बस्तर: हिंसा का खत्म न होने वाला सिलसिला

माओवादी हिंसा में कमी के मुख्यमंत्री रमन सिंह के हाल के दावों के बीच बस्तर के सुकमा में 25 अप्रैल01, 27 को हुई सीआरपीएफ के 25 जवानों की मौत ने सरकार की नींद उड़ा दी है। महीना भर पहले, 11 मार्च को इसी इलाके में सीआरपीएफ के 12 जवान मारे गए थे। इस घटना ने एक बार और साबित किया है कि बस्तर में बरसों से चल रहा हिंसा का तांडव थमा नहीं है और न ही इसके थमने के आसार हैं। सुकमा में हुई दोनों घटनाओं के बारे में जिस तथ्य पर गौर करना सबसे ज्यादा जरूरी है कि ये घटनाएं सड़क-निर्माण को सुरक्षा देने वाले जवानों पर आक्रमण के रूप में सामने आई हैं।

-अनिल सिन्हा
सुकमा की घटना के ब्योरे पर नजर डालने पर बस्तर के खूनी संघर्ष की पृष्ठभूमि का पता चलता है। अगर सरकारी आंकड़े पर गौर करें तो पता चलता है कि इस दिशाहीन हिंसा में सिर्फ सीआरपीएफ के जवान ही नहीं मारे जाते हैं बल्कि निर्दोष नागरिक भी। साल 2015 के एक आंकड़े के मुताबिक उस साल इस हिंसा में मरनेवालों में सीआरपीएफ, माओवादियों और ग्रामीणों की संख्या बराबर थी। विभिन्न घटनाओं में सीआरपीएफ के 47 जवान, 46 माओवादी और 47 ग्रामीण मारे गए थे। यह आंकड़ा बस्तर के सच को बयान करता है कि लाख कोशिशों के बावजूद इस संघर्ष में निर्दोष आदिवासियों को हिस्सा लेना पड़ता है और जान गंवानी पड़ती है। हिंसा किस हद को पार कर गई है इसका अंदाजा मई, 2013 में सुकमा में 27 कांग्रेस नेताओं की हत्या से लगाया जा सकता है। इस घटना में कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व का सफाया ही हो गया था। जब राज्य सरकार पूर्व मंत्रियों, विपक्ष के नेता और विधायकों की जान नहीं बचा सकती तो बाकी नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी कैसे दे सकती है?
सीआरपीएफ के जवान शेख मोहम्मद ने 25 अप्रैल की घटना का जो ब्योरा दिया है उसमें उसने बताया है कि माओवादियों के वहां पहुंचने के पहले गांववाले हथियारों को लेकर वहां जमा हुए थे। इसका मतलब है वे भी गोलियों का शिकार बने हैं। यह मुठभेड़ पिछले दस सालों में हुई बड़ी घटनाओं में से एक है। इसी से मिलती जुलती घटना में अप्रैल 2010 में दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के एक दल पर हमला हुआ था और 76 जवान मारे गए थे। इसके तुरंत बाद जून, 2010 में ही 26 जवान मारे गए थे। सुकमा की ही एक घटना में 20 मार्च 2014 में सीआरपीएफ के 16 जवान मारे गए। मुडभेड़ और खूनी हमलों के बीच स्थानीय आदिवासियों, खासकर, महिलाओं के उत्पीड़न का भी जायजा हमें लेना चाहिए। अभी दो महीने पहले ही छतीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2016-17 के बीच 28 महिलाओं पर हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में सरकार को नोटिस भेजा हैे। यह आदेश राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक जांच रिपोर्ट के आधार पर आया है। आदिवासी महिलाएं माओवादी और सरकारी बल के बीच फंसी हैं। माओवादियों का समर्थन करने का आरोप लगाकर पुलिस उन्हें ज्यादतियों का शिकार बनाती है और माओवादी यह मानकर उन्हें सताते हैं कि वे पुलिस की मदद कर रही हैं। बस्तर की आदिवासी महिलाओं की शिकायत है कि पुलिस उनके स्तन की जांच कर यह पता लगाती है कि वह अविवाहित हैं या विवाहित। अविवाहित होने का मतलब है कि वह माओवादी दल में हैं।
पुलिस के लिए मुखबिरी के आरोप में माओवादी पुरुषों, ग्रामीणों की हत्या तो करते ही रहते हैं। यह आम बात है। सलवा जुडुम के नाम पर जो कार्यक्रम कांग्रेस शासन के समय पार्टी के वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा ने चलाया था, भाजपा सरकार ने भी उस कार्यक्रम को जारी रखा। इस कार्यक्रम के तहत माओवादियों से लड़ने के लिए आदिवासियों को ही सामने खड़ा कर दिया गया। इस कार्यक्रम ने बस्तर के गांवों में एक खूनी संघर्ष छेड़ दिया था और आदिवासी ही आदिवासी के खिलाफ खड़े थे। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इस कार्यक्रम पर रोक लगी।
