भारत की संस्कृति को सामाजिक संस्कृति कहते हैं : हृदयनारायण दीक्षित


दर्शन और विज्ञान का जन्म जिज्ञासा से हुआ। ऐसी जिज्ञासा ऋग्वेद में है। ऋग्वेद का रचनाकाल प्राचीन यूनानी दर्शन से भी बहुत प्राचीन है। ऋग्वेद के समय के पूर्वज विराट अस्तित्व के प्रति अतिसंवेदनशील थे। विराट विश्व को देखते हुए उनके मन में अनेक प्रश्न थे। एक मंत्र में वे अस्तित्व का केन्द्र जानने के इच्छुक हैं – पृच्छामि त्वां भुवनस्य नाभिः। उनकी जिज्ञासा अस्तित्व चलाने वाले किसी अज्ञात सर्वशक्तिमान की भी है। ऋग्वेद (1.164.6) में प्रश्न है “जिसने छहों लोक थाम रखे हें, उस अजन्मा प्रजापति के रूप में वह एक तत्व किस प्रकार का है? मैं यह बात नहीं जानता। मैं ज्ञानियों से यह बात जानना चाहता हूँ।” यहां न जानकार होने का कोई हीनभाव नहीं। जानने की इच्छा ही प्रकट की गई है। जानने के तमाम लाभ हैं। न जान पाने का दुख भी है। कठोपनिषद् के मुख्य पात्र का नाम नचिकेता है। नचिकेता का शाब्दिक अर्थ भी न जानने वाला ज्ञान अभिलाषी है। नचिकेता की जिज्ञासाएं बड़ी हैं। वे धर्म अधर्म और दिक्काल से भिन्न तत्व के प्रति जिज्ञासु हैं।” वे जानना चाहते हैं कि मृत्यु के बाद क्या होता है? क्या पूरा जीवन समाप्त हो जाता है? या कुछ बचता है? ऐसे प्रश्नों की जिज्ञासा सार्वभौम है। लेकिन भारत में ऐसे प्रश्नों पर गंभीर चिन्तन हुआ है। भारतीय दर्शन विश्व दर्शन की प्रेरणा है।

ज्ञान का तर्क सिद्ध होना जरूरी है। भारत में बिना देखे ही मानने वालों की एक धारा थी। तर्क और प्रश्न आधारित सम्यक दार्शनिक विकास के पूर्व भी सृष्टि के सम्बन्ध में कुछ विचार थे। वैज्ञानिक विश्लेषण को महत्वपूर्ण मानने वाले विद्वानों ने विश्वास की जगह संशय को महत्व दिया। इस समूह ने संभवतः विश्वासी समुदाय को बड़ी चुनौती दी। वे विवश किए गए कि वे अपनी मान्यता को विश्वास के बजाय तर्क, प्रमाण और अनुभव से सिद्ध करें। इसके लिए ज्ञान प्राप्ति की प्रत्यक्ष पद्धति का विकास जरूरी था। इस पद्धति में सूक्ष्म विवेचन को महत्व मिला। इसी से ‘आन्वीक्षकी’ का विकास हुआ। कौटिल्य (लगभग 340 ई0पूर्व) ने ज्ञान प्राप्ति के लिए वेदत्रयी, वार्ता और दण्ड नीति से अलग ‘आन्वीक्षकी’ को महत्वपूर्ण विद्या माना है। लेकिन वाल्मीकि ने ‘रामायण’ में आन्वीक्षकी को सम्मानजनक नहीं माना। माना गया कि आन्वीक्षिकी श्रद्धा घटाती है। आन्वीक्षकी ज्ञान अन्वेषण या अनुसंधान का पर्याय हैं। भारतीय दर्शन के विकास का प्रथम रूप आन्वीक्षकी कहा गया था। आन्वीक्षिकी वस्तुतः ज्ञान विवेचन की तर्क और अनुभव आधारित विशेष बोध पद्धति थी। मनु ने तर्क द्वारा वेदों का अनादर करने वाले लोगों को उचित नहीं माना। आन्वीक्षकी मजेदार बात यह है कि मनु (7.45) ने ही राजाओं के लिए आन्वीक्षिकी के पाठ को उचित बताया है। ‘न्यायसूत्रवृत्ति’ के अनुसार व्यास का कथन भी दिलचस्प है। व्यास ने कहा है कि उन्होंने “आन्वीक्षिकी के आधार पर ही वेदों की व्यवस्था की है।” जिज्ञासा ज्ञान का प्रथम चरण है और जिज्ञासा की पूर्व भूमिका है संशय। संशय से प्रारम्भ जिज्ञासा मन संकल्प की शक्ति लेकर एक विशेष ज्ञान लक्ष्य की पूर्ति करती है। जान पड़ता है कि जिज्ञासुओं के बीच आन्वीक्षकी का प्रभाव लगातार बढ़ता रहा। विवेचन, विश्लेषण, आगमन निगमन की ज्ञानधारा आन्वीक्षिकी का विषय थी। डाॅ0 राधाकृष्णन के अनुसार ईसा पूर्व पहली शताब्दी तक आन्वीक्षकी के स्थान पर ‘दर्शन’ शब्द का प्रयोग होने लगा था। भारत में मूलतः 8 दर्शन उगे। गौतम का न्याय, कणाद का वैशेषिक, पतंजलि का योग, जैमिनि का पूर्व मीमांसा और वादरायण का वेदात ये 6 दर्शन तमाम मूलभूत सिद्धांतों की दृष्टि से समान है। इन सबके स्रोत किसी न किसी रूप में वैदिक वांग्मय में है। शेष दो दर्शन बौद्ध व जैन भी आधारभूत तत्वों से दूर नहीं हैं। मैक्समुलर ने भी भारत के प्राचीन 6 दार्शनिक विचारों पर ऐसी ही राय दी थी।

