परदे के पार

- in दस्तक-विशेष

 

चचा के रवैये पर हैं सभी की निगाहें
साइकिल वाली पार्टी में ऐन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जो कुछ भी घटा उससे तो कइयों के चेहरे ही उतर गए थे। लेकिन समय बीता और पार्टी में बहुत बड़ा बदलाव हो ही गया। इसके बाद साइकिल को हाथ का मिला साथ और दोनों ही कूद गए चुनावी दंगल में। इस बीच सबसे ज्यादा उपेक्षित रहे चचा की चुप्पी चर्चा का विषय रही। लेकिन सारी उठापटक के बावजूद चचा साइकिल के ही सिम्बल पर चुनाव मैदान में कूद तो गए लेकिन उनके साथ जो कुछ हुआ था उसे वह अब तक भुला नहीं पाये हैं। इसीलिए नामांकन दाखिल करते ही उन्होंने इशारों ही इशारों में बहुत कुछ तो कहा ही, यह भी कह दिया रिजल्ट आने के बाद वे नयी पार्टी बनायेंगे। हालांकि अपने बड़े भाई के नक्शे कदम पर चलते हुए वे बाद में इस बात से मुकर गए और बोले कि पार्टी तो नयी बन चुकी है। खैर, इस सब के बीच राजनीतिक गलियारों में चचा के अगले कदम को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। इसीलिए सभी की निगाहें चचा की ओर ही जाकर बार-बार ठिठक रही हैं।

रेप के आरोपी पुरुष हैं या महिला
सूबे के सबसे बड़े राजनैतिक घराने के करीबी और साइकिल वाली सरकार में मंत्री रहे एक नेता पर ‘गन्दी बात’ करने का आरोप लगा। जब सूबाई पुलिस ने भुक्तभोगी की नहीं सुनी तो इसकी शिकायत देश की सबसे बड़ी अदालत में हुई। इससे पहले कि इस मुद्दे में अदालत में बहस हो, उससे बड़ी बहस बाहर ही शुरू हो गयी। बात इस बात पर फंस गयी कि कैसे कोई महिला बलात्कार कर सकती है। इस पर सभी विद्वान वकील अपने-अपने तर्क और कुतर्क कर रहे थे। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकल रहा था। इसी बीच एक ऐसे अधिवक्ता महोदय मौके पर पहुंचे जिन्हें विषय की पूरी जानकारी थी। उन्होंने ही स्थिति साफ की कि जिस मंत्री महोदय पर यह आरोप लगा है वह वास्तव में पुरुष हैं लेकिन उनके नाम से ऐसा लगता है कि यह किसी महिला का नाम हो। दरअसल उनका जो नाम है वह नाम पुरुषों का भी होता है और महिलाओं का भी। जब पूरे प्रकरण की परत दर परत खुली तब जाकर जिज्ञासु वकीलों को पूरी बात समझ में आयी। अच्छा हुआ समय पर पता चल गया अन्यथा तो वे ‘कन्फूज’ ही रहते।

राजनीति में गधों की चर्चा
बीते दिनों चुनावी माहौल में भाषणबाजी के दौरान गधों की चर्चा हो गयी। इससे कोई और खुश हुआ हो या न हुआ हो, गधे बहुत खुश हुए। दरअसल साइकिल वाली पार्टी के मुखिया ने अपने चुनावी रैली में महानायक को सलाह दे डाली कि वे एक राज्य विशेष के गधों का प्रचार न करें। असल में गधे और महानायक तो बहाना थे, निशाने पर कोई और था। कुछ लोगों ने ऐसे बोल की निन्दा की तो कुछ ने चटखारे लेकर इस पर खूब प्रचार किया। मजे की बात यह है कि गधों का प्रचार करने वाले जिस महानायक की चर्चा हुई उनकी पत्नी साइकिल पर ही सवार होकर देश की सबसे बड़ी पंचायत तक पहुंची हैं। खैर, बात गधों के खुश होने की हो रही थी। सो, दो गधे आपस में इस विषय को लेकर चर्चा कर रहे थे। एक ने कहा कि राजनीति में गधे तो पहले से ही थे लेकिन मंच से उनकी चर्चा पहली बार हुई है। यही हमारे लिए ‘अच्छे दिन’ हैं।

