मेरी कलम से…

कनार्टक चुनाव के मद्देनजर इतिहास के गढ़े मुर्दों को उखाड़कर विवाद पैदा कर प्रतीकों की राजनीति करने का सिलसिला जारी है। ताजा विवाद मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को लेकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का है। यह विवाद अचानक ही सामने नहीं आया। बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थ हैं। विवाद यह है कि जिस जिन्ना ने देश का बंटवारा किया, विश्वविद्यालय में उनकी तस्वीर क्यों लगाई जाए। जिन्ना अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापकों में थे। सवाल यह है कि विश्वविद्यालय में दशकों से यह तस्वीर लगी हुई है, अचानक इस पर इतना विवाद क्यों पैदा हो गया। यदि जिन्ना की तस्वीर पर आपत्ति थी तो देश में ऐसे सैंकड़ों प्रतीक मौजूद हैं जिनमें अंग्रेज शासक भी शामिल हैं जिन्होंने देश पर सैकड़ों सालों तक जुल्म व राज किया। तो विवाद केवल जिन्ना की तस्वीर पर ही क्यों? निहितार्थ साफ हैं कि धर्म विशेष के प्रतीक को उभारकर राजनीति में एक विशेष विचारधारा को अपने पक्ष में लामबंद करने की कवायद है। ऐतिहासिक और पुरातत्व के चिन्हों को हटाने के बाद इतिहास में बाकी क्या रह जाएगा? इससे समूचा इतिहास ही विकृत हो जाएगा। दुनिया में अधिकतर देश कभी न कभी गुलामी की त्रासदी झेल चुके हैं। सभी देशों में गुलामी के प्रतीक मौजूद हैं। ये चिन्ह ही उनके इतिहास और संस्कृति की गाथा कहते हैं। इन्हें हटा या मिटा देने के बाद इतिहास बदल नहीं जाएगा। ऐसे विवादित मुद्दों से कुछ समय के लिए वोट बैंक को जरूर एक पक्ष में किया जा सकता है, किन्तु समस्याओं का समाधान कभी नहीं होगा। जब सरकारें वायदों के मुताबिक विकास नहीं कर पातीं और लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पातीं। तब मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ऐसे विवादों को उभारा जाता है, ताकि लोगों का मुख्य विषय से ध्यान हटाकर असल मुद्दे से भटकाया जा सके जिससे आम जनमानस विकास को लेकर सवाल जवाब न कर सके। देश में चुनौतियों की कमी नहीं है। राज्य हो या केंद्र सरकार, सभी के सामने गुणवत्तायुक्त विकास की जबरदस्त चुनौतियां हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और संगठन सरकारों को विकास की सच्चाई का आईना दिखाते ही रहते हैं। ऐसे में राजनीतिक पार्टियों को फिजूल के नुकसान पहुंचाने वाले मुद्दों के बजाए मूलभूत आवश्यकताओं और देश के भविष्य के विकास के मद्देनजर सकारात्मक कार्यों में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए।

  • रामकुमार सिंह