राफेल पर कांग्रेस का सवाल कितना जायज?

जब कभी भी चुनावी मौसम आता है तो पक्ष-विपक्ष के नेताओं द्वारा एक-दूसरे की बखिया उघेड़ी जाने लगती है। इसी दरम्यान कभी-कभार विपक्षी खेमे के नेताओं का हाथ धीरे-धीरे उन मुद्दों के सहारे सरकार की गिरेबान तक पहुंच जाते हैं, जिसकी चर्चा से सरकार और उसके नुमाइंदे बचना चाहते हैं। फिलहाल, गुजरात चुनाव की गहमागहमी जोरों पर है। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। भाजपा ने तो कांग्रेस के समर्थन में उतरे गुजरात के चर्चित नेता हार्दिक पटेल की दो कथित अश्लील सीडी तक सियासी रणभूमि में जारी कर दी है, ताकि हार्दिक के सहारे कांग्रेस को बदनाम किया सके। इस घटना के बाद बैकफूट पर आई कांग्रेस ने भी भाजपा और नरेन्द्र मोदी को घेरने की रणनीति बना ली है। कांग्रेस द्वारा मोदी सरकार पर चर्चित राफेल एयरक्राफ्ट खरीद में घोटाले का आरोप लगाया है। कांग्रेस का कहना है कि जहाजों की कीमत 526 करोड़ है, जबकि सौदा 1571 करोड़ में हुआ है। राफेल डील पर अब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी मोर्चा खोल दिया है। राहुल ने ट्वीट कर राफेल डील पर सवाल उठाए हैं। दरअसल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला का कहना है कि राफेल खरीद में कोई पारदर्शिता नहीं है। मोदी सरकार इस सौदे से राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रही है। उन्होंने दावा किया कि जहाजों की कीमत 526 करोड़ है जबकि सौदा 1571 करोड़ का हुआ है। हालांकि फ्रांस ने इस डील में किसी भी तरह का घोटाला होने से इंकार किया है। फ्रांस की ओर से बिना कहा गया है कि किसी भी तरह का दावा करने से पहले फैक्ट्स चेक जरूर करने चाहिए। मूल विषय यह है कि राफेल पर कांग्रेस का सवाल कितना जायज है?

-राजीव रंजन तिवारी

आपको बता दें कि इस डील पर 23 सितंबर, 2016 को फ्रांस के रक्षामंत्री ज्यां ईव द्रियां और भारत के तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर ने नई दिल्ली में साइन की थी। भारत सरकार ने 59,000 करोड़ की फ्रांस से डील की थी। डील के मुताबिक, 36 राफेल फाइटर जेट विमान मिलने हैं। पहला विमान सितंबर 2019 तक मिलने की उम्मीद है और बाकी के विमान बीच-बीच में 2022 तक मिलेगी। कांग्रेस के नेता रणदीप सुरजेवाला का कहना है कि 20 अगस्त, 2007 में 126 लड़ाकू एयरक्राफ्ट खरीदने के लिए नोटिस जारी की गई थी। इस डील के लिए दो कंपनियां सामने आईं। जिनमें से राफेल बनाने वाली कंपनी दसॉल्ट का चयन किया गया था। सौदे की यह शर्त थी कि 18 राफेल एयरक्राफ्ट फ्रांस में बनेंगे और कंपनी की मदद से 108 एयरक्राफ्ट भारत मे बनेगें। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ्रांस दौरे के दौरान 36 एयरक्राफ्ट सीधे तौर पर फ्रांस से खरीदने की घोषणा कर दी। सुरजेवाला ने सवाल उठाए कि लड़ाकू जहाजों को महंगी कीमत पर क्यों खरीदा गया और सरकार राफेल की तकनीक को ट्रान्सफर करने के पक्ष में क्यों नहीं है। सरकार हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के हित को दरकिनार कर निजी कंपनियों को फायदा पहुंचा रही है। इसके अलावा सुरजेवाला ने दसॉल्ट राफेल और रिलायंस के बीच हुए समझौते में प्रक्रियाओं का पालन ना होने की बात भी कही है। यदि कांग्रेस के नेताओं पर भरोसा करें तो उनकी बातें जायज प्रतीत हो रही हैं, क्योंकि कांग्रेसियों ने सवालों को उलझाने के बजाय दो टूक बोला है।

