मातृभूमि की तरफ़ वापसी का अब प्रश्न ही नहीं उठता

आदरणीया उषा वर्मा जी ब्रिटेन में बसी भारतीय मूल की जानी-मानी साहित्यकार और प्रतिष्ठित भाषा-साहित्य की शिक्षिका हैं। भारत में कुछ वर्ष भागलपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन करने के बाद आप यूके आ गईं।
ब्रिटेन आने के बाद भी आप यॉर्क तथा लीड्स विश्वविद्यालय में लगातार पढ़ाती रहीं। लीड्स मेट्रोपोलिटन विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में सीनियर लेक्चरर के पद पर काम किया। गत कई वर्षों से आप कैंब्रिज विश्वविद्यालय के ओवरसीज़ विभाग में हिंदू धर्म की परीक्षक भी हैं। सम्भवत: आपके अध्यापन के पेशे और आपके विषय मनोवैज्ञानिक ने ही आपको मानव-मन को सूक्ष्मता से जानने-थाहने का कौशल दिया होगा। इसीलिए मानव-मनोविज्ञान का कुशल चित्रण आपकी रचनाओं में परिलक्षित होता है। आप सिद्धहस्त सर्जक होने के साथ ही साथ दक्ष अनुवादक, आलोचक और समीक्षक भी हैं। उषा जी का रचना संसार छोटा अवश्य है, पर उसमें मानवीय करुणा और अन्याय के प्रति विरोध का भाव प्रबलता से मुखर है। आपकी कविताएँ तथा कहानियाँ सजीव व सस्पंद हैं, जिनमें प्रश्न है, पीड़ा है और एक ईमानदार पारदर्शी अभिव्यक्ति है। आपके द्वारा संपादित कहानी संग्रह सांझी कथा-यात्रा की काफ़ी चर्चा रही है। इस बातचीत के माध्यम से आपके व्यक्तित्व व कृतित्व के विविध पहलुओं को उजागर करने की कोशिश की गयी है। विश्वास है कि आपका सृजन-संसार हम जैसे अनगिन साहित्य-नेहियों को समृद्ध व प्रेरित करेगा – सुमन सिंह

– अपनी रचनात्मकता से पहली पहचान कब हुई, कब पता चला कि आप अपनी अभिव्यक्ति को शब्दबद्ध कर सकती हैं?

