यूरोप के सामने नई चुनौती लाएगा ब्रिक्सिट

- in दस्तक-विशेष

डॉ. रहीस सिंह
rahees singhसितम्बर 2014 में स्कॉटलैंड मसले पर प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ‘बेटर टुगेदर’ में सफल रहे थे और अब वे बहुमत से जीत कर लोकप्रियता के साथ सत्ता में वापस आए थे, इसलिए उन्हें उम्मीद थी ब्रिटिश जनता ‘रिमेन इन ईयू’ के उनके आग्रह को स्वीकार कर लेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हालांकि अगले ही दिन से ये खबरें आने लगीं कि 10 लाख से अधिक लोगों ने एक याचिका पर हस्ताक्षर कर यूरोपीय संघ के साथ रहने या न रहने पर फिर से जनमतसंग्रह करवाने की मांग की है जिसमें कहा गया है कि जनमत के लिए किया गया मतदान कुल मतदान का प्रतिशत 75 था जिसमें से मात्र 52 प्रतिशत ने ही यूनियन से अलग होने सम्बंधी मत दिया है। इसलिए इस आधार पर फैसला लिया जाना सही नहीं है। यही नहीं सोशल मीडिया पर ‘रिग्रेक्सिट’ ट्रेंड कर रहा है। दूसरी तरफ स्कॉटलैंड की फस्र्ट मिनिस्टर निकोला स्टर्जन ने कहा है कि स्कॉटलैंड की संसद ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के फैसले को वीटो कर सकती है तथा लंदन में ऑनलाइन याचिका शुरू हुई जिसमें लंदन को ‘स्वतंत्र राष्ट्र’ घोषित करने का आह्वान किया गया है। इस स्थिति में कई सवाल सामने आते हैं। प्रथम यह कि क्या ब्रिटेन के लोगों ने ईयू से बाहर होने का फैसला जल्दबादी में दिया? क्या यह उस अपील के खिलाफ प्रतिक्रिया थी जिसमें बराक ओबामा सहित अन्य देशों के नेता ब्रिटेन पर ईयू में बने रहने के लिए दबाव बना रहे थे? क्या यह इस्लामफोबिया से उपजे भय का परिणाम है जो बढ़ रहे इस्लामी आव्रजन से निर्मित हो रहा है? अथवा ब्रिटेन ईयू में एक घुटन सी महसूस कर रहा था जो जर्मनी एवं फ्रांस की ईयू पर प्रभुता के कारण उपजी है? एक प्रश्न यह भी है कि क्या ब्रिटेन के लोगों ने ईयू से अलग होने से जुड़े लाभ-हानि का मूल्यांकन करने के बाद इस प्रकार का निर्णय लिया है ?
ब्रिक्सिट को लेकर ब्रिटेन में 23 जून को हुए मतदान में ब्रिटेन के 52 प्रतिशत लोगों ने ‘लीव ईयू’ के पक्ष में मत दिया जबकि 48 प्रतिशत ने ‘रिमेन’ के पक्ष में। इसके बाद ब्रिटेन के ईयू से बाहर होने का रास्ता साफ हो गया। हालांकि अभी उसे ईयू से बाहर होने में कम से कम दो वर्ष का समय लगेगा जबकि उसने संघ के साथ पहले ही ‘विदड्रॉल समझौता’ सम्पन्न कर लिया है। लेकिन ब्रिक्सिट यानि ब्रिटेन के ईयू से एक्जिट पर ब्रिटिश जनमत संग्रह ने न केवल ब्रिटेन के सामने बल्कि दुनिया के सामने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं और सम्भवत: चुनौतियां भी पेश कर दी हैं जिनका निराकरण आसान नहीं होगा। ध्यान रहे कि जनवरी 2013 के आखिरी सप्ताह में ब्लूमबर्ग (लंदन) में डेविड कैमरन ने यह घोषणा की थी कि 2015 में होने वाले चुनावों में जीत हासिल होने पर कंजरवेटिव सरकार बनी तो 2017 में वह यूरोप में अपने भविष्य को लेकर एक बाध्यकारी जनमत सर्वेक्षण कराना चाहेगी। इस जनमत द्वारा यह तय होगा कि ब्रिटेन के लोग यूरोपीय संघ के साथ पुनर्संयोजित होना चाहते हैं या फिर उससे अलग होना चाहते हैं। दरअसल कैमरन की कंजर्वेटिव पार्टी के सांसद और यूके इंडिपेंडेंस पार्टी लगातार दबाव बना रही थी कि जब से ब्रिटेन ने 1975 में ईयू में रहने के पक्ष में वोट किया है, ब्रिटेन की ईयू में कभी चली ही नहीं। उन लोगों का तर्क था कि तब से लेकर अब तक यूरोपीय संघ काफी बदल गया है और ब्रिटेन के लोगों की जिंदगियों पर उनका ज्यादा नियंत्रण हो गया है। इसलिए कैमरन ने कहा था कि अब समय आ गया है कि ब्रिटेन के लोगों की बात सुनी जाए और ब्रिटेन की राजनीति में यूरोपीय सवाल पर निर्णय लिया जाए।
