मोदी को खोने का समय हरगिज नहीं है भारत के लिए, हर आजमाइश से खरे होकर निकले हैं मोदी

फिरोज बख्त अहमद : भारत में एक बार फिर चुनाव का बिगुल बज चुका है। आजतक जितने भी चुनाव हुए हैं उनके बारे में यही कहा गया है कि वे सभी किसी न किसी प्रकार से ऐतिहासिक होते हैं, जोकि ठीक भी है। 2019 के चुनाव के संबंध भी, कुछ ऐसा ही कहा जा रहा है। इसमें एक ओर तो नरेन्द्र मोदीजी और भाजपा की साख दांव पर लगी हुई है, तो दूसरी ओर कांग्रेस भी अपने अस्तित्व को बढ़ाने और बनाने का पूरा प्रयत्न कर रही है। इधर मोदीजी को कई स्पीड ब्रकरों का सामना करना है, जैसे-नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी, मंदिर मस्जिद आदि। हां, एक बात थी जिसके लिए मोदी की प्रषंसा करनी होगी वह है, हिंदू-मुस्लिम दंगों का नदारद होना। यह अवष्य है कि उन्हीं की पार्टी के कुछ लोगों ने, अखलाक आदि काण्ड को पूर्ण रूप से कंट्रोल न करने के लिए एक अतिरिक्त स्पीड ब्रेकर और खड़ा किया है। ये कुछ ऐसे ही लोग हैं कि जिन्होंने मोदी के साफ-सुथरे राज-काज को कुछ हद तक बट्टा लगाया है। यह बात तो जग जाहिर है कि मोदी को 2014 जैसा प्रगाढ़ समर्थन न मिले, मगर इतना अवष्य है कि इन पांच सालों में प्रधानमंत्री ने स्वयं न केवल अपना वर्चस्व बनाए रखा है बल्कि अपनी साख को भी संजोए रखा है। 2019 का चुनाव, भाजपा के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण चुनाव है क्योंकि आम आदमी पार्टी की भांति, जिस प्रकार से भाजपा ने भी वायदों की लड़ी लगा दी थी, वह बजाए फुलझड़ी बनने के, फुस्स हो गई, मगर यहां, हम यह भूल जाते हैं कि भात के इतिहास में, यह पहली बार हुआ कि भाजपा को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ और ऐसे समय में प्राप्त हुआ कि जब उसके पास पिछली कांग्रेस सरकार ने अगिणत चुनौतियां छोड़ दी थीं। जब भाजपा के हाथ में, सरकार आई तो दस साल के राज के बाद उसे खाली खजाने ही हाथ लगे। 2जी, 3जी, कोल-गेट आदि के अतिरिक्त भी यू0पी0ए0 द्वारा काफी घोटाले हुए। 2014 से 2019 तक मोदीजी को पिछले 70 वर्श के खड्डे भरने थे जोकि एक बड़ा कठिन कार्य था। फिर भी अपनी ओर से नरेन्द्र मोदी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। जहां तक महंगाई का संबंध है, विष्व में एक भी देष ऐसा नहीं है कि जहां उसके आने वाले वर्शों में या तो महंगाई स्थिर हो या कम हुई हो। फिर भी मोदी ने, गरीबों की समस्याओं को सामने रखते हुए महंगाई पर अंकुष लगाने का पूर्ण रूप से प्रयास किया है। पिछले पांच वर्शों में कुछ ऐसा भी देखने को मिला कि जो कर्मठता स्वयं प्रधानमंत्री मोदी में है कि सवेरे साढ़े चार बजे उठ कर योगा आदि से फारिग हो जो 18-20 घण्टे, वे छक कर, काम करते हैं, सिवाए कुछ को छोड़ कर, अधिकतर मंत्रियों ने यह गुण उनसे नहीं सीखा। भाजपा के लिए एक अन्य समस्या यह भी रही कि वह राम मंदिर की स्थापना नहीं कर पाई। हालांकि, कोषिष जारी है और यो तो समय ही बताएगा कि राम मंदिर कब बनता है। हां, यहां भाजपा की एक प्रकार से प्रषंसा भी करनी होगी कि उन्होंने किसी भी प्रकार असंवैधानिक, अनैतिक या असभ्य बात इस संदर्भ में नहीं की। लेखक यहां यह अवष्य बताना चाहेगा कि राम मंदिर के संबंध में, भाजपा से, बड़ी भूल, उस समय हुई कि जब उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीष, न्यायमूर्ति, केहर ने आपसी भाई-चारे द्वारा, कोर्ट से बाहर, इस गर्मा-गर्म मामले को निपटाने का आग्रह किया, और तुरंत, सभी के मेल-जोल से राम मंदिर निर्माण के इस सुनहरी अवसर को गंवा दिया। जहां तक नोटबंदी और जीएसटी का संबंध है, भले ही उसमें भारतीय जनता को आजमाइष का सामना करना पड़ा हो मगर इसमें कोई दो राय नहीं कि लोगों ने मोदी के भारत को नंबर एक देष बनाने के विजन को आज की तारीख में, सही माना है। विपक्ष भले ही चिल्लाता रहे कि नोटबंदी से नकली नोट, कालाबाजारी, आतंकवाद आदि में कमी नहीं आई है मगर सच्चाई तो यह है कि यदि दूरबीन से देखा जाए तो नोटबंदी से बजाए हानिक के लाभ ही हुआ है। हां, जो लोग बीमारी या अन्य किसी