सुमन जी, आपके प्रश्न का उत्तर लंबा हो जाए तो क्षमा करेंगी। अभिव्यक्ति को शब्दबद्ध करने का आरंभ कब और कैसे हुआ इससे संबंधित कुछ घटनाएं हैं। बचपन में हमारे ममेरे भाई-बहन स्कूल की छुट्टियों में हमारे घर आते थे। हमारे क्रिया-कलापों में से एक था चार बजे सुबह घूमने जाना। पिता का समाज सेवा से जुड़े रहने के कारण बड़ा सम्मान था। अत: हम जिधर भी जाते हमे कोई असुविधा नहीं होती सुबह की ताज़ी हवा और खुले रास्ते बातें करते-करते हम तमसा नदी के किनारे भरतकुंड पहुंच जाते थे। भरतकुंड जहां भरत जी ने 14 वर्षों तक राम के वापस आने की प्रतीक्षा की थी। हम सबकी कल्पना में तमसा नदी के किनारे राम का सूना रथ खड़ा हो जाता। कैसे सीता जी ने राजसी कपड़े उतारे होंगे, कैसे वल्कल वस्त्र पहने होंगे? कभी-कभी हम सब इसे एक छोटे नाटक में बदल देते। रचनात्मकता से पहचान कहां हुई? कुछ और साल निकल गए फैजाबाद के सरकारी स्कूल में जाना शुरू किया। इसके साथ जुड़ी एक छोटी सी घटना थी। मुझे बचपन से ही अच्छी क़लम से बेपनाह शौक़ था। शायद पागलपन की हद तक, मैंने दुकान में एक क़लम देखी थी दाम था पाँच रुपए। घर आकर मां से कहा मुझे वही क़लम ख़रीद दो, मां ने कहा वह तो बड़ी महंगी है, मेरा खाना-पीना छूट गया। मैने दो दिन तक बड़ा ही रोना-धोना किया। बाबू आए अम्मा से पूछा, फिर मुझे साथ लेकर गए और क़लम दिला दी इतनी ख़ुशी कि उसे बताना संभव नहीं। मैंने कई सालों तक उस कलम को बहुत सहेज कर रखा। कोई भी उसे छू नहीं सकता था। उसी क़लम से मैंने एक लंबी कविता लिखी। इस घटना के कुछ साल बाद मेरी कविता की कॉपी स्कूल में खो गई। उसके बाद लिखना भी छूटा। तब भी यह समझ में नहीं आय़ा कि क्या खोया और साथ ही साथ वह क़लम भी खो गई, उसका दु:ख हुआ। किन्तु, तब तो यह अहसास भी नहीं था कि कविता छप भी सकती है। अत: उसके खोने का बहुत ग़म नहीं था। उसके बाद सात साल तक मैंने स्कूल के डांस ड्रामा और डिबेट में अपने को पूरी तरह डुबो दिया।
अपने घर में मैं पहली लड़की थी, जो यूनिवर्सिटी हॉस्टल में रहकर पढ़ने गई थी। मां ने चलते समय कहा था, अपने सम्मान से समझौता कभी न करना। अत: मेरी अपने प्रति बड़ी जम्मेदारियां थी। इलाहाबाद में मुझे इंटर यूनिवर्सिटी डिबेट में गोल्ड मेडल मिला। यहां मैने एकाकी रहना सीख लिया था। इसके बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एमए किया। इसी समय मैने फिलॉसफ़ी में लॉजिकल पॉजि़टिविज्म पर एक लंबा लेख लिखा और इलाहाबाद से निकलने वाली एक पत्रिका दर्शन में भेज दिया। डा. संगम लाल जी ने जो पत्रिका के संपादक थे लेख की सराहना करते हुए कुछ सुझाव दिए और पूछा आप कहीं लेक्चरर हैं क्या? न जाने क्यों मुझे बड़ा ही आक्रोश हुआ, मंैने उन्हें लिखा क्या छपवाने के लिए मेरा लेक्चरर होना ज़रूरी है। अब सोचती हूं तो अपनी मूर्खता पर बहुत हंसी आती है। संगम लाल जी ने क्षमा मांगते हुए लिखा कि उनका ऐसा आशय नहीं था, मैं लेख भेज दूं। वह जरूर छापेंगे। विनम्रता का पहला सबक उनसे सीखा। अपनी अभद्रता से दु:खी होकर मैंने लेख वापस नहीं भेजा। फिर भी सब कुछ उसी तरह रहा। एक उलझन, अजीब सी बेचैनी, कुछ करूं पर क्या करूं जो मुझे इस बेचैनी से छुटकारा दे।
फिर शादी हुई। कुछ दिनों बाद मुझे भागलपुर यूनिवर्सिटी में लेक्चरर की जॉब मिली, इस जॉब के इंटरव्यू पैनल में यशस्वी कवि दिनकर जी भी थे और उन्होंने मुझसे बहुत सारे प्रश्न पूछे, जिससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और उसके बाद मैंने एक कविता अनायास ही लिख डाली, जिसे मैं आपसे साझा करना चाहूंगी। ‘शब्द तुम सूर्य के वंशधर/नचिकेता की अग्नि तुम्हीं/तुम्हीं मेरी आकांक्षा के आकाश/शब्द तुम कस्तूरी का सुवास/पागल करती रही सदा/जीवन भर जंगल जंगल रही भटकती, मैं अभिशापित/ठगी सी, खोई सी, चुपचाप/बेचैन बना जाती/सूनापन भर जाती……।’ मैंने यह कभी नहीं सोचा कि मेरी यह कविता छप भी सकती है।

