राजनीतिक उथल-पुथल से भरा वर्ष आगामी वर्ष को भी प्रभावित करेगा!

-डॉ. भरत मिश्र प्राची

राजनीतिक उथल- पुथल का दौर पूरे वर्ष चलता रहा जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सत्ता परिवर्तन के इस दौर में जो दल कभी पीछे चल रहे थे, आज सबसे आगे है , जो आगे रहे थे , सबसे पीछे खड़े हैं । जनता जर्नादन किसे तख्त ताज देगी, किसे पदच्यूत कर देगी, कोई नहीं जानता? लोकतांत्रिक प्रक्रिया का इससे ज्यादा जीता जागता और क्या प्रमाण हो सकता है। इस तरह के हालात के पीछे राजनीतिक दांव पेंच एवं सत्ता पक्ष के प्रति उभरता आक्रोश मुख्य कारण रहा। इस वर्ष मुख्य रूप से पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा एवं मणिपुर पांच राज्यों में जो चुनाव हुए उसके प्रारम्भिक दौर में उतर प्रदेश, उत्तराखंड, एवं मणिपुर में भाजपा को एवं पंजाब तथा गोवा में कांग्रेस को बहुमत मिला पर राजनीतिक दांव पेच के चलते पंजाब को छोड शेष चार राज्यों में भाजपा की सरकारें गठित हुई। गोवा में कांग्रेस सबसे बडी पार्टी होने के वावयूद भी राजनीतिक कमजोरियों के कारण सरकार नहीं बना सकी। इस चुनाव के दौरान केन्द्र सरकार की नोटबंदी योजना राजनीतिक पृृष्ठिभूमि में ज्यादा महत्वपूर्ण रही। इस चुनाव के दौरान तीन तलाक का मसला भी जोर -शोर से उछला जिसने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को पलट दिया। जहां सत्त परिवर्तन के मुख्य कारक रहे मुस्लिम मतदाताओं में विशेष रूप से महिला मतदाताओं का रूझान पहली बार भाजपा की ओर गया जिससे उतर प्रदेश की राजनीति में भाजपा को पूर्ण लाभ मिला । उतर प्रदेश की राजनीति आजतक इन्हीं मुस्लिम मतदाताओं पर निर्भर करती रही जिससे वहां की सत्ता कभी मुलायम के पास रही तो कभी मायावती के पास जो इस बार दोनों से हटकर भाजपा के खाते में चली गई । इस परिवर्तन को जिस भी आकड़े से देखा जाय , जनाक्रोश के साथ – साथ राजनीतिक दांव – पेंच भी शामिल रहा ।

इस वर्ष के दौरान केन्द्र सरकार का एक और प्रमुख फैसला रहा जीएसटी का जिसे केन्द्र सरकार ने एक देश एक टैक्स का नाम देकर जोर – शोर से लागू किया। जिसका पूरे देश में व्यापारी वर्ग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा । इसी दौरान देश के दो प्रमुख राज्य गुजरात एवं हिमाचल में विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें गुजरात चुनाव ने केन्द्र सरकार की प्रतिष्ठा एवं भाजपा के भावी भविष्य के साथ जोड़ दिया । जीएसटी का प्रतिकूल प्रभाव गुजरात को प्रभावित करेगा, इस बात का अंदेशा भाजपा शासित केन्द्र सरकार को पूर्व में हो गया जिससे केन्द्र सरकार ने तत्काल चुनाव से पूर्व जीएसटी की दरों में कमी कर गुजरात के व्यापारी वर्ग को संतुष्ट करने की पूरी कोशिश की और उसके इस प्रयास का लाभ चुनाव में मिला भी । कांग्रेस शासित हिमाचल में जनाक्रोश के चलते सत्ता परिवर्तन तो होना निश्चित था जिसमें भाजपा की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी पर भाजपा शासित गुजरात का चुनाव भाजपा के लिये चुनौती बना हुआ था जहां पूरे देश की नजर टिकी हुई थी। जहां चुनाव दौरान केन्द्र की भाजपा सरकार पूरे समय टिकी ही नहीं रही बल्कि गुजरात चुनाव को भावनात्मक रूप से जोड़े जाने की प्रक्रिया भी जारी रही । इस प्रक्रिया में भाजपा को कितनी सफलता मिल पाई वह तो अलग मंथन का विषय है।