briksदरअसल यूरोप कभी भी भावनात्मक रूप से एक नहीं रहा, हां उसकी आर्थिक आवश्यकताएं और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं उसे एक छतरी के अधीन लाती रही हैं। यूरोप का पूरा इतिहास संघर्षों, प्रतिस्पर्धाओं एवं रणनीतिक चालों का रहा है जो यूरोप के अंदर और बाहर हमेशा ही दिखता रहा। यूरोप में एक की महानता और दूसरे की असभ्यता व बर्बरता उनके साहित्यिक संसार में प्राय: दिखती रही है। यही वजह है कि मैसीडोनिया के सिकंदर ने यूरोप में दिलचस्पी न लेकर यूनान पर कब्जा जमाते हुए एशिया की ओर बढ़ने का निर्णय लिया। हां उस समय के बाद ईसाई धर्म के नाम पर यूरोप को एकजुट करने की कोशिश अवश्य हुयी थी जब स्पेन में अरब मुसलमानों ने जीत हासिल कर यूरोपीयों में भय पैदा कर दिया था। या फिर 1940 के शुरुआती दिनों में हिटलर ने एक बार फिर यूरोप का नेतृत्व करने के उद्देश्य से उसे एकजुट करने की कोशिश की थी, लेकिन वह अपने मकसद में आंशिक अथवा अस्थायी रूप से ही कामयाब हो पाया था। अंतिम प्रयास यूरोपीय संघ के रूप में सामने आया जिसे ब्रिटेन के अलगाव के साथ ही बिखराव की ओर बढ़ने के संदर्भ में देखा जा सकता है। अब प्रश्न यह उठता है कि वे कौन सी वजहे हैं जिनके कारण ब्रिटेन के लोगों ने ईयू से अलग होने का निर्णय लिया? इसका कारण लगातार बढ़ रही प्रवासियों की संख्या है जिसे लेकर ब्रिटेन के कुछ दल जिनमें स्वयं कंजर्वेटिव भी शामिल हैं, सरकार पर दबाव बना रहे थे। इनके अनुसार प्रवासी समस्या ईयू में रहते हुए समाप्त नहीं हो सकती, बल्कि उससे अलग होकर ही उसका समाधान निकाला जा सकता है। ब्रिटिश नागरिक भी यह मानते हैं कि ब्रिटेन में प्रवासियों की संख्या बढने से यहां के मूलनिवासियों की जनसुविधाओं में हिस्सेदारी घटी है और इसके साथ ही नौकरियों तथा रोजगार के अन्य साधनों पर भी दबाव बढा है। रोजगार, शिक्षा व बेहतर जीवन की तलाश में प्रतिदिन यूरोप व अन्य देशों के सैकड़ों से हजारों तक की संख्या में लोग ब्रिटेन में प्रवेश कर जा रहे हैं। दूसरा पक्ष यह भी है कि ईयू के अधिकारियों की कार्यशैली ब्रिटिश नागरिकों को पंसद नहीं थी। ब्रिटेन के लोगों को यह महसूस हो रहा था कि ईयू ब्रिटेन से अधिक ब्रिटेन के लोगों की जिंदगियों पर नियंत्रण रखता है। ईयू व्यापार के लिए उन पर बहुत सारी शर्तें थोपता है और कई बिलियन पाउंड प्रतिवर्ष सदस्यता शुल्क वसूल करता है लेकिन बदले में कोई लाभ नहीं देता। ईयू में जर्मनी और फ्रांस का दबदबा है जिसके चलते ब्रिटेन का कद वहां घटा। ऐसे में ब्रिटेन को लगने लगा कि यदि उसे अपनी पुरानी छवि निर्मित करनी है तो ईयू से अलग होना ही पड़ेगा। इसकी वजह यह है जर्मनी की (इसमें फ्रांस को भी शामिल किया जा सकता है क्योंकि मर्कोजीवाद ने ही यूरो जोन की अर्थव्यवस्था को इस स्थिति में ला खड़ा किया है) एकाधिकारिक प्रवृत्ति। ऐसे में स्वाभाविक रूप से ब्रिटेन के लोगों का प्रतिक्रिवादी मनोविज्ञान विकसित होता और यही हुआ भी। लेकिन कुछ तात्कालिक वजहें भी इसके लिए उत्तरदायी रहीं।