– प्रवासवास का संयोग कैसे घटित हुआ? प्रवासवास ने आपके साहित्यिक-वैचारिक गति को बाधित किया या कि नए आयाम दिए?
प्रवास में आने का संयोग कुछ ऐसे हुआ। हम सब हैदराबाद में जहां मेरे पति शोध-कार्य कर रहे थे। वहीं उन्हें यॉर्क विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग में भाषा विज्ञान/हिंदी पढ़ाने का अवसर मिला। अत: स्वभाविक रूप से मेरा आना भी हुआ। कुछ समय बाद मुझे भी हिंदी पढ़ाने का अवसर मिला। यहां पढ़ाने के लिए यहां की शिक्षण पद्धति को समझना, विद्यार्थियों को पढ़ाने का अनुभव, एक नई सभ्यता एवं संस्कृति को समीप से देखने समझने की आवश्यकता, सामाजिक तान-बाने में अपनी जगह बनाने के प्रयास में संघर्ष ही संघर्ष था। प्रवास में आकर कुछ साल तो हाथ से निकल गए। नए परिवेश में बच्चों की शिक्षा तथा सामाजिक समस्याओं ने मुझे साहित्यिक रूप से निष्क्रिय बना दिया था। प्रवासवास में ही कुछ वर्षों के बाद गम्भीरता से लिखने का काम प्रारंभ हुआ। प्रवास में मुझे किसी तरह की बाधा नहीं मिली, हां संघर्ष तो था ही। सच कहा जाए तो उसी संघर्ष से विकास का रास्ता मिला। जब समय निकल गया, तब समझ में आया तो, युद्ध समाप्त हो रहा था। जो बन पड़ा कर लिया।

– पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी?
जब मेरी चार कविताएं समकालीन भारतीय साहित्य में छपीं तो मुझे सच में अत्यंत प्रसन्नता हुई। मेरा पहला कविता संग्रह ‘क्षितिज अधूरे’ इंग्लैंड आने के कई साल बाद 1999 में छपा। आदरणीय डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी जी ने इस पुस्तक की भूमिका लिखी। यहीं से दिशा मिली, पहचान मिली। यह कहना उचित होगा कि सिंघवी दंपति के यहां आने से मानो सैकड़ों मंगल दीप जल उठे, सुरभि का ऐसा झोंका जो हम सब को आप्लावित कर गया। सुबह चार बजे उठकर एक बड़े सफेद लिफाफे पर उन्होंने भूमिका लिखी। क्योंकि सुबह भारत जा रहे थे, सामान पैक हो चुका था, पर उन्होंने मेरा मान रखा और अपनी बात पूरी की। मेरी बहुत सी चीज़ें खोई हैं पर उस लिफ़ाफ़े के खोने का अत्यंत दु:ख है। मेरी पहली किताब के छपने का सारा श्रेय मेरे पति महेन्द्र किशोर जी को है। मेरे इधर-उधर पड़े हुए तमाम कागजों को एक जगह रखते जा रहे थे और बाद में वही मेरी पहली पुस्तक ‘क्षितिज अधूरे’ बनी। जिस पहचान की बात आपने पूछी वह अब मेरे सिर पर चढ़कर बोलने लगी। उसके बाद मैं रुकी नहीं, निरंतर लिखती रही।

– क्या प्रारम्भिक परिवेश लेखन कर्म में सहायक था?
सुमन जी घर का परिवेश, डर है कि मेरी बातें आपको अनर्गल न लगें। बाबू पेशे से वकील थे। मां विदुषी थीं उन्हें पढ़ने का शौक़ था, अम्मा को विवाह पर मामा ने एक बड़ी अलमारी किताबों की दी थी। मां दिन में घर के काम से फुरसत होने पर पढ़ती थीं। शरत चंद्र बंकिम चन्द्र, जयद्रथ-बध, भारत भारती सस्वर पढ़ती थीं। सुनते-सुनते जयद्रथ-बध तथा साकेत के कई सर्ग मुझे भी याद हो गए थे। बचपन में हमें पढ़ाने गुरु जी घर पर आते थे। छठी क्लास से स्कूल जाने लगे। हम सात भाई-बहन थे, मैं दूसरे नम्बर पर थी। बचपन में ज्ञान के विस्तार की सम्भावनाएं कम थी, सम्भवत: हमारी दुनिया बहुत ही छोटी थी। नींव तो निश्चय ही घर से पड़ी पर विस्तार बाहर आकर हुआ। जहां हम रहते थे वहां एक पोस्ट ऑफिस, अस्पताल, पुलिस चौकी, तहसील, एक प्राइमरी स्कूल तथा एक रेलवे स्टेशन। घर में अम्मा की कुछ किताबें, एक अंग्रेज़ी का अख़बार और ऑक्सफ़ोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी, हमारी कोर्स बुक तथा बाबू की चार बड़ी अलमारियां भरी हुई थीं लॉ की किताबों से। बदलती हुई परिस्थितियों में भी पुस्तकों का सदैव अभाव बना रहा। यह अभाव प्रवास में बढ़ गया। इतना कुछ लिखा जा रहा है। हर बार भारत जाने पर तमाम किताबें लाती हूं। घर में सारे कमरे तथा अन्य जगहें हम दोनों की किताब और कागज़ से भरी हैं और अब समस्या है कि उनका क्या होगा।