हिमाचल के साथ – साथ गुजरात में भाजपा की सरकार तो बन गई पर गुजरात में भाजपा बहुमत के काफी नजदीक रही जिससे गुजरात में भाजपा के गिरते जनाधार का पता चलता है । गुजरात राज्य देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं भाजपा अध्यक्ष अमित साह का गृृह प्रदेश होने के कारण भी चुनाव दृष्टि में विशेष बना रहा । गुजरात चुनाव के दौरान कांग्रेस का एक नया तेवर उभर कर सामने आया जहां पहली बार कांग्रेस के तत्कालीन उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पुरानी परिपार्टी को छोड़ गुजरात में मंदिरों में जा जाकर दर्शन कियेए जिनपर जनेउ धारण करने का अरोप भी लगा पर इस राज्य के चुनाव परिणाम इस बात को साफ – साफ दर्शा रहे है कि जहां – जहां मंदिरों में राहूल गांधी दर्शन करने को गये वहां – वहां से कांग्रेस को बढ़त मिली है। इसे मंदिरों का आर्शीवाद कहा जाय या जनमानस का परिवर्तन पर इस नीति का कांग्रेस को लाभ अवश्य मिला जहां कांग्रेस वर्षो बाद पहली बार सत्ता के करीब पहंुची है। इस चुनाव के उपरान्त हिन्दुत्व की ओर बढ़ते कदम कांग्रेस के देखे जा सकते है। इस बार गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी का एक नया तेवर ही नजर आया जो चुनाव के पूरे दौर में वे बड़े शालीन ढ़ंग एवं तीखे प्रहार से सत्ता पक्ष को घेरे रखे। जिसने कांग्रेस में एक नई जान फूंक दी। गुजरात चुनाव उपरान्त राहुल गांधी को कांग्रेस का नया अध्यक्ष घोषित कर दिया । आगमी वर्ष में देश में होने वाले भाजपा शासित प्रमुख राज्यों के चनावों में कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने का दायित्व राहुल गांधी के कंधों पर है। गुजरात चुनाव में कांग्रेस सत्ता तो हासिल नहीं कर सकी पर विपरीत महौल में सत्ता के करीब पहुंचकर एक नया मुकाम हासिल कर पाई है जिससे कांग्रेसियों में एक नया उत्साह का महौल देखा जा सकता है। कांग्रेस के नये खेवनहार राहुल गांधी कांग्रेस की डूबती नांव को आने वाले वर्ष में कितना उबार पाते है।

यह वर्ष मुख्य रूप से भाजपा एवं कांग्रेस के लिये आपसी संघर्ष एवं चुनौती का रहा जहां सत्ता के लिये एक दुसरे पर अनर्गल प्रहार भी होते रहे । जहां भाजपा सत्ता सीमा में एक – एक करके विस्तार करती जा रही थी तो दूसरी ओर कांग्रेस अपनी गिरती साख को बचाने में लगी रही। आगामी वर्ष दोनों के लिये चुनौतीपूर्ण रहेगा । जहां भाजपा का मिशन पूरे देश पर अपना परचम लहराने का है तो दूसरी ओर कांग्रेस भाजपा के सत्ता की ओर बढ़ते कदम को रोकने का भरपूर प्रयास हरेगी । इस प्रयास में कभी कांग्रेस के विरोध में खड़े होने वाले क्षेत्रीय राजनीतिक दल भापजा के विरोध में कांग्रेस के साथ खड़े दिखाई दे सकते है। आगामी वर्ष में जहां विधान सभा चुनाव होने है एवं जहां भाजपा की सरकारें है वहां जनाक्रोश उभरकर सामने दिखाई दे रहा है। आगामी वर्ष में इन राज्यों को पूर्व की भाॅति मोदी लहर लाभदायक हो पायेगी , कहना कठिन है। केन्द्र की भाजपा सरकार नोटबंदी एवं जीएसटी को भले बेहतर योजनाएं मान रही हो पर इसका प्रतिकूल प्रभाव आगामी वर्ष के विधान सभा चुनावों को जरूर प्रभावित करेगा । इस वर्ष केन्द्र एवं भाजपा शासित राज्यों की भाजपा सरकारें रोजगार मुहैया नहीं करा पाई है जिससे देश के युवा वर्ग में भारी असंतोष है। इसके आलावे सरकार की वर्तमान बैंक नीति से आमजन भी आक्रोशित है। किसानों में आक्रोश अलग है । इस तरह के हालात से आगामी वर्ष में भाजपा को जूझना पडत्र सकता है। इस तरह के परिवेश आगामी वर्ष में सत्ता परिवर्तन के कारक हो सकते है। राजनीतिक उथल – पुथल से भरा यह वर्ष आगामी वर्ष को भी प्रभावित करेगा।

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए लेखक के निजी विचार हैं। दस्तक टाइम्स उसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।)