यह एक कारण और दिखायी दे रहा है और वह है इस्लाफोबिया। मीशेल वेलबेक जैसे फ्रेंच उपन्यासकर ने अपने उपन्याय ‘सबमिशन’ में लिखा है कि 2022 तक फ्रांस का इस्लामीकरण हो जाएगा, देश में मुस्लिम राष्ट्रपति होगा और महिलाओं को नौकरी छोड़ने के लिए प्रेरित किया जाएगा, विश्वविद्यालयों में कुरआन पढ़ाई जाएगी….। क्या यह भय केवल मीशेल वेलबेक का ही है अथवा यह यूरोप के तमाम देशों की जनता का है? यह भय यूरोप की जीवनशैली में व्याप्त है, जिसे लेकर राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय नेतृत्व आश्वस्त नहीं कर पा रहा है। खास बात यह है कि आइसिस से जुड़ने वाले बाहरी लड़कों में यूरोप से गये लड़ाकों की संख्या सबसे अधिक है? आखिर क्यों? सवाल यह भी है कि इस्लामी जिहादियों के लिए आधुनिक यूरोप में स्पेस कैसे निर्मित हो गया? इससे तो लगता है कि यूरोपीय समाज में इस समय ऐसी विशेषताएं मौजूद हैं जो इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद के लिए रास्ता उपलब्ध करा रही हैं। दरअसल यूरोप में ईसाइयों की जनसंख्या के अनुपात के मुकाबले मुलसमानों की तेजी से वृद्धि हुयी है। पोप सहित दक्षिणपंथियों को अब यह लगने लगा है कि पूर्वी देशों से यूरोप में आब्रजन, जिनमें बड़े पैमाने पर गैर ईसाई (खासकर मुसलमान) हैं, यूरोप जनसांख्यिकी संरचना को बदल देगा। चूंकि ईसाईयों के मुकाबले यूरोप में मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर काफी अधिक है। ऐसे में जब हटिंगटन और बेरेट जैसे लोग यह अनुमान व्यक्त करते हैं कि 2025 तक इस्लामिक दुनिया ईसाईयत को दुनिया के मुख्य धर्म होने से वंचित कर देगी। लेकिन ईयू इस्लामी आव्रजन को रोकने की बजाय, प्रोत्साहक के रूप में दिख रहा है। चूंकि विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार आव्रजन के अनुपात में इन देशों में रेडिकलाइजेशन बढ़ता जा रहा है। अनजान जनसंख्या के ऐसे प्रवाहों से बचने के लिए जरूरी है कि स्वयं को रक्षात्मक दीवारों से घेरा जाए। यह तभी संभव है जब ईयू से ब्रिटेन बाहर हो। शाायद ब्रिक्सिट इसी का नतीजा है।
कारण जो भी हों परन्तु कंजर्वेटिव पार्टी ने निष्पक्ष रहने के बावजूद लेबर पार्टी, एसएनपी, प्लाएड कमरी और लिबरल डेमोक्रेट्स सभी ईयू में रहने का प्रचार किया जबकि लेबर पार्टी के कुछ सांसदों, डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी (डीयूपी) और यूके इंडिपेंडेंट जैसी पार्टियों ने ईयू से बाहर होने का पक्ष लिया था। यही राजनीति अब इंग्लैण्ड में अन्य विभाजनों को भी हवा दे सकती है। उदाहरण के तौर पर लंदन में भी एक ऑनलाइन याचिका शुरू हुई जिसमें लंदन को ‘स्वतंत्र राष्ट्र’ घोषित करने का आह्वान किया गया है जिसे हजारों लोग अपना समर्थन दे चुके हैं। दरअसल यूनाइटेड किंगडम में कम से कम पांच उपराष्ट्रीयताएं हैं, इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटिश, आयरिश और ब्रिटिश… जिनके बीच एक मोटी सी विभाजक रेखा हमेशा खिंची रही है जिसे आप शेक्सपियर के साहित्य से लेकर जॉर्ज बर्नाड शॉ के लेखन में देख सकते हैं। इसलिए यह संभव है कि आने वाले समय में स्कॉटलैंड की आजादी का मुद्दा फिर से पुनर्जीवित हो और उत्तरी आयरलैंड के भविष्य को भी खतरे में डाले। एक पक्ष यह भी है कि अब यूरोप के अन्य देशों में भी ईयू से बाहर होने की मांग जोर पकड़ सकती है। यही नहीं, यूरोपीय संघ के नेताओं को भी अब यह डर लगने लगा है कि कई और देश भी संघ छोड़ने के लिए अपने यहां जनमत करा सकते हैं। फ्रांस, डेनमार्क और नीदरलैंड्स की यूरो पर संदेह जताने वाली पार्टियों ने जनमत की मांग भी