गरीबी और भुखमरी के चंगुल में फंसे आदिवासियों की हालत का फायदा दोनों ओर से उठाया जाता है। देश में हिंसक क्रांति के जरिए सर्वहारा राज लाने के लिए माओवादियों ने जो मुक्ति सेना बना रखी है उसमें भर्ती होने वाले ज्यादातर नौजवान और नवयुवती बेरोजगारी की मार झेल रहे होते हैं। दूसरी तरफ, पुलिस दल में शामिल होने वाले नौजवान भी समाज के ऐसे ही वर्ग से आने वाले लोग होते हैं। जहां तक माओवादियों को ग्रामीणों से मिलने वाले समर्थन का सवाल है उसके आर्थिक सामाजिक मेंं जाना जरूरी है। जंगल के उत्पादों पर उनका अधिकार पहले ही चला गया था और खनन तथा विकास के नाम पर उनकी ज्यादातर जमीन आज सरकार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों या व्यापारियों के हाथ में है। सरकार की ओर से चलने वाले कार्यक्रमों में इतना भ्रष्टाचार है कि इसका फायदा नीचे तक नहीं पहुंचता है और अपना संसाधन गंवा चुके आदिवसियों के सामने माओवादियों का सहारा लेने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा है। बाहर से आने वाले अधिकारी -कर्मचारी बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों को एक उपनिवेश समझते हैं और स्थानीय लोगों को आदमी का दर्जा देने को भी तैयार नहीं हंै। ऐसे में माओवादी उनके रक्षक के रूप में वहां पहुंचते हैं। बस्तर में सक्रिय किसी भी लोकतांत्रिक पार्टी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वे आदिवासियों के हितों की रक्षा करने का काम कर रही है। वे इस क्षेत्र की अमूल्य संपदा के दोहन में लगी कंपनियों के इशारे पर ही काम करती हैं। माओवादियों की हिंसा और काम करने के तरीके को छोड़ दिया जाए तो सिर्फ वे ही हैं जो उनके हित में खड़े दिखाई देते हैं। माओवादी पुलिस और सुरक्षा बलों के सामने जरूर जान हथेली पर लेकर खड़े हैं। लेकिन इसकी बड़ी कीमत आदिवासियों को चुकानी पड़ रही है। बस्तर में चलने वाले नक्सल राज की खूनी कहानी हर गांव में आपको सुनने को मिलेगी।
बंदूक और हिंसा की राजनीति ने शंतिपूर्ण जीवन के आदी आदिवासियों का जीवन उजाड़ दिया है। अपनी जमीन और जंगल को बचाने के लिए आदिवासी माओवादियों की शरण में जाते हैं और माओवादी इसकी एवज में उन्हें हिंसा के एक न खत्म होने वाले खेल में शामिल कर लेते हैंं। दूसरी ओर, पुलिस और सुरक्षाबल माओवादियों की हिंसा से क्षेत्र को मुक्त कराने के नाम पर उन्हें उत्पीड़न का शिकार बनाते हैं। बस्तर का यह दर्द अंग्रेजों के आने के बाद से शुरू हुआ है। इलाका मुगलों और फिर मराठों के नियंत्रण में था तो यहां के जंगलों पर आदिवासियों का अधिकार था। अंग्रेजों ने लकड़ी और खनन के लिए आदिवासियों के अधिकार छीनने शुरू किए और आदिवासियों के जीवन को नरक बनाने वाले लोगों को इलाके में लाना शुरू किया। उसने लोकप्रिय स्थानीय राजाओं पर भी अत्याचार किए।
अंग्रेजों के जाने के बाद कांग्रेस ने इस नीति को ही और तेजी से लागू किया। विकास के नाम पर यहां की खनन संपदा का दोहन किया गया और जंगल उजाड़ दिए गए। सरकारी नीतियां ने आदिवासियों के उन अधिकारों के साथ भी छेड़छाड़ की जो उन्होंने लड़कर अंग्रेजों से लिए थे। देश का कोई भी ऐसा औद्योगिक घराना नहीं है जिसने बस्तर की हजारों एकड़ जमीन अपने कब्जे में नहीं ले रखी हो। टाटा, बिड़ला से लेकर अडानी, अंबानी, और एस्सार- बस्तर की लूट में सभी का हिस्सा है। भाजपा के शासन में यह लूट तेज हुई है क्योंकि पर्यावरण की रक्षा के लिए बने कानून को ढीले कर दिण् गए हैं। इस कारण् बस्तर में जंगलों की रक्षा करने का कोई उपाय नहीं है। माओवादी विकास के नाम पर जंगलों और आदिवासियों को उजाड़े जाने के खिलाफ खड़े हैं और विकास की बाजारी ताकतों की रक्षा में सरकार और सुरक्षा बल। इसमें आदिवासियों की कोई भागीदारी नहीं है।
माओवादियों की इस राजनीति का विरोध करने वाले संगठनों का मानना है कि उनकी इसी राजनीति के कारण आदिवासियों को दमन का शिकार होना पड़ रहा है और लोकतांत्रिक तथा अहिंसक राजनीति के जरिए जंगल और संस्कृति को बचाने की कोई कोशिश सफल नहीं हो रही है। उनका कहना है कि अहिंसक संघर्ष में उन्हें दमन का सामना भी नहीं करना पड़ता। लेकिन विकास के नाम पर जंगल, नदी, पहाड़ सभी को निगलने की कारपोरेट घरानों की मुहिम को हर राजनीतिक पार्टी का समर्थन है। कांग्रेस और भाजपा इसमें सबसे आगे हैं। ऐसे में आदिवासियों को शांतिपूर्ण लड़ाई के लिए कौन संगठित करेगा। ऐसा करने की कोशिश करने वाले कुछ छोटे समूहों के लिए एक तरफ बने सरकार, कारपोरेट और पुलिस बल के समूह और दूसरी तरफ खड़ी माओवादियों की फौज का मुकाबला करना संभव नहीं है। बस्तर में हिंसा का यह सिलसिला खत्म होता नजर नहीं आता। आदिवासी और सुरक्षाबल के जवानों की जान बचाने का कोई रास्ता फिलहाल नजर नहीं आता। एक तरफ गरीब आदिवासी हैं और दूसरी तरफ किसान और ग्रामीण परिवारों से आने वाले सुरक्षा बल के जवान। उनकी चिंता किसी सरकार को नहीं है-न मोदी की और न ही रमन सिंह की।