यदि इस डील की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो पता चलेगा कि राफेल सौदा आरंभ से ही शक के दायरे में है। बीते वर्ष इसी माह देश की एक चर्चित पत्रिका ‘चौथी दुनिया’ छपी एक खबर में सवाल उठाया था कि क्या लड़ाकू विमान राफेल की ख़रीदारी में कोई बड़ा घोटाला हुआ है? क्या अनिल अंबानी को फ़ायदा पहुंचाने के लिए राफेल डील किया गया? यह एक ऐसा सवाल है, जिसे देश का मीडिया जानता तो है, लेकिन खुल कर सवाल नहीं पूछ रहा है। विमानों को कितने में ख़रीदा गया? क्या टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा? यूपीए के दौरान जिन बिंदुओं पर करार हुआ, उसे मोदी सरकार ने क्यों ख़ारिज किया और घाटे का सौदा क्यों किया? जिस कंपनी से हम ये विमान ख़रीद रहे हैं, उस कंपनी की माली हालत क्या थी? क्या हमारे पास उससे बेहतर विमान खरीदने का विकल्प था? सवाल ये भी है कि डील फाइनल होने के बाद अंबानी की रिलायंस कंपनी ने ज्वाइंट वेंचर क्यों बनाया? यह समझना ज़रूरी है कि क्या सुरक्षा के नाम पर या पाकिस्तान का डर दिखा कर मोदी सरकार आधुनिक हथियारों की ख़रीदारी में जल्दबाज़ी और हेराफेरी तो नहीं कर रही है? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब जानने ज़रूरी हैं। दरअसल, सरकार बदलने के साथ-साथ देश में घोटाला करने का तरीक़ा भी बदल जाता है। पहले ज़माने में मंत्री घूस लेते थे, तब उसे घोटाला कहा जाता था। बाद में घोटाले का तरीक़ा बदला और दस्तावेज़ में शब्दों की हेराफेरी कर घोटाला किया जाने लगा, फिर निजी कंपनियों के साथ मिल कर लूटने की प्रथा चली। मतलब यह कि घोटाले का प्रारूप अब पहले से बेहतर और साफ-सुथरा दिखने लगा है। अब घोटाले का जो प्रारूप है, उसका मतलब निजी कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाना हो गया है।

यही वजह है कि राफेल डील अब शक के घेरे में है, वो इसलिए क्योंकि मोदी सरकार इस समझौते को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब नहीं दे रही है। यूपीए सरकार के दौरान राफेल लड़ाकू विमान का सौदा इसलिए पूरा नहीं हो सका क्योंकि सरकार को लगा कि इसकी क़ीमत ज्यादा है। क़ीमत पर तोलमोल हो ही रहा था कि सरकार बदल गई। अब जब डील हुआ तो यह मानना चाहिए कि पहले की तय क़ीमत से कम में हुआ होगा। लेकिन, हैरानी की बात ये है कि मोदी सरकार उसी विमान को चार साल बाद तय क़ीमत से दोगुने से ज्यादा क़ीमत देकर ख़रीद रही है। मामला स़िर्फ क़ीमत का ही नहीं है, इसमें अनिल अंबानी की रिलायंस कंपनी को भी हिस्सेदार बना दिया गया है. इससे रिलायंस कंपनी को हज़ारों करोड़ का मुनाफा होने की उम्मीद है। जानकार बताते हैं कि राफेल डील का सारा फैसला प्रधानमंत्री कार्यलय में हुआ। इस फैसले को इतना गुप्त रखा गया था कि रक्षा मंत्री तक को इसकी भनक नहीं थी। हां, आधिकारिक रूप से जब डील पर हस्ताक्षर करना था, तब रक्षा मंत्री को जानकारी दी गई। अब सवाल ये है कि इतने गुप्त तरी़के से घाटे का सौदा कर किसी निजी कंपनी को फ़ायदा पहुंचाना अगर घोटाला नहीं है, तो क्या है? राफेल घोटाले में गड़बड़ी हुई है, यह बात गोपनीय नहीं है। राफेल डील में हुए घपलेबाज़ी को लेकर सबसे पहले बीजेपी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने आवाज़ उठाई थी। वो बहुत पहले से ये कहते आ रहे थे कि राफेल सौदे में घपलेबाज़ी हो रही है। उन्होंने इस मामले को कोर्ट में घसीटने की भी धमकी दी थी।

बाद में स्वराज अभियान के योगेंद्र यादव व प्रशांत भूषण ने भी राफेल समझौते पर सवाल उठाए। फिलहाल, गुजरात चुनाव की रण के दरम्यान राफेल डील पर हो रहे विवाद के बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। राहुल ने अपने ट्वीट में रिलायंस का नाम लेकर कहा कि वह मेक इन इंडिया का जरूरी हिस्सा है। यह लिखने के साथ राहुल ने एक खबर का लिंक भी शेयर किया जिसमें रिलायंस को राफेल डील का पार्टनर बताते हुए सवाल उठाए गए हैं। राहुल गांधी ने राफेल विमान खरीद समझौते को लेकर पीएम नरेन्द्र मोदी पर हमला बोलते हुए कहा कि एक व्यवसायी को लाभ पहुंचाने के लिए पूरे सौदे में बदलाव के लिए मीडिया प्रधानमंत्री से सवाल क्यों नहीं करता। सिर्फ एक बिजनसमैन के लिए उन्होंने पूरी डील बदल दी। बहरहाल, देखना है कि घपले की बू आने वाले इस सौदे कथित फंसती मोदी सरकार की नीतियों पर गुजरात की जनता क्या फैसला सुनाती है?