मेरे दो अनमोल रतन
देश के सबसे बड़े समाजवादी परिवार में पिछले दिनों घर की दहलीज के भीतर ही जमकर गृह कलह हुई। चूंकि यह परिवार ही सूबे में सत्ता में था सो सत्ता पिपासु एक तरफ हो गए और शेष एक तरफ। जो सत्ता के साथ थे वे कुछ आगे ही बढ़ गए और उन्होंने बकायदा चिट्ठीबाजी तो की ही, मीडिया में भी जमकर जहर उगला। उन्होंने तो दावा तक कर दिया कि कलह के पीछे ‘सगा’ और ‘सौतेला’ ही है। कहा गया कि ‘सौतेले’ की महत्वाकांक्षा के चलते ही परिवार और पार्टी में यह सब कुछ हो रहा है। लेकिन इस पर चर्चा-कुचर्चा के बाद बात आयी गयी हो गयी। उसके बाद वह दिन भी आया जब वह काया सामने आयी जिसको कि सबसे बड़ी वजह बताया जा रहा था लेकिन उन्होंने पहली बार मीडिया के सामने जो कुछ कहा उससे तो सभी दंग रह गए। उन्होंने दोनों को अपनी दो आंखें करार दिया, जिसके बाद लोगों को फिल्मी ‘करन-अर्जुन’ की नकली मां राखी का वह डायलाग याद आ गया जिसमें कहा गया था कि मेरे तो दो अनमोल रतन।

बूढ़ें तरसे, कोई तो पूछे
देश के सबसे बड़े सूबे की सबसे पंचायत के चुनाव हुए। चुनाव प्रचार में विभिन्न दलों के कई नामी गिरामी उड़न खटोले पर चढ़कर अपने-अपने दल की अच्छाइयां और दूसरों की बुराइयां बताने उड़ गए। लेकिन इन्हीं दलों खासकर भगवा पार्टी के कई उम्रदराज और अनुभवी नेता ‘स्टार प्रचारकों’ की सूची में नाम न होने से खासे मायूस थे, हालांकि सच बात तो यह है कि जिस तरह उन्हें पार्टी और सत्ता में दरकिनार किया गया, वे चुनाव प्रचार करना भी नहीं चाहते थे। खैर, यह तो थी उनके मन की बात लेकिन वास्तव में उन्हें शामिल न करके पार्टी की नयी पीढ़ी ने उनका एक तरह से अपमान ही किया। इससे बेहतर तो साइकिल वाली पार्टी निकली। जिसे मालूम था कि धरती पुत्र चुनाव प्रचार में नहीं जायेंगे लेकिन फिर भी उनका नाम ‘स्टार प्रचारकों’ की सूची में सर्वोपरि रहा। यह बात दीगर है कि धरती पुत्र वहीं गये जहां वे जाना चाहते थे। लेकिन इतना तो साफ है कि कई दलों के कथित रूप से वृद्धों की श्रेणी में डाले गए नेताओं के दिल पर अगली पीढ़ी की यह सोच गले नहीं उतरी और वे यही सोचते रहे कि पार्टी नहीं तो कम से कम कोई प्रत्याशी ही उनकी ‘डिमाण्ड’ प्रचार के लिए कर ले।

किसकी सतरंगी होगी होली
देश के सबसे बड़े सूबे में हो रहे चुनाव के परिणाम का समय चुनाव आयोग ने बहुत छांटकर रखा है। परिणाम ठीक होली के दो दिन पहले आने हैं। मतदाताओं के रुख को कोई भी राजनैतिक दल भांप नहीं पाया है। यह बात दीगर है कि सभी अपनी-अपनी सरकार बनाने के दावे कर रहे हों। लेकिन सत्ता का असल रंग भगवा होगा, नीला होगा या फिर गठबंधन के रंगों से रंगा होगा यह तो चुनाव के परिणामों से ही साफ होगा। जाहिर है कि जिस रंग की छटा इस प्रदेश में बिखरेगी उसी की ही होली इस बार सतरंगी होने जा रही है। लेकिन राजनैतिक पण्डितों का यह भी दावा है कि इन सभी दलों की होली फीकी होने जा रही है क्योंकि सत्ता की हांडी में खिचड़ी पकने की संभावना अधिक है। ऐसे में सभी दल अपने-अपने रंगों तक ही सीमित रह सकते हैं और होली बाद एक और होली खेलने का उनके पास तब भरपूर मौका होगा जब वे आपस में मिलकर सूबे में सरकार बना लें। यानि साफ है कि सतरंगी होली सत्ता का ‘सिग्नल’ मिलने के बाद ही हो सकेगी।