले की चादें से मन भरा रहता हैं। उसके साथ बिताया हर क्षण पुस्तक में लिखे अक्षरों की भाँति हमारे चित्त पर अंकित रहते हैं। जो समय बीत जाता हैं उसकी यादें ही गुजरे वक्त की खटास और मिठास को बढ़ाती हैं। जो गुजर जाता है वह अपनी यादें कई रूपें में छोड़ जाता हैं। इससे अपनी मीठी और कड़वी यादें जुड़ी रहती हैं। कड़वी यादें को मिटाने और भूलने की कोशिश हमें ओर भी गति प्रदान करती हैं। मीठी यादें से मन प्रफुल्लित रहता है और हम अपने कर्तव्यें के निर्वहन में और भी ध्यान लगाते हैं। इसका सीधा प्रभाव हमारे कार्यस्थल और घरेलू जीवन पर पड़ता हैं। दिसंबर माह की अंतिम तारीख यानी 31 दिसंबर प्रत्येक वर्ष का अंतिम दिन होता है, जिसमें सभी अपने सालभर की खट्टी-मीठी यादें का हिसाब लगाते हैं। जिनके अनुभव अच्छे होते हैं, उन्हें वह वर्ष बड़ा अच्छा लगता हैं, परन्तु जिनके साथ कुछ ऐसा धरता हैं, जिसकी याद से ही मन सिहर उठे, उनके लिए वह वर्ष दुŠखद यादें दे जाता है। पिछले बीते हुए हर वर्ष के समान 2008 भी विदा होते-होते 2009 का स्वागत करके चला जायेगा। बिदाई की तैयारियें भी जोर-शोर से दी जाती हैं, और आने वाले वर्ष के स्वागत में भी कोई कमी नहीं करना चाहता जिससे बीते दिनें की दुखद यादें को आगामी वर्ष में मीठी यादें में बदला जा सको चूँकि हमारा सारा वार्षिक कार्यकाल अंग्रेजी कैलेन्डर के हिसाब से ही चलता हैं। अतŠ हम भी 31 दिसंबर के आयोजनें में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।

मीडिया की चकाचौंध ने इन आयोजनें में अपनी भूमिका से चार चाँद लगा दिए हैं। वर्ष के अंतिम सप्ताह से ही विभिन्न मनोरंजन कार्यक्रम आरंभ हो जाते हैं। अंतिम दिन तो रात्रि के आधे पहर तक धूम मची रहती हैं। वैसे तो बिदाई का माहौल बड़ा ही गमगीन होता हैं, क्येंकि जो बिछुड़ता है, पीछे छूटता है, वह हमारा अपना ही होता हैं फिर चाहे वह समय ही क्यें न हो। वर्ष के 12 माह, 365 दिन, 8760 घंटे और 525600 मिनट हमारे मूल्यवान जीवन से कम हो जाते हैं। उन उठते-गिरते पलें की यादें आदि अनुभव हमारे भावी समय को संवदेनशील और उज्जवल बनाते हैं। हमारी संवेदनशीलता के कारण हो यह लगाव व जुड़ाव पैदा होता हैं। एहसास वह होता है, जो हमारे अंतकरण से होकर गुजरता हैं। इसी से हमारे अंदर की भावनाआं में कल्पनाए जागृत होती है। इसी एहसास के माध्यम से जीवन की कटुता और मधुरता के इतिहास रचे जाते हैं। हमारी झूठी संवेदनाआंs को तो हम तत्काल भूल जाते हैं और अपनी दिन चर्चा के साथ आगे बढ़ जाते हैं, परन्तु जो संवदेना हमारे अंत:करण से उत्पन्न होती है, उसे समय भी भुला नहीं पाता।

जीवन जीना एक कला है और मानव का विस्तृत दृष्टिकोण ही उसके जीने के नजरिये को नया स्वरूप प्रदान करता हैं। समय के साथ घटी घटनाआं से ही व्यक्ति अपने जीवन को संयमित कर पाता हैं। अपने रिश्तें और संबंधों का मूल्यांकन करते समय हम स्वयं के आचरणें पर भी ध्यान देते हैं। यदि हमारा आचरण सदाचार पूर्ण होता हैं, और सामने वाले का निंदापूर्ण तो हमारे अनुभव भी खट्टे होते हैं। यदि विचार-मंथन की गहराई में जाकर देखें तो दूसरे को सुधारना हमार मूल कार्य नहीं। विगत की कड़वी यादें को आगत के स्वागत के साथ सुखद बनाने का प्रयास करना चाहिए। नूतन वर्ष की स्वर्निम आशाआं के साथ हंसने मुस्कुराने का प्रयास करना चाहिए। आइये आगामी वर्ष के स्वागत के लिए स्वयं को तैयार करें और यह आत्मविश्वास रखकर आगे बढ़े की बीती को बिसार कर आने वाले समय में खुश रहेंगे, खुशियाँ बाटेंगे। अपनी गलतियें में सुधार करेंगे और दूसरें को भी ऐसी प्रेरणा देंगे।