मेरठ की जीत से मायावती को मिली सियासी संजीवनी

सत्ता की हनक से भरी भाजपा हैट्रिक से चूकी, सीएम योगी की रैली भी काम न आई

-के.पी. त्रिपाठी

मेरठ : मेरठ में मेयर की सीट पर जीत दर्ज कराकर बसपा और उसकी सुप्रीमो मायावती को सियासी संजीवनी मिल गई है। 2017 के विधानसभा चुनाव को अभी ज्यादा समय भी नहीं हुआ जब बसपा इस क्षेत्र में अपना खाता भी नहीं खोल पाई। मोदी और योगी की आंधी में हाथी के पैर उखड गए थे और साइकिल भी पंचर हो गई थी। लेकिन साइकिल मेरठ शहर में चली और वहां से रफीक अंसारी चुनाव जीतने में सफल हुए। भाजपा पदाधिकारी इस बाद दावा कर रहे थे कि वे कांता कर्दम की जीत के साथ निगम में हैटिक बनाएंगे। लेकिन आपसी भितरघात और विधायकों का चुनावी लय में न आना भी भाजपा की हार का एक बडा कारण रहा। पार्टी ने 90 वार्ड में से 80 पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद से ही कार्यकर्ताओं ने टिकट बंटवारे में भेदभाव का आरोप लगाने शुरू कर दिए थे। जिस कारण बाजी बसपा के हाथ लगी।

बसपाइयों का मानना है कि भाजपा लगातार दो बार निकाय चुनाव इस कारण जीतती आई कि बसपा ने पिछले दोनों चुनाव सिंबल पर नहीं लडे थे। मुस्लिम और दलित वोटो के बिखराव के कारण बसपा समर्थित उम्मीदवार जिताऊ साबित नहीं हुआ। जिसका भरपूर लाभ भाजपा ने उठाया। इस बार बसपा ने सिंबल पर चुनाव लडा लिहाजा बसपा का कैडर वोट मुस्लिम और दलित एक हो गया और बाजी बसपा के हाथ लगी।

सही साबित हुआ मायावती का फैसला :- बसपा सुप्रीमो ने इस बाद निकाय चुनाव अपने सिंबल पर लडने का फैसला किया जिसका नतीजा उसे मेरठ में जीत के रूप में प्राप्त हुआ। निकाय चुनाव में बाजी हाथ लगने से यह बसपा और उसकी सुप्रीमो मायावती के लिए सियासी संजीवनी से कम नहीं है।