परदे के पार

जेलों में हर दिन होगी भजन संध्या

देश की जेलों के अच्छे दिन आ ही गए। जेलों को लेकर अब तक आम जन के मन में रही सभी अवधारणायें समाप्त होने को हैं। कभी दिल्ली के बहुचर्चित तिहाड़ जेल में एक महिला आईपीएस अधिकारी ने कुछ ऐसे सुधार किए थे जो कि देश भर में मिसाल बने थे लेकिन अब वह गुजरे दिनों की बात हो गयी है। उन्होंने अपने जमाने में कई नये प्रयोग किए तो उसकी चर्चा भी हुई लेकिन अब जेलों में जिस तरह के बंदी आ रहे हैं उनका इतिहास देखते हुए तो लगता है कि अब किसी तरह के सुधारों या प्रयोगों की आवश्यकता ही नहीं रह गयी है। कारण यह है कि कल तक अध्यात्म की धारा का प्रवाह करने वाले कथित संत कब खुद ही धर्म के मार्ग से भटक गए पता ही नहीं चला। नतीजा यह हुआ कि उनके कर्म उन्हें भगवान कृष्ण की जन्मस्थली यानि कारागार तक ले आये। कृष्ण तो सिर्फ यहां जन्म लिए लेकिन जो अब बंद हुए हैं लगता है कि वे अपनी अन्तिम सांस भी यहीं लेंगे। लेकिन इतना तय है कि जब तक वे यहां प्रवास पर रहेंगे तब तक इस सरकारी ससुराल में भक्ति संगीत की गंगा जरूर बहेगी।

मफलरमैन को मिली आक्सीजन

हर बात में अपनी टांग अड़ाने के लिए देशभर में कुख्यात हो चुके मफलरमैन पिछले काफी समय से सुषुुप्तावस्था में थे और राजनीति के मानचित्र से लगभग विलुप्त ही हो गए थे। दरअसल उन दो राज्यों में जहां वे अपनी झाड़ू का कमाल दिखाने को बेकरार थे, वहां उन्हें मुंह की खानी पड़ी। बस इसी के बाद से उन्होंने एक तरह से हर मामले में ‘अंगुली’ करने की अपनी आदत को लगाम दे दी थी। उनकी निष्क्रियता से यह लगने लगा था कि हो सकता है कि वे अब भविष्य में राजनीति से ही तौबा कर लेंगे। कुछ लोग तो यहां तक कहने लगे थे कि मफलरमैन खुद अपनी झाड़ू वाली पार्टी सहित आईसीयू में भर्ती हो गए हैं। लेकिन समय का फेर देखिए देश का दिल कहे जाने वाले प्रदेश में एक सीट पर विधानसभा का उपचुनाव हुआ और इस चुनाव में एक बार फिर झाड़ू ने अपना कमाल दिखाया। तमाम कयासों को धता बताते हुए न सिर्फ जीत हासिल की बल्कि लोगों को भी एक बार फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह अभी खत्म नहीं हुए हैं और भविष्य में फिर कोई नया कारनामा दिखा सकते हैं।

सुशासन बाबू की धड़कनें बढ़ीं

बीते दिनों पाटलीपुत्र में विपक्षी दलों की एकता के नाम पर एक महारैला हुआ। सत्ता रूपी घासलेट यानि मिट्टी का तेल के बिना लालटेन वाली पार्टी ने बचे खुचे तेल से लालटेन की ज्वाला प्रज्जवलित की। विपक्षी दलों को एक होने और केसरिया रंग को बदरंग करने का नारा देकर एक मंच पर एकठ्ठा किया। खैर चारा बाबू की छवि काम आयी और कई दलों के नेता विचारधाराओं में एका न होने के बावजूद आये। बाढ़ की मार होने के बावजूद भारी भीड़ जुटी तो जोशीले भाषण भी हुए। लगा बस कल ही सब कुछ बदल जायेगा, लेकिन राजनीति में ऐसा अकस्मात होता नहीं है। लेकिन फिर भी उम्मीद की लालटेन तो जल ही चुकी थी। उधर, चारा बाबू एण्ड फैमली के निशाने पर सिर्फ सुषासन बाबू ही थे। कहा गया कि धोखा दिए हैं, जनता इन्हें सबक सिखा दे। अब जनता सुषासन बाबू को सबक सिखायेगी या नहीं, यह तो भविष्य ही तय करेगा लेकिन इतना तय है कि बापू के नाम पर बने मैदान में जो भीड़ जुटी और जो समर्थन देखने को मिला, उससे तो सुशासन बाबू के दिल की धड़कनें बढ़ जरूर गयीं।