कारण से लम्बी लाइनों में लग कर अपनी जान से हाथ धो बैठे मृतकों के परिवारों अगर अगर उसी खजाने से एक अच्छा हर्जाना दे दिया जाता तो भाजपा के सामने पूर्ण बहुमत में आना कोई कठिन बात नहीं होती। भले ही, 2019 में भाजपा की 290 सीटें षायद न आएं मगर पिछले 5 वर्ष में इस पार्टी ने कोई स्कैम या कोई काण्ड नहीं किया। हां, पूर्ण विपक्ष को मोदी-विरोध राग अलापते देख, जनता की सहानुभूति, प्रधानमंत्री से हो रही है और आज, वही जनता जो मोदी के विरोध में आवाजें उठाने लगीं थी, आज उनके साथ हैं, क्योंकि लोग उन्हें समझ लिया है कि मोदी एक ईमानदार एवं ताकतवर प्रधानमंत्री के रूप में बने रहें तो उससे आने वाले पांच वर्शों में ही, पिछले सात दषकों के खड्डे अवष्य ही भर दिए जाएंगे। उधर, एषिया में चीन और पाकिस्तान के रूप में भारत के ऊपर ऐसे देष बने हुए हैं कि जिनका लाभ भारत में अस्थितरता पर निर्भर है। यह बड़े खेद का विशय है कि जहां पाकिस्तान को भारत को अपना बड़ा भाई मानना चाहिए था, वह आज सात दषकों बाद भी, बाप बनने की कोषिष में लगा हुआ है। आज के दौर में जो भुखमरी , बेरोजगारी और बेइमानी का दौर-दौरा, पाकिस्तान में देखने को मिल रहा है ऐसा हरगिज भी न होता, अगर पाकिस्तान भारत को अपना बड़ा भाई मान लेता। जिस प्रकार से मोदी ने अपनी ताजपोषी के समय, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को दिल्ली आमंत्रित किया, फिर उसके बाद पाक प्रधानमंत्री नवाज षरीफ की नाती को लाहौर जा कर, मुबारकबाद पेष की और उनकी मां को, षाल भेंट की, इन सभी बातों से यह बात जग-जाहिर है कि मोदी दिल के साफ और दिलदार व्यक्ति हैं। अफसोस की बात है कि पाकिस्तान इस हीरे की परख नहीं कर पाया और लगातार उसने सरहद पार से कष्मीर में षोपियां, उड़ी, पुलवामा आदि जैसे हमले कराए और आतंकवादियों को भारत की पवित्र धरती पर भेज, उससे न केवल मोदी बल्कि पूर्ण भारत के दिल को बड़ी तकलीफ पहुंची। मोदी ने न केवल पाकिस्तान बल्कि चीन और पूर्ण विश्व को बालाकोट हवाई हमलों द्वारा बता दिया है कि भारत को जो भी हलके में लेगा, उसे इसका खमियाजा अवष्य ही भुगतना होगा।

उधर, पाकिस्तान को भी यह समझ लेना चाहिए कि पिछले 70 साल से वह जो कर रहा था, सो कर रहा था मगर अब उसने अगर भारत की सुरक्षा में सेंध लगाने का यत्न किया तो बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ेगी। जिस प्रकार से मोदी ने इस बार पाकिस्तान को धूल चटाई है, और अपना पायलट भी वापस बुलवा लिया है उससे, यह बात भी साफ हो गई है कि भारत की बात को अब टाला नहीं जा सकता। जो लोग और विषेश रूप से विपक्ष जिस प्रकार से भारतीय सैनिकों से बालाकोट हमले के प्रमाण मांग रहा है यह उन सब के लिए डूब मरने का स्थान है। विपक्ष को देख आजकल ऐसा प्रतीत हो रहा है रहा है कि पाकिस्तान को अधिक चिंता करने की आवष्यकता नहीं है क्योंकि उसकी भाशा बोलने वालों की यहां कमी नहीं। चाहे वह सिद्धू हों या केजरीवाल हो या ममता, इन्हें षर्म आनी चाहिए कि अपनी ही सेना के मनोबल को गिराने में लगे हुए हैं। अब आवष्यकता इस बात की है कि सरहद पार के दुष्मन को पहले अपनी सरहद के अंदर,पाकिस्तान को सहारा देने वालों समझा जाए। जो लोग समझते हैं कि 15 लाख, बेरोजगारी, आदि को फोकस में रख कर मोदी को भारतीय जनता की आंखों में गिरा देंगे तो ऐसा नामुमकिन है। क्योंकि जनता विपक्ष का खेल समझ चुकी है कि जिस के पास कोई भी एजण्डा नहीं है सिवाए मोदी-राज उखाड़ फेंकने के। विपक्ष में ऐसे लोग आस लगाए बैठे हैं कि जिनका ध्येय जन सेवा न होकर केवल सत्ता के सुख को भोगना है। जनता को याद रहे कि अगर उससे इस बार भूल हो गई और उन्होंने मोदी के अतिरिक्त किसी और को चुन लिया तो उन्हें याद रखना चाहिए कि यह उनके भारत के जीवन की भीशण गलती होगी और बाद में कहीं उन्हें पछता कर, यह न कहना पड़े कि लमहों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई।
लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार एवं मौलाना आज़ाद के पौत्र हैं)
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