– आप दर्शनशास्त्र की विद्यार्थी रही हैं, दर्शन ने जीवन दर्शन व लेखन शैली को कितना प्रभावित किया?
दर्शनशास्त्र का मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। कविताओं में यह अधिक स्पष्ट हुआ है, मैं समझती हूं कि किसी भी संवेदनशील मनुष्य के अपने जीवन संघर्ष में बार-बार तमाम प्रश्नों से टकराहट होती है। एक महान शक्ति से उपालंभ करता है, पूछता है, फिर आत्मविश्लेषण करता है, अलग तरह की नैतिक समस्याओं की खोज करता है। मिथक मेरी कविताओं में प्रतिरोध की मुद्रा में आए हैं। दर्शन, हमें जीवन के तमाम पक्षों को उलट-पुलटकर देखने की क्षमता देता है। दर्शन पढ़ने से ही मेरी साहित्यिक आत्मा का विस्तार हो सका। तत्व मीमांसा के प्रश्नों ने मुझे तरह-तरह से घेरा, आज भी घेरते हैं। आज की इस तेजी से बदलती दुनिया में पैर टिकाना कठिन है। दर्शन कोई चमत्कार या अलौकिक शक्ति नहीं देता यह अंदर के अंदर जा कर विवेचना तथा अन्वेषण की सामथ्र्य देता है। दर्शन हमारी जीवन दृष्टि को एक आधार देता है, दिशा देता है। इस संसार में अंतर्विरोध व असंगतियां हैं, इनसे हम जितना बच सकते हैं बचाएं, जो नहीं बचा सकते उन्हें स्वीकार करें। शंकराचायऱ् की ‘लोकवत लीला कैवल्यं’ यही स्वीकृति है। यह स्वीकृति ही हमारी ताक़त है।
भारत के कुछ बड़े साहित्यकारों के निर्णयात्मक विचारों को पढ़कर धक्का लगा। प्रवास तो स्वयं में ही एक अजनबी सी स्थिति होती है। खंडित व्यक्तित्व, अतीत के कैदी आदि कहना किसी को छोटा बनाना ही है। साहित्यकारों के प्रति जो एक पूजा का सा भाव था, वह स्वयं ही टूटने लगा। भारत में तो मुझे उन्हें समीप से देखने समझने को मौका नहीं मिला था। उनका साहित्य अवश्य पढ़ा था।

