मोदी का भगवा अक्स योगी

- in दस्तक-विशेष

संजय सक्सेना
उत्तर प्रदेश में योगी राज आ गया है। योगी में किसी को मोदी का चेहरा नजर आता है तो किसी को लगता है कि पीएम मोदी ने अपने उत्तराधिकारी की तलाश पूरी कर ली है। योगी में लोग भावी प्रधानमंत्री की छवि देखते हैं। मोदी-योगी की तुलना करने वाले कहते हैं दोंनो प्रखर वक्ता हैं। अपनी बात बेबाक कहते हैं। दोनों संयमित जीवन जी रहे हैं। दोंनो ही योग विद्या में निपुण हैं। भले ही मोदी ने योगी की तरह भगवा वस्त्र धारण न कर रखा हो, मगर विचार से मोदी भी योगी ही हैं। मोदी ने भी देशसेवा के लिये युवा अवस्था में घर-परिवार त्यागा था और योगी भी देश सेवा के लिये बैराग्य धारण किया था। दोंनो हिन्दू हृदय सम्राट हैं। दोंनो के प्रशंसकों की लम्बी लाइन है। मोदी हों या योगी दोंनो को कुछ लोग भगवान की तरह मानते हैं तो ऐसे लोंगो की संख्या भी कम नहीं है जो मोदी-योगी के कट्टर विरोधी हैं। दोंनो पर विरोधियों ने जितना सियासी हमला किया, वह उतनी ऊंचाइयां हासिल करते गये। शायद ही किसी और नेता पर इन दोंनो जैसा हमला किया गया होगा। दोंनो की कार्यशैली में भी काफी समानता नजर आती हैं। मोदी बड़े से बड़ा फैसला लेते हुए रत्ती भर नहीं हिचकिचाते हैं तो योगी भी बेफिक्र होकर निर्णय ले रहे हैं। शायद इसीलिये कुछ लोग योगी को लम्बी रेस का घोड़ा समझ रहे हैं और उन्हें अपनी सियासत डगमगाती दिख रही है। मोदी और योगी को दिलोजान से चाहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि देश में हिन्दू हितों की बात करने वाले कई नेता आये और चले गये,परंतु जिस तरह से मोदी और योगी ने जातियों में बंटे हिन्दू समाज को एकजुट करने का काम किया, उसका बड़ा फायदा देश को मिलना तय है। इसी के चलते तमाम बुद्धिजीवियों को भी लगने लगा है कि जातिवाद फैलाकर और मुसलमानों को बेवकूफ बना कर वोट बैंक की सियासत करने वाले मुलायम-मायावती की सियासत के दिन भी लद चुके हैं, जिसके चलते आने वाले दो वर्षों में शिक्षा-स्वास्थ्य से लेकर सामाजिक स्तर पर उत्तर प्रदेश में काफी बड़े-बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। वहीं कुछ लोग तो यह भी मान बैठे हैं कि अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर बनने का समय आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से बातचीत के द्वारा अयोध्या विवाद को खत्म करने की गुजारिश दोंनो पक्षों से की है, उससे यह भी लगने लगा है कि यह समय मंदिर निर्माण के लिये सबसे अनुकूल है। सीएम योगी सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर सहमति भी जता चुके हैं। बस, अब तलाश ऐसे मुस्लिम बुद्धिजीवियों की हैं जो रूढ़िवादी सोच से ऊपर उठकर सोचते हैं, जिनको पता है कि दरअसल कथित बाबरी मस्जिद एक ढांचा मात्र हैं, जहां कुरान की ‘रोशनी’ में बैठकर अल्लाह की इबादत नहीं की जा सकती है। खैर, बात को आगे बढ़ाया जाय तो यह साफ नजर आ रहा है कि सत्ता में बदलाव के साथ राज्य का मिजाज भी बदल गया है। सत्ता के गलियारों में जो चेहरे पिछले 14 वर्षों से घूम फिर कर नजर आते थे, वह अब कहीं दिखाई नहीं पड़ते हैं। अवैध बूचड़खाने बंद हो रहे हैं। अखिलेश राज में प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था में लड़कियों और महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाओं ने ‘चार चांद’ लगाने का काम किया था, इसीलिये योगी ने सबसे पहले मजनुओं पर लगाम लगाने के लिये एंटी रोमियो स्काट फोर्स का गठन करके छेड़छाड़ करने वाले शोहदों पर शिकंजा कसने का काम शुरू कर दिया है। पुलिस ऐसे शोहदों को पकड़कर सबक तो सिखाती है, उनके घर वालों से भी बात करके उनके लड़के की करतूत बताती है। योगी की सरकार बने अभी चंद दिन हुए है, उम्मीद यही है कि गुजरते समय के साथ योगी के तेवर और भी सख्त होते जायेंगे। अगर योगी किसी बात का ख्याल रखेंगे तो सिर्फ इतना की उनके ऊपर कोई ऐसा दाग नहीं लगे जिसे वह धो नहीं पायें। खासकर मुस्लिमों के मन से भय निकालना उनकी पहली प्राथमिकता होगी।
बहरहाल, उत्तर प्रदेश में मुलायल के समाजवाद का सूरज अस्त हो गया है। मायावती की दलित सियासत हासिये पर चली गई है। पूरा प्रदेश केसरिया नजर आ रहा है। क्या बच्चे क्या बड़े सभी की जुबान पर एक ही नारा है, ‘देश में मोदी, प्रदेश में योगी।’ माहौल कुछ ऐसा बना हुआ है, जैसे प्रदेश में कोई बड़ा चमत्कार होने वाला है। योगी सरकार जादुई छड़ी से सब कुछ दुरुस्त कर देगी। सारे गुंडे जेल में चले जायेंगे, भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिट जायेगा, भूमाफियाओं पर नकेल लग जायेगी। महिलाओं को सम्मान मिलेगा और युवाओं को रोजगार। सबका साथ, सबका विकास होगा। यानी राम राज्य साकार रूप ले लेगा और अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर भी बन जायेगा। कहीं किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। गौवध बंद हो जायेगा और प्रदेश में श्वेत क्रांति आयेगी। यह नजारा दो अक्षरों के आगे पीछे होने भर से बदल गया है। अभी तक जनता ने ए.वाई. (अखिलेश यादव) का राज देखा था, अब प्रदेशवासी वाई.ए. (योगी आदित्यनाथ) का चमत्कार देखेंगे। वैसे, तो योगी सरकार का कार्यकाल पांच वर्षों का है, लेकिन उन्हें जो भी करना है सिर्फ दो वर्ष के भीतर करना होगा। दो वर्ष बाद 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं। तब तक प्रदेश के हालात नहीं बदले तो इसका खामियाजा मोदी टीम को आम चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।