प्राचीन दर्शन की मुख्य भूमि भारत है। भारतीय पूर्वज प्रकृति की गतिविधियों के प्रति अतिरिक्त जिज्ञासु थे। अतिरिक्त जिज्ञासा का यह साक्ष्य ऋग्वेद से लेकर उपनिषद् साहित्य तक और गाढ़ा हुआ है। भारतीय चिंतन में सबसे छोटे कण परमाणु का विचार बहुत प्राचीन है। ऋग्वेद में रेणु शब्द है। विल्सन ने इसका अनुवाद एटम किया है। कठोपनिषद् का ऋषि सूक्ष्मतम के लिए ‘अणु’ शब्द का प्रयोग करता है। वह ब्रह्म को अणु से भी सूक्ष्म ‘अणोरिणीयान’ कहता है। याज्ञवल्क्य इसे और सूक्ष्म बताते हैं। वृहदारण्यक उपनिषद् में गार्गी और याज्ञवल्क्य के प्रश्नोत्तर हैं। याज्ञवल्क्य ने एक प्रश्न के उत्तर में बताया, “कि वह स्थूल नहीं है। अस्थूल है। वह अनणु है।” उपनिषदों में ऋग्वेद की परंपरा है। इसी परंपरा से सोच विचार की तमाम धाराएं विकसित हुई। मोटे तौर पर इनकी संख्या 6 हुई। लेकिन सभी विचारों व दर्शनों की मूलभूत धारा एक ही थी। जर्मन दार्शनिक मैक्समुलर ने “सिक्स सिस्टमस आॅफ इण्डियन फिलास्फी” में लिखा “मैंने प्राचीन ग्रंथों का जितना ही अधिक अध्ययन किया है उतना ही मैं विज्ञानभिक्षु आदि के इस मत का अनुयायी होता गया कि षट् दर्शन की परस्पर भिन्नता की पृष्ठभूमि में एक ऐसे दार्शनिक ज्ञान का भण्डार है जिसे हम राष्ट्रीय अथवा सर्वमान्य दर्शन कह सकते हैं।”

भारतीय दर्शन के विकास में किसी एक देवदूत, ऋषि कवि या चिन्तक की ही भूमिका नहीं थी। इस दर्शन की नींव संदेह और संशय में थी। संशय की शक्ति से अतिरिक्त जिज्ञासा बढ़ी। प्रमाण मुख्य उपकरण बना। अनुमान का भी साथ लिया गया लेकिन प्रमाण और अनुमान के प्रत्येक पड़ाव पर तर्क प्रतितर्क हुए। इसी मुख्यभूमि से बहुविधि विचार उगे। मैक्समुलर की विवेचना उचित ही है। उन्होंने लिखा, “इस राष्ट्रीय या सर्वमान्य दर्शन की तुलना हम उस विशाल मानसरोवर से कर सकते हैं जो यद्यपि सुदूर प्राचीन काल रूपी दिशा में अवस्थित था तो भी जिसमें प्रत्येक विचारक को अपने लिए सामग्री प्राप्त करने की अनुज्ञा मिली हुई थी।” कह सकते हैं कि ऋग्वेद की अतिरिक्त जिज्ञासा और दर्शन का हेलीपैड एक था। भारतीय विचारकों ने एक ही हैलीपैड से उड़ान भरी। मूल भूमि उनके ध्यान में बनी रही। वे आकाश में उड़े – परम व्योम तक। काल और दिक् भिन्न भिन्न था। सो सबकी प्राप्तियां ऊपर ऊपर भिन्न प्रतीत हुई तो भी वे संतुष्ट नहीं हुए। ऋग्वेद के एक ऋषि ने विशिष्ट विचार की अपनी प्यास सार्वजनिक भी की “हे देवो सभी दिशाओं से भद्र विचार हमारे पास आएं।”
भारत की अपनी वैचारिक समृद्धि और अनुभूति सिद्धि अपर्याप्त नहीं थी तो भी पूर्वज ऋषि व्यापक विश्व से भद्र विचारों के लिए स्तुतिरत रहे। वे विश्व को सत्य, शिव और सुंदर बनाना चाहते थे। सत्यनिष्ठ शिव और सत्य शिवनिष्ठ सौन्दर्य भारतीय चिंतन की मुख्य भूमि है। भारत के कुछेक विद्वान बहुलतावाद का नया विचार लाए हैं। उनकी दृष्टि में भारत की मूलभूत चिन्तन दृष्टि ही नहीं है। यहां सोच विचार और जीवन मूल्य सहित सभी सांस्कृतिक उपकरणों की भिन्नता है। इसलिए यहां कई संस्कृतियां हैं। वे तमाम संस्कृतियों को मिलाकर एक गठबंधन संस्कृति की कल्पना करते हैं। भारत की संस्कृति को सामासिक संस्कृति कहते हैं। संविधान के नीति निदेशक तत्वों में इसके लिए ‘कम्पोजिट कल्चर’ शब्द प्रयोग हुआ है। वस्तुतः भारतीय संस्कृति एक है। राष्ट्र की मूलभूत एकता का आधार भी यही एक संस्कृति है। सृष्टि का आदि तत्व एक है। भारत का भी मूल तत्व एक है। ऋग्वेद में यही “एक सत्य है।” विद्वान इसे भिन्न भिन्न ढंग से बताते गाते हैं।

 

 

 

 

 

 

हृदय नारायण दीक्षित (रविवार पर विशेष)