– प्रेरक शक्ति के रूप में किसे स्मरण करना चाहेंगी? आपके प्रिय साहित्यकार कौन है?
प्रेरक शक्ति के रूप को यदि दो हिस्से में बांट दें तो परिवार और साहित्यकार : परिवार में मेरी मां को ही इसका श्रेय मिलेगा। वह ख़ुद भी लिखती थीं। लेख या फिर किसी लेख का जवाब फिर उसे अपने ऑफिस बाक्स में रख देतीं, कुछ दिनों बाद सोचती अब इसका क्या होगा और फाड़कर फेंक देती थीं। संभवत: मेरे अवचेतन मन ने इसे बड़े गहरे कहीं उतार लिया था। भारत में, आदरणीय स्व. आचार्य शिवपूजन सहाय जी के बड़े बेटे स्वर्गीय डा. आनन्दमूर्ति महेन्द्र जी मित्र थे, मेरा आतिथ्य स्वीकार किया। शाम को कुछ साहित्य चर्चा होने पर महेन्द्र जी ने मेरी एक दो कविताएं उनको पढ़ने को दीं। मुझे आचार्य जी ने बुलाया और कहा- बहू तुम बहुत अच्छा लिख रही हो। लिखती रहना। जब मैं इंग्लैंड आई तब कई साहित्यकारों से मिली। यहां हर साल एक विराट कवि सम्मेलन होता है। भारत सरकार कुछ कवियों को भेजती थी। नीरज, हसरत जयपुरी, गिरधर राठी, कुसुम अंसल, गंगाप्रसाद विमल, केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह, केसरीनाथ त्रिपाठी, महीप सिंह, चित्रा मुदगल, कमलेश्वर बुद्धिनाथ मिश्रा, सूर्य बाला ममता जी आदि। 1999 में विश्व हिंदी सम्मेलन में बहुत से साहित्यकार आए और यहीं उनसे परिचय हुआ। यदि नाम लेना हो तो चित्रा मुदगल ने मुझे लगातार लिखते रहने की प्रेरणा दी। कीर्ति जी, गिरधर राठी जी तथा गंगाप्रसाद विमल जी से मैंने बहुत सीखा। आज भी साहित्यकारों के पास बैठने का अवसर मेरे लिए एक पर्व से कम सुखद नहीं है। कमलेश्वर जी के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा था कि उनके पास बैठकर लगता ही नहीं था कि आप एक बड़े साहित्यकार के साथ बैठे हैं। कहानी लिखने की दीक्षा मुझे कमलेश्वर जी से मिली। हिंदी के बड़े-बड़े साहित्यकारों से भी मेरा संपर्क प्रवास में ही हुआ। अत: जो कुछ भी हुआ प्रवास में ही हुआ। साहित्यकारों में ब्रज भाषा के कई कवियों को कोर्स में पढ़ने के बाद अलग से भी अपनी रुचि से पढ़ा, एक उम्र में टैगोर को पढ़ने के बाद बँगला पढ़ी जैनेन्द्र, अज्ञेय ,य़शपाल, प्रेमचन्द्र, फिर प्रसाद पंत निराला, महादेवी, नागार्जुन, दिनकर और रेणु को पढ़ा। कुछ को साधारण तरीके से पढ़ा बहुत से साहित्यकार छूट गए। प्रसाद महादेवी को पढ़कर बड़ा ही सुख मिला। मेरी रुचि कैसी है जहां प्रसाद, महादेवी के आगे नतमस्तक हूं वहीं नार्गाजुन और रेणु अपने जीवन के नज़दीक लगे। अब एक लंबा अन्तराल! साहित्य कहां छूटा कुछ पता ही न चला। ये दिन बड़े ही संघर्ष के थे। बेपनाह चिंताएं। बाद को साहित्यकारों में प्रगतिवादी, आधुनिक, उत्तर-आधुनिक साहित्यकारों को यहां आकर पढ़ा। भारत इतना बड़ा है, साहित्यकार भी उसी तरह बहुत से हैं। कवि सम्मेलन के बाद सदैव घर पर कवि गोष्ठियां होती थीं। य़ॉर्क में हमने भारतीय भाषा संगम की स्थापना की।

– कहानी-कविता में से आपकी प्रिय विधा कौन सी है? कविता को आप कैसे परिभाषित करेंगी?
पहले कविता ही लिखती थी, किन्तु बहुत शीघ्र ही कहानी में मन लगने लगा। कविता मेरे लिए एक आश्रम की तरह है जहां मैं समझती हूं कि मौन से मौन टकराता है। कविता में हिसाब-किताब नहीं लग सकता है। न कोई ज़ोर जबरदस्ती की जा सकती है। कविता में अर्थ का विस्फ़ोट होता है, इसमें गद्य की तरह का विस्तार भी नहीं हो पाता है। कविता शीघ्रता से आपके व्यक्तित्व का परिचय देती है। आपकी जीवन दृष्टि को बताती है।

