भाजपा के लिए बहुत कठिन हो गई गुजरात की डगर

डॉ हिदायत अहमद खान

एक समय वो था जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ‘गुजरात मॉडल’ की बात करते नहीं थकते थे। देश हो या विदेश प्रधानमंत्री मोदी गुजरात का गुणगान करना नहीं भूलते थे। ऐसा करके वो लोगों को बताने का प्रयास करते थे कि किस तरह से उनके नेतृत्व में गुजरात ने असीम तरक्की कर ली है और देश के अन्य राज्यों को भी गुजरात मॉडल की ही तरह आगे बढ़ने की प्रेरणा देते नजर आ जाते थे। मानों राज्य का विकास उनकी अपनी व्यक्तिगत उपलब्धी रही, इसलिए वो हर समय गुजरात मॉडल वाला राग अलापते दिखते थे, लेकिन अब न जाने क्या हुआ कि वो इसकी बात ही नहीं करते बल्कि जो लोग इस प्रकार की बात करते हुए दिख जाते हैं तो उनसे वो किनारा करने लगते हैं। अब जबकि गुजरात विधानसभा चुनाव हेतु मतदान की तिथियां नजदीक आ गई हैं तो सत्ताधारी पार्टी का विकास मामले में मौन साधना मतदाताओं की समझ से परे होता चला जा रहा है। वैसे कहना तो यह चाहिए कि यदि गुजरात में मोदी सरकार के कारण विकास हुआ है तो फिर उन्हें वोट मांगने और मतदाताओं को लुभाने के लिए इस कदर रैलियां और सभाएं करने की आवश्यकता ही क्या है, क्योंकि लोग तो विकासवादी सोच के साथ ही होते हैं। ऐसे में उन्हें प्रधानमंत्री रहते हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रचार करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

गौरतलब है कि गुजरात में दो चरणों यानी 9 और 14 दिसंबर को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होने हैं। ऐसे में सत्ताधारी पार्टी को सब कुछ खोने का डर सता रहा है जबकि कांग्रेस के लिए करो या मरो वाला सवाल है। इसलिए दावों और प्रचार-प्रसार में कोई किसी से कम नजर नहीं आ रहा है। दोनों ही ओर से पूरी ताकत झौंक दी गई है। इस कारण भाजपा और कांग्रेस में कांटे की टक्कर चल रही है। यह बात कुछ दिन पहले ही एक हिन्दी न्यूज चैनल के सर्वे से निकलकर आई है। दरअसल 22 साल से गुजरात में राज कर रही भाजपा के लिए सरकार विरोधी लहर बहुत बड़ी चुनौती के तौर पर सामने है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने युवाओं को आगे करके और पाटीदार समुदाय की मदद से भाजपा को चारों खाने चित्त करने की रणनीति के तहत कदम आगे बढ़ाने का काम जारी रखा हुआ है। चुनाव जीतने और सरकार बनाने पर आरक्षण की जिम्मेदारी की बात भी जोर-शोर से की गई है। इससे भी भाजपा को कड़ी टक्कर मिलती दिख रही है। ऐसे में जब ओपिनियन पोल कहते हैं कि भाजपा एक बार फिर सत्ता में लौट सकती है तो इन आंकड़ों पर शक होने लगता है। आखिर सरकार विरोधी लहर के बावजूद जीत कैसे संभव है, इसमें जरुर कोई घाल-मेल हो सकता है।

बहरहाल कुछ अन्य ओपिनियन पोल भविष्यवाणी करते हुए कह रहे हैं कि भाजपा को इस चुनाव में 95 सीटें मिल सकती हैं, जबकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कह चुके हैं कि इस बार पार्टी को 150 सीटें मिलेंगी। अब सवाल यह है कि ये सीटें किस आधार पर मिलने वाली हैं, क्योंकि भाजपा के लिए जहां सरकार विरोधी लहर चिंता पैदा कर रही है तो वहीं पाटीदार आंदोलन से जुड़े युवा नेता और आदिवासियों एवं अल्पसंख्यक समुदाय का कांग्रेस को मिल रहा समर्थन कहीं न कहीं भाजपा को विचलित करने जैसा ही है। इस पर यदि घोषणापत्र की बात की जाती है तो कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में पाटीदारों को आरक्षण, सस्ते पेट्रोल-डीजल और बिजली का वादा करके सरकार से नाराज चल रहे लोगों को एकजुट करने जैसा काम किया है। जिस मुद्दे पर सभी की निगाहें टिकी थीं उसे कांग्रेस ने लपक लिया है। यहां एक और ओपिनियन पोल की सर्वे रिपोर्ट दोनों ही पार्टियों को 43-43 फीसदी वोट मिलने की बात कह रही है, जबकि अन्य के खाते में 14 फीसदी वोट जाने का अनुमान है। इसका मतलब साफ है कि निर्दलीय प्रत्याशियों पर भी मतदाता भरोसा जता सकता है और फिर उन विजयी प्रत्याशियों पर पूरा दारोमदार होगा कि वो किसके साथ मिलकर सरकार बनाते हैं।

सर्वे के मुताबिक 182 सदस्यों वाली गुजरात विधानसभा में भाजपा को कुल 91 से 99 सीटें मिलती दिख रही हैं, जबकि कांग्रेस के खाते में 78 से 86 सीटें जा सकती हैं। इस प्रकार बहुत बड़ा फर्क नहीं दिख रहा है जीत-हार में, लेकिन यह पूरा खेल एक बार फिर जोड़-तोड़ पर जाकर टिकने वाला है। जो पार्टी जितना तोड़ने में सफल रहेगी उसकी सरकार बनाने में उतनी ही बड़ी दावेदारी हो जाएगी। अभी तक केंद्र में रहने का फायदा भाजपा को मिलता आया है, लेकिन गुजरात में यह फार्मूला सफल होते हुए दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए भाजपा की चिंताएं बढ़ी हुई हैं और हर संभव कोशिश की जा रही है कि मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर उन्हें अपने पक्ष में किया जाए। इसके लिए धर्म और जाति कार्ड भी खूब खेले जा रहे हैं, लेकिन सरकार विरोधी लहर कुछ इस कदर प्रभावी सिद्ध हो रही है कि सारे मुद्दे बोने साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस को यहां लाभ मिलता दिख रहा है और भाजपा के लिए बताया जा रहा है कि डगर बहुत कठिन है।