यूपी में लोकसभा की 80 सीटें हैं और 2014 में बीजेपी गठबंधन ने 73 सीटों पर कब्जा किया था। बाकी बची सात सीटों में से दो पर कांग्रेस और पांच पर समाजवादी पार्टी की जीत हुई थी, जबकि मायावती की पार्टी का खाता भी नहीं खुल पाया था। भाजपा की झोली में गई 73 सीटों का मोदी सरकार बनाने में अहम किरदार रहा था। यूपी के रास्ते दिल्ली पहुंचने की चाहत में ही मोदी अपने गृह जनपद गुजरात को छोड़कर वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़े थे। कभी मां गंगा ने बुलाया है तो कभी अपने आप को यूपी का गोद लिया बेटा बताकर मोदी ने यूपी में अपनी जड़े काफी गहरी कर ली हैं। विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने विजय पताका तो फहराई ही, इसके अलावा 403 में से 325 विधान सभा सीटें जीत कर बीजेपी (मोदी) ने अपने नाम सबसे अधिक सीटें जीतने का नया रिकार्ड भी बना लिया है। बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद के लिये कोई भी प्रत्याशी घोषित नहीं किया था। मोदी ने करीब दो दर्जन सभाएं की थीं, मोदी के साथ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कंधे से कंधा मिलाकर चले थे। पूरा चुनाव प्रचार मोदी और अमित शाह के इर्दगिर्द घूमता रहा था। इस लिये जीत का श्रेय भी उन्हीं को दिया जा रहा है।
यही वजह थी, सीएम के चयन से डिप्टी सीएम और मंत्रियों तक के चयन और विभाग बांटने के मामले में मोदी-शाह की खूब चली। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि यूपी में सीएम की कुर्सी के लिये जो रेस होती दिख रही थी, वह दिखावटी थी और हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं था, क्योंकि पीएम नरेन्द्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने तो पहले ही तय कर लिया था कि योगी ही सीएम होंगे। अपनी बात को पुख्ता करने के लिये ऐसे लोग तर्क देते हुए कहते हैं कि योगी सीएम होंगे इसका संकेत 28 जनवरी को साफ-साफ देखने को मिला,जब बीजेपी ने अपना संकल्प पत्र जारी किया। अमित शाह की उपस्थिति में संकल्प पत्र जारी करने के लिये मंच पर जो कुर्सिंया रखी गई थीं, उस पर योगी आदित्यनाथ के अलावा बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या और बीजेपी के उपाध्यक्ष और लखनऊ के मेयर डा0 दिनेश शर्मा बैठे थे। योगी चुनाव प्रचार छोड़कर विशेष तौर पर संकल्प पत्र जारी करने के लिये आये थे और उन्हें पूरी तरजीह दी गई थी। यह और बात थी बीजेपी को मिली शानदार जीत के बाद कुछ समय के लिये केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह, केन्द्रीय मंत्री मनोज सिन्हा सहित तमाम नेताओं का नाम सीएम की कुर्सी के लिये उछला, परंतु अंतिम फैसला वैसा ही आया, जैसा पूर्व में तय हो चुका था।
योगी सीएम और केशव प्रसाद मौर्या तथा डा. दिनेश शर्मा डिप्टी सीएम बने तो इसके साथ ही यह भी तय हो गया कि मोदी-शाह की जोड़ी उसी राह पर चल पड़ी है जिस पर चलकर मुलायम और मायावती ने कई वर्षों तक यूपी पर राज किया था। बस, उसका रूप वृहद हो गया था। मुलायम ने मुसलमानों और पिछड़ों को साथ लेकर सियासत की लम्बी पारी खेली तो मायावती ने दलितों के साथ कभी मुस्लिमों तो कभी ब्राह्मणों को खड़ा करके सत्ता की हसरत पूरी की। मुलायम और मायावती की सियासत को आगे बढ़ाते हुए मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने अगड़े-पिछड़े,दलितों सभी को एकजुट करके हिन्दुत्व को धार दे दी। नतीजा यह हुआ तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले हासिये पर चले गये। वैसे, इससे इत्तर ऐसे लोंगों की भी संख्या कम नहीं है जिनको लगता है कि एक योगी के अपमान की कीमत सपा को चुकानी पड़ी। 12 मार्च 2007 को लोकसभा में योगी आदित्यनाथ तत्कालीन मुलायम सरकार पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए आंसुओं से रोये थे और ठीक दस वर्षों के बाद 11 मार्च 2017 को समाजवादी पार्टी का बुरी तरह से पतन हो गया। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि योगी को रुलाने वाले मुलायम का मई 2007 के विधान सभा चुनाव में सफाया हो गया था। मायावती सत्ता में आई थीं।