– आपने अनुवाद कार्य भी किया है, इस ओर प्रवृत्ति कैसे हुई?
अनुवाद में मेरी रुचि एक छोटी सी घटना के कारण हुई। लंदन की एक कथा गोष्ठी में वेल्स से आए कथाकार (स्वर्गीय) कैसर तमकीन की कहानी गंगा-जमुनी का पाठ सुनकर एक कौतूहल हुआ कि उर्दू में क्या लिखा जा रहा है। यह कहानी भारतीय पृष्ठभूमि में लिखी हुई थी। भारत में रहने वाले अल्पसंख्यकों की पीड़ा क्या है? इस कहानी पर सही या ग़लत सभी की प्रतिक्रिया बड़ी ही तीखी रही। पर मेरे मन की तमाम परतों के नीचे अपने अल्पसंख्यक होने का दर्द भी ठाठें मारने लगा। कहीं अंदर जाकर दोनों दर्द एक हो गए, एक संकल्प ने जन्म लिया क्यों न एक हिंदी के साथ उर्दू कहानियों के हिंदी अनुवाद का एक संग्रह निकाला जाए। यह संग्रह विशिष्ट माना गया क्योंकि जहां तक मुझे मालूम है अभी तक इस तरह का कोई संग्रह भारत में भी नहीं निकला था। उर्दू से मेरा प्यार मुझे इतना बड़ा उपहार देगा, सोचा नहीं था। (हिंदी-उर्दू कहानियों के साथ मेरे दो संग्रह हैं और तीसरी किताब में आठ लंबी उर्दू कहानियों का अनुवाद, संकलन और संपादन, एक शायर मीम नून राशिद के कुछ साक्षात्कारों का अनुवाद भी किया है। अंग्रेज़ी में बच्चों की एक किताब का अनुवाद किया है। अब मेरी इच्छा तो है कि बंग्ला में भी एक अनुवाद करूं।

– आपने संपादन कार्य भी किया है, अब तक कितनी कृतियों का संपादन कर चुकी हैं?
मैने अब तक पांच पुस्तकों का संपादन किया है। जो सभी प्रकाशित हो चुकी हैं। मैं यहां से निकलने वाली पुरवाई पत्रिका में यहां के साहित्यकारों की रचनाओं की समीक्षा करती रही हूं। यह कठिन काम लगा इस छोटी सी दुनियां में दूर से हम सभी एक-दूसरे को जानते थे। पर मेरा अपना सोचना था कि हम सभी अपनी सामथ्र्य भर लिखते हैं। सभी नए हैं। अत: कहानी कविताओं की विशेषताओं पर ही ध्यान देती थी। इसका सबसे बड़ा लाभ मुझे हुआ जब मैंने आलोचना की कई पुस्तकें पढ़ीं और सीखा। अब मन तो है कि उन्हें भी किताब का रूप दे दूं।

– अपने अध्यापन कार्य से जुड़े कुछ अनुभव साझा करना चाहेंगी, आपकी किन पुस्तकों पर शोध कार्य हो रहे हैं?
एक घटना जिसने मुझे बड़े ही धर्म-संकट में डाल दिया। मैं यूनिवर्सिटी में पीजीसीई के विद्यार्थियों को पढ़ाती थी यूं तो मैं लैंग्वेज लर्निंग के क्लास लेती थी पर दूसरे टर्म में मुझे आरई मतलब रिलिजस एजूकेशन भी पढ़ाने को कहा गया, एक बात यहां बतानी ज़रूरी है कि यह कोर्स एक विशेष उद्देश्य से शुरू किया गया था। इसमें केवल अल्पसंख्यक भारतीय, पाकिस्तानी, बंग्लादेशी और एक दो पोलिश शिक्षार्थी ही थे। और यह कोर्स का पहला दिन था, मैं क्लास में पहुंची और अपने कागज सम्हाल रही थी। सोलह विद्यार्थियों में से एक विद्यार्थी खड़ा रहा। मैंने कहा क्या बात है, आप भी बैठिए। उसने कहा मुझे आप से एक बात पूछनी है। मैंने कहा पूछिए – ऐसा क्यों है कि हिंदू-मुसलमानों से इतनी नफ़रत करते हैं। मैं अजीब धर्मसंकट में पड़ गई। क्या उत्तर दूं। मैंने कहा देखिए, मैं आपके प्रश्न का उत्तर ज़रूर दूंगी, पर आज नहीं। आज तो पहला दिन है, हम सब एक-दूसरे को अपना परिचय दें और कोर्स की आउट लाइन पर बात कर लें तो अच्छा है। कुछ लड़कों ने भी सपोर्ट किया। सालभर बीत गया, सबके इम्तहान हो गए। रिजल्ट का दिन था, मैंने एक सिख शिक्षार्थी से कहा कि सलीम को मेरे कमरे में भेज देना। थोड़ी देर बाद सलीम (काल्पनिक नाम) सरदार लड़के के साथ मेरे कमरे में आया, वह काफ़ी डरा हुआ लग रहा था। मैंने कहा आइए, बैठिए। आप लोग पास हो गए, बहुत बधाई। सलीम, आपने साल भर पहले कोर्स के पहले दिन मुझसे एक सवाल पूछा था, याद है। वह मेरे नजदीक आया – दोनों हाथ जोड़ कर बोला- मुझे माफ़ कीजिए, मेरे यहां तो मिलिटरी रूल है जो कुछ भी बताते हैं कुछ भी सच नहीं है। सालभर से मैं अपने भारतीय मित्रों के साथ पढ़ रहा हूं और गर्व के साथ कह सकता हूं कि मेरे भारतीय मित्र पाकिस्तानी मित्रों से अधिक मददगार और प्यार करने वाले हैं। आपको भी बहुत शुक्रिया कि आपने हम सबको बहुत मेहनत से पढ़ाया और इस लायक बना दिया कि हम मेन स्ट्रीम की जॉब पाने के हकदार हो गए हैं।
सुमन जी शोध मेरे कहानी संग्रह ‘कारावास’ पर पीएचडी विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की छात्रा श्वेता सिंह ने किया है। कोर्स में किताबों का लगवाना, शोध कार्य करवाना या पुरस्कार आदि के मामले में मैं बहुत पीछे हूं। मेरा विश्वास है कि जब जो मिलना होगा स्वयं ही मिलेगा।