सही निर्णय बनाम गलत कदम

बीते साल नवम्बर के महीने में एक बड़ा भूकम्प इस देश में आया। इस भूकम्प से न तो अमीर अछूते रहे और न गरीब। दरअसल यह भूकम्प प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव निर्मित था और इसके पीछे यह तर्क भी दिया गया कि इससे सिर्फ अमीरों के ही घर गिरेंगे लेकिन झोपड़ियां सुरक्षित रहेंगी। कहा गया कि अमीर और गरीब के बीच का फासला फालसे (एक फल) की तरह गायब हो जायेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं अमीरों के पैर के नीचे और नयी-नयी लग्जरी चार पहिया गाड़ियां आ गयीं और गरीब की नौकरी ही नहीं गयी बल्कि उसकी साइकिल तक छिन गयी। गरीब रोजी-रोटी तक को मोहताज हो गया। लेकिन इस भूकम्प को लाने वाले दस महीने बाद भी अपनी पीठ खुद ही थपथपा रहे हैं। कहते फिर रहे हैं कि भूकम्प लाने का फैसला ऐतिहासिक था और अभी नहीं आने वाले समय में इसका फायदा दिखेगा। यह भी बता रहे हैं कि 99 फीसदी पैसा वापस लौट आया है और यह सब उल्टा-सीधा पैसा ही था। लेकिन अब विरोधी इसे लेकर हुक्मरानों पर हमलावर हो गए हैं और फैसले को गलत ठहराने के लिए सारे तर्क दे रहे हैं। अब देखना है कि भूकम्प लाने के मुख्य प्रायोजकों को जनता किस नजर से देखती है।

तीन तलाक की जीत किसकी

बीते दिनों सबसे बड़ी अदालत ने एक तारीखी फैसला दिया। यह फैसला ऐसा था कि कोई इसकी आलोचना नहीं कर सकता था। यदि करता तो पूरा समाज उसका दुश्मन हो जाता। ऐसे में फैसले की तारीफ करना एक तरह से मजबूरी हो गयी थी। लेकिन कई ऐसे थे जिन्हें यह फैसला रास नहीं आया था और उनका तर्क था कि यह तो उनके धर्म और उसकी मान्यताओं एवं परम्पराओं के विपरीत है। इतना ही नहीं धर्म के अलमबरदारों ने इस फैसले के खिलाफ जहर भी सार्वजनिक रूप से उगला। खैर, यहां तक तो सब ठीक था लेकिन जिस तरह अदालत के फैसले का श्रेय लेने की होड़ हुक्मरानों और उनके विरोधियों के बीच हुई, उससे हर कोई हैरान था। हुक्मरानों की ओर से इसे ऐसे दर्शाया गया जैसे कि सारा किया धरा उन्हीं का हो, लेकिन वास्तव में ऐसा था नहीं। ऐसे में फैसले की आलोचना करने वालों ने अपनी सीमायें भी लांघी और यहां तक कह डाला कि जो खुद अपनी ‘शरीके हयात’ को छोड़ आये वह दूसरों का दर्द क्या समझेंगे।

भगवा पार्टी के नए ‘नाथ’

‘नाथों’ (भगवान) के भरोसे ही भगवा पार्टी के लोग आज हर महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं। यह नाथ ही थे जिन्होंने इनके परिवार को दो से तीन सौ का आंकड़ा पार कराने में खासी भूमिका निभायी। वहीं इन्हीं के भरोसे देश के सबसे बड़े सूबे में भी सत्ता की चाभी हाथ में आ गयी। अब ‘नाथ’ का प्रभाव तो होना ही था सो सूबे की कमान भी एक ‘नाथ’ को सौंपी गयी। कुर्सी मिलने के बाद अब तैयारी दोबारा देश का बादशाह बने रहने की शुरू हो गयी है। ऐसे में चुनावी इम्तिहान में 80 में से 73 नम्बर पाने वाले राज्य की कमान एक बार फिर एक और ‘नाथ’ के कंधों पर डाल दी गयी है। जनेऊधारी इस नाथ को अब अपने सांगठनिक चातुर्य का परिचय देना होगा। हालांकि इस उल्टफेर में केन्द्र में मंत्री होने की हनक स्वाहा हो जाने वाली है। लेकिन अब देखना यह है कि जनेऊ और कमण्डल को साधने में यह ‘नाथ’ कितना कामयाब होगा।