रख दी है। ब्रिटेन के लोगों को यह चिंता थी कि वह कहीं यूरोप का एक टापू बन कर रह जाए, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि ब्रिटेन का ईयू का एक बड़ा बाजार हासिल था, उसकी अर्थव्यवस्था को बड़ा क्षेत्र अपनी गतिविधियों के लिए हासिल था, अब वह उपलब्ध नहीं होगा। चूंकि जर्मनी व फ्रांस का ईयू पर नियंत्रण है, इसलिए संभव है कि ब्रिटेन को आगे द्विपक्षीय आर्थिक सम्बंधों में भी अड़चनों का सामना करना न पड़े। यदि ऐसा हुआ तो भी इसका दुनिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। शायद इसे ही देखते हुए कैमरन ने कहा था कि ब्रिटेन के बाहर निकलने के गंभीर आर्थिक और राजनीतिक परिणाम होंगे। चीन के सरकारी समाचार पत्र पीपल्स डेली के टैबलॉयड अखबार द ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि यूरोपीय संघ से अलग होने की सूरत में दुनिया भर में ब्रिटेन का दबदबा कम हो जाएगा। ऑस्ट्रेलियाई अखबार सिडनी मार्निंग हेराल्ड ने भी अपने वेब एडिशन में लिखा है कि यूरोपीय संघ के बिना ब्रिटेन एक कमजोर देश साबित होगा। ऐसा इसलिए संभव हो सकता है कि क्योंकि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था, कैपिटल और कारोबार में संकुचन आएगा जिसका असर नकारात्मक रूप से पड़ना स्वाभाविक है।
ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने के निर्णय से भारतीय कारोबार जगत पर भी असर हुआ है और आगे भी होगा। बाजार में तेजी से गिरावट आई है और ग्रेट ब्रिटेन के साथ कारोबारी रिश्तों को लेकर भी अनिश्चितता का माहौल बना है। हमारे वित्त राज्य मंत्री का कहना है कि पहले हमें देखना है कि कैपिटल मार्केट्स में किस तरह की उथल-पुथल हो सकती है। लेकिन यह सामान्य प्रविधि है कि यदि सामान्य बाजार संकुचित होगा तो कैपिटल बाजार में संकुचल पैदा अवश्य होगा। इस स्थिति में भारत को नुकसान होना तय है, हालांकि यह बड़ा नुकसान नहीं होगा। दरअसल भारत एवं ब्रिटेन की लम्बी साझेदारी रही है। यही नहीं, ईयू में भारत के व्यापार के लिए ब्रिटेन प्रवेश द्वार का काम करता रहा है। इसलिए इसके ईयू से अलग हो जाने के बाद भारत को ईयू से सीधे व्यापार के नए रास्ते तलाशने होंगे। भारत के लिहाज से यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा बाजार है। कारण यह है कि 50 करोड़ आबादी वाले यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था 16 खरब डॉलर है।
सरकारी आकड़ों के अनुसार वर्ष 2015-16 में ब्रिटेन के साथ व्यापार 94 हजार 300 करोड़ रुपये रहा जिसमें 59 हजार 100 करोड़ रुपये का निर्यात और 34 हजार 700 करोड़ रुपये का आयात शामिल है। इस अलगाव के बाद भारत के समक्ष संघ के बाकी देशों के साथ व्यापारिक सम्बधों को बनाए रखने की चुनौती होगी। संघ के बाकी देशों के साथ व्यापार के इच्छुक देशों को अतिरिक्त टैक्स व डूयटी देनी पड़ सकती है, जिसमें भारत भी शामिल है। हालांकि यह लाभ भी हो सकता है कि ईयू से अलग होने के बाद ब्रिटेन भारत के प्रति अपने रुख को और नरम रखना चाहेगा ताकि उसका व्यापार संतुलन पक्ष में बना रहे और कारोबार की गति यथावत बनी रहे। भारत तेजी से उभरती हुयी अर्थव्यवस्था है और दुनिया भारत के देश भारत के बाजारों में भविष्य की संभावनाएं तलाश रहे हैं। ऐसे में संभव है कि ब्रिटेन अपने माल के लिए भारत को सर्वाधिक तरजीही देश के रूप में देखे और स्वीकार करे। 

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