– वर्तमान स्त्री-लेखन की दिशा-दशा और उनका स्त्री-सशक्तीकरण पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में आपके क्या विचार हैं?
सुमन जी आपके प्रश्नों में विस्तार की ज़रूरत है शायद हम दो-तीन मुद्दों पर अपने उत्तर को सीमित कर लें तो कुछ कुहासा दूर न भी हो तो भी प्रश्न तो पूछा जा सकता है। स्त्री लेखन की दशा को दो प्रकार से आंका जा सकता है। एक तो वैचारिक स्तर पर दूसरा यथार्थ के स्तर पर। स्त्री लेखन का उद्देश्य क्या है? जहां तक साहित्य का प्रश्न है, यह गंतव्य तक तो नहीं पहुंच गया है, किन्तु रुका भी नहीं है, सतत गतिमान है। वैचारिक स्तर पर स्त्री लेखन ने नारी को केन्द्र में स्थापित किया है। उसकी अस्मिता को, उसके सम्मान को नकारा नहीं जा सकता है। यह अब हाशिए पर पड़ी बिसूरती नहीं है। अपनी पूरी ताक़त के साथ युद्ध के लिए तैयार है। यह सच है। प्रभा खेतान, मन्नू भंडारी, चन्द्र किरण सौनरेक्सा, पुष्पा मैत्रेयी और रिंर्की भट्टाचार्या आदि ने अपने जीवन अनुभवों की व्यथा कथा को शब्दबद्ध किया है। यह बड़े ही साहस का काम है। उसकी दिशा में कोई भटकाव नहीं है। यह पारदर्शी और (सुनिश्चित) है। आत्म कथाएं विशिष्ट हैं और हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि भी हैं। सभी लेखिकाएं पढ़ी लिखी और आर्थिक सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर भी हैं फिर भी स्वतंत्र जीवन को नहीं अपना सकीं। क्यों, इसका उत्तर भी सभी ने कुछ न कुछ दिया है। मैं समझती हूं कि पति-पत्नी के आपसी संबन्धों में भावनाओं का मुख्य स्थान है। कानूनी अधिकारों से थोड़ी सुविधा तो होगी लेकिन उसमें संवेदनाओं के लिए कोई भी जगह नहीं है। सिद्धान्त समता-मूलक हों उनमें एक तरह का संतुलन हो वर्ना जो आज स्त्री की दशा है वही पुरुष की होगी। क्या हम बदला लेना चाहते हैं या पुरुष की मानसिकता को बदलकर उस जगह लाना चाहते हैं जहां से सुखी जीवन की नींव पड़े। इसके लिए हमें केवल भाषणों की आवश्यकता नहीं है वरन छोटे-छोटे ग्रुप में ऐसी एक्टीविटी करवाई जाएं जिसकी सहायता से बिना अपमानित हुए पुरुष वर्ग अपने अंदर झांक सके। अभी छोटे कस्बों में आदिवासियों में जन जातियों में बहुत काम करना बाकी है। यूनिवर्सिटी में वीमेंस स्टडी के कोर्सेज से अत्यंत जागरूकता आई है। एनजीओ भी अच्छा काम कर रहे हैं। अभी तो ज्वलंत समस्या बलात्कार और हिंसा की है, सुरक्षा की है। नारी मुक्ति आंदोलन या स्त्री विमर्श पूरे भारत में एक तरह का नहीं है। बिहार, उत्तर प्रदेश, असम आदि में यह अभी भी काफ़ी पीछे है। यद्यपि स्वतंत्रता के बाद इसकी गति में तेज़ी आई है। नारी मुक्ति आंदोलन ने जहां एक तरफ़ स्त्री समाज को मुक्ति का आश्वासन दिया वहीं एक विशेष वर्ग की स्त्री ने इसे देह मुक्ति का पर्याय समझा। यह सब किसी न किसी रूप में लंबे समय से चल रहा है। पिता की संपति में अधिकार, वोट देने का अधिकार आदि में कोई दिक्कत नहीं है। यह सब मिल भी गया है, किन्तु जहां संबन्ध विच्छेद का प्रश्न है, इसका घातक प्रभाव बच्चों के जीवन के लिए बड़ी समस्या के रूप में उभरकर आ रहा है। और आवाज आ रही है कि बच्चों के ही लिए आपसी मतभेद को भुलाकर साथ ही रहना चाहिए। हां, यहां की नारी स्वतंत्र है तो अवश्य ही किन्तु इसका असर बच्चों के मानसिक संतुलन पर पड़ता है। व्यक्तिवादी समाज में नारी अपने सुख के अधिकार को बचाना चाहती है, बचाना भी चाहिए, पर कैसे? यह बिना पुरुष के सहयोग के संभव नहीं है। देखने में लगता है कि यहां हर औरत सुखी है, पर यह सच नहीं है।
पाकिस्तान, बंग्लादेश और भारत के गांव से जो लड़कियां यहां शादी करके आती हैं, उनके घर के सदस्य पहला काम करते हैं कि उनका पासपोर्ट तथा रुपया पैसा सब ले लेते हैं। लड़कियां कुछ नहीं कर पाती हैं। सरकारी सेंटर जगह-जगह खुले हैं, जहां उन्हें अंग्रेजी सिखाई जाती है। वहीं से उन्हें बहुत तरह की क़ानूनी सहायता भी मिलती है। परन्तु भावनात्मक रूप जो चोट परिवार के लोग पहुंचाते हैं उसका कोई उपाय नहीं है। ऐसे संयुक्त परिवार के लिए भी कार्यशालाओं की आवश्यकता है।

