भारत, चीन की दोस्ती का नया चेहरा

नई दिल्ली : भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चीन यात्रा इस ओर इशारा कर रही है कि फिर से दो पड़ोसी एक अच्छे दोस्त बनने जा रहे हैं। भारत के लिए यह बहुत ही गर्व की बात होगी की चीन सारे गिले, शिकवे भूलाकर भारत को अपना दोस्त समझने की कोशिश करे, यूं तो भारत ने जब भी चीन को अपना बनाने का प्रयास किया तब-तब भारत को निराश होकर ही लौट जाना पड़ा, ये एक ऐसा कड़वा सच है जिसको हम चाहकर भी नहीं भूल सकते हैं, नेहरू के समय में भारत और चीन की दोस्ती एक मिशाल बनी थी,वो दौर हिन्दी-चीनी भाई-भाई के युग के नाम से जाना जाता था, लेकिन 1962 का युद्व ने नेहरू की संवेदनाओं को अधिक ठेंस पहुंचायी, जिससे वह कभी न उभर सके, परिणामत: पंडित जवाहर लाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी जिनके जीते जी प्रण रहा कि वह जब तक जिन्दा रहेंगी तब तक वह चीन के साथ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाएंगी, निःसंदेह इसमें कोई शक नहीं कि इंदिरा ने ऐसा ही किया और चीन के विवाद ज्यों के त्यों ही रहे, इसमें अब चाहे भूटान हो या फिर अरुणाचल प्रदेश, भूटान भारत का ही एक अंग है, जो इंदिरा गांधी के ही फैसले की देन है, लेकिन आज तक सीमा विवाद पर कोई हल निकल पाया है। कुछ फैसले इतिहास भविष्य के लिये ही छोड़ देती है। 80 के दशक तक आते-आते, भारत एक ऐसी बहादुर महिला खो चुका था, जो देश की प्रधानमंत्री रह चुकी थीं, इतना ही नहीं वह जो भी निर्णय लेती थीं वो सशक्त होते थे। इंदिरा के शासन में भारत की चीन के साथ दोस्ती को तो कोई खास अच्छा परिणाम नहीं रहा है, परिवर्तन प्रकृति का नियम है ओर ऐसा ही हुआ जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने तो उन की विदेश नीतियों में भी बदलाव आया, यह कम उम्र वाले पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने देश का कार्यभार संभाला, 1984 में चीन की खिड़की खुली नेहरू के बाद ये वो दिन था जिस दिन का इंतजार देश को ही नहीं पूरी दुनिया को था,राजीव गांधी जब चीन पहुंचे तो चाउ एन लाई ने राजीव गांधी का हाथ एक कॉरिडोर में काफी समय तक थामे रखा और उनका गर्मजोशी से स्वागत किया, क्योंकि ये चाउ एन लाई वही थे, जो नेहरू के दोस्त थे, लेकिन बना न सके। राजीव गांधी की इस यात्रा से दोनों देशों के बीच मजबूत डोर बंधती नजर आयी। धीरे-धीरे दोनों देश करीब आने लगे। 90 का दशक आते-आते दोनों देश विश्व के लिए एक सीख बन चुके थे। चीन के साथ भारत के सामरिक, व्यपारिक, राजनीयिक आदि समझौते हुए, भारत हमेशा से ही चीन के साथ कोल्ड पीस नीतियां अपनाता चला आ रहा है, इंदिरा के बाद कोई ऐसी सरकार नहीं आयी, जिसकी नीतियां चीन के लिए इतनी सशक्त रही हो, 2000 के बाद भारत व चीन की दोस्ती में इतना बदलव आ चुका था कि अब दोनों देश एक दूसरे के साथ अच्छा व्यापार करने लगे थे, आपसी संबंधों में उतार, चढ़ाव तो रहा लेकिन दोस्ती लगातार बनी रही, इसमें दो राय नहीं की भारत ने चीन को एक मित्र माना है अपने बजार में उसको एक स्थान भी दिया है। इस दोस्ती को वो मानें या न मानें, 2011,12, 14 तक कांग्रेस सरकार ने चीन के साथ अपनी नीतियेां को ज्येां की त्यों ही रखा चीन की बेरुखी शुरू से ही भारत के लिए रही है। मुंह में राम राम और बगल में छुरी, जैसे चीन का भारतीय हिंद महासागर मे डेम बनना, पाक के साथ गहरी दोस्ती, बार-बार सीमा पर छेड़खानी करना तथा सुरक्षा परिषद् में भारत की सदस्यता का सयुक्त राष्ट्र संघ में समर्थन करना, इन सभी बातों का एक ही अर्थ देखने को मिलता है कि चीन के न जाने कितने चेहरे हैं, सही चेहरा भारत आज तक नहीं समझ पाया, चीन के साथ भारत की अनउलझी कहानी यूं ही उलझती रही, सच तो यह है कि भारत आज भी चीन की तुलना में बहुत पीछे है। उसी का फायदा वो हमेशा से ही उठाता रहा है। मोदी सरकार के आते आते चीन की दोस्ती भारत के लिए अपना मुखौटा बदल रही थी, भूटान का डोकलाम विवाद तथा ट्रम्प और मोदी की दोस्ती, कश्मीर विवाद आदि चीन का पकिस्तान के साथ दिलचस्पी लेना भारत के लिए चुनौती भरा रहता है। फिर भी भारत चीन के इन विवादों से दूर ही रहता है। 19 मार्च 2018 को चीन ने कहा था कि भारत के साथ चीन के दोस्ताना व्यवहार खासी गति पकड़ रहे हैं, इन दोनों को गिले, शिकवे भुलाकर, दोस्ती को एक नया आयाम देना चाहिए। डोकलाम से भड़के चीन ने फिर से संबंधों को पारस्परिक लाने का प्रयास किया है, भारतीय प्रधानमंत्री की ये चीन की दूसरी सुहानी यात्रा है। भारत चाहे कितने ही विवादों में क्यों न घिरा हो, लेकिन दोस्ती को नया चेहरा देने का प्रयास कर रहा है, अन्तोगत्वा डोकलाम गतिरोधक क्षेत्र में स्थिति वैसी ही है जैसी पहले थी, चूँकि आज भारत सारे मतभेद भुलाकर, चीन से अपने मधुर संबंधों को और बेहतर करने का प्रयास कर रहा है, भले ही सिक्किम सेक्टर में सीमा विवाद अभी तक न सुलझा हो परन्तु भारत की दोस्ती यूं ही रही, मोदी की इस यात्रा के कुछ सूत्रों से ये बताने का प्रयास किया जा रहा है कि दोनों देशों के साथ दो रूपों में समझौते होंगे। पहला औपचारिक दूसरा अनौपचारिक, इन सभी बातों से ये अस्पष्ट होता नजर आ रहा है कि भारत की नीतियां तो वही हैं लेकिन चेहरों ने एक नया रूप ले लिया है।
चाहे चीन व भारत की दोस्ती की कहानी पकिस्तान को भले ही रास न आये, लेकिन अगर ये दोस्ती का बदला चेहरा भारत के लिए बेहतर है तो क्या हर्ज है।

अम्बिका बंसल