– अब तक की सृजनात्मक-यात्रा से संतुष्ट हैं, स्वदेश अब कितना और क्यों आकर्षित करता है?
जो लिखा वह रखा नहीं, जो समय मिला उसमें कुछ लिखा नहीं, फिर भी यह सोचकर मन को समझा लेती हूं। इतना ही मेरा प्राप्य था। पहुंच जाऊं गन्तव्य तक/इतना अब समय नहीं/अपनी तमाम आकांक्षाओं को समेटकर/मांगती हूं तुमसे/एक और जीवन/स्वदेश तो आपने तमाम सौंदर्य और कुरूपता के साथ हवा की तरह लिपट जाता है। मैं लाख चाहूं तो भी उससे अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकती। यह प्रश्न ही मन को अशांत बना देता है। मातृभूमि की तरफ़ वापसी का प्रश्न नहीं उठता है। नि:श्चय ही वापसी नहीं होगी। वापसी न होने पर भी लौटने की ललक तो साथ जाएगी ही।

– आजकल क्या लिख-पढ़ रही हैं, भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
मैं आजकल कश्मीर की राजनीति पर कुछ समझने का प्रयास कर रही हूं और शायद कुछ अधूरे काम पूरे हो जाएं। एक उपन्यास पूरी तरह से शांत रहकर लिखने का मन है। कुछ लेख भी सामाजिक समस्याओं पर लिखना चाहती हूं। जो भी समय और शक्ति होगी सब-कुछ उसी पर निर्भर है।