रामराज्य : रामकथा आशुतोष राणा की कलम से..भाग ३

 स्तम्भ: कैकेयी को सुमित्रा के शब्द सुनाई दिए वे कह रही थीं- जीजी, परमात्मा ने महाराज दशरथ और हम सबके भाग्य में संतान सुख नहीं लिखा था।
किंतु महाराज दशरथ ने अपनी धर्मपरायणता से परमात्मा को विवश किया की वे अपना विधान बदलते हुए हमें पुत्र सुख प्रदान करें।
हम तीनों के बीच इन चारों पुत्रों को प्राप्त कर महाराज हर्षातिरेक में कहते रहते थे की देखो धर्म में कितनी शक्ति होती है, धर्मनिष्ठ व्यक्ति की इच्छापूर्ति के लिए परमात्मा को भी अपना विधान बदलना पड़ता है।
लेकिन देखिए, ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है, उसने हमें पुत्र तो दिए किंतु संतान का सुख नहीं दिया। पुत्रों को देकर भक्त का मान भी रख लिया और सुख ना देकर अपने विधान की रक्षा भी कर ली।
सुमित्रा भावावेश में रोते हुए बोलीं- जीजी इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा ? हम चार पुत्रों की माता होते हुए भी निपूता सा जीवन जी रहे हैं, सब कुछ नष्ट हो गया जीजी।

कैकेयी ने सुमित्रा के मुख को अपने दोनों हाथों से पकड़ते हुए उनके नेत्रों में झाँकते हुए बोलीं- संतान के रूष्ट होने और उसके नष्ट हो जाने में बहुत अंतर होता है सुमित्रे, मैं विश्वासपूर्वक कह रही हूँ की शत्रुघन मात्र रूष्ट है। क्योंकि जब भी ये बच्चे मुझसे रूष्ट होते थे या इन्हें मुझे प्रताड़ित करना होता था, अथवा इनको अपनी कोई बात मुझसे मनवानी होती थी तब ये चारों मेरी आँखों के आगे से ओझल हो जाते थे, मुझे कष्ट देने के लिए.. ये इनका प्रिय खेल था, और मैं भी जब तक इनको ढूँढकर अपने सम्मुख ना कर लेती मुझे चैन नहीं मिलता था।
शत्रुघन वही खेल मुझसे खेल रहा है। वो मुझसे कोई बात कहना, सुनना चाहता है, किंतु उसका पुत्रोचित अभिमान आड़े आ रहा इसलिए वो चाहता है की मैं ही व्यथित होकर उसको ढूँढ निकालूँ, ताकि अपने हृदय के संचित भावों को वो भलीभाँति मुझ तक पहुँचा सके। ये बच्चे अपनी माँ कैकेयी के चित्त को अच्छे से पहचानते हैं उन्हें पता है कि माँ व्यथा में ही बच्चों की कथा को मन से सुनती है।
अब तुम दोनों निश्चिन्त मन से विश्राम करो ये कैकेयी का वचन है कि हमारा शत्रुघन कल हमारे पास होगा।
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सुमित्रा और श्रुतकीर्ति के विदा होने के पश्चात् कैकेयी महल के अस्तबल में पहुँची। उसने देखा कि शत्रुघन का सबसे प्रिय घोड़ा पवन अपने स्थान पर ही बँधा हुआ है ! इसका मतलब है शत्रुघन जानता था कि उसकी अनुपस्थिति की सूचना कैकेयी तक पहुँचेगी, जो कैकेयी को बेचैन कर देगी और कैकेयी उसे निश्चित ही ढूँढने का प्रयास करेगी। पशुओं में अपने स्वामी की गंध स्वमेव बस जाती है वे गंध के सहारे अपने स्वामी तक सरलता से पहुँच जाते हैं इसलिए शत्रुघन पवन को अस्तबल में छोड़ गया वो चाहता है कि माँ पवन के सहारे उस तक पहुँचे, ताकि माँ को शत्रुघन को ढूँढने में कोई कष्ट ना हो।
ये बच्चे कितना अच्छे से अपनी माँ के चित्त को पहचानते हैं, इस सुपरिचय का विचार आते ही कैकेयी अस्तबल की नीरवता में भी मुस्कुरा दी।
कि तभी कैकेयी को अश्वशाला अधीक्षक का स्वर सुनाई दिया- महारानी की आज्ञा हो तो रथ तैयार करूँ ?
नहीं, मैं पवन की सवारी का आनंद लेना चाहती हूँ, तुम विश्राम करो।

कैकेयी, शत्रुघन के सबसे प्रिय घोड़े पवन के पास पहुँचीं, अपने स्वामी की माँ को अपने सम्मुख देख पवन आनंद से झूमने लगा, कैकेयी ने बहुत लाड़ से उसकी गर्दन उसकी पीठ पर अपना स्नेहसिक्त हाथ फेरा और उसकी गर्दन में अपने दोनों हाथ डालकर कुछ देर तक पवन के माथे पर अपने माथे को रखकर शांति से खड़ी रहीं, पवन एक आज्ञाकारी बालक की भाँति चुपचाप खड़े हुए कैकेयी के मनोनिर्देशों को सुनता रहा। 
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पवन पर सवार कैकेयी का मस्तिष्क बहुत तेज़ी से शत्रुघन के भाव स्वाभाव का पुनर्मूल्यांकन कर रहा था और सोच रहा था कि इस समय शत्रुघन कहाँ हो सकता है ?
जब भी कैकेयी व्यथित या किसी अंतरद्वंद से ग्रसित होती तब बिना किसी प्रयास के उसकी बुद्धि और विवेक के बीच वार्तालाप आरम्भ हो जाता था।
कैकेयी की बुद्धि ने कैकेयी के विवेक से प्रश्न करना आरम्भ कर दिया- मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु क्या होता है ?
मनुष्य के हृदय में उत्पन्न होने वाली शंका ही उसकी सबसे बड़ी शत्रु होती है।

-ऐसा कौन सा स्थान है जहाँ शंका को स्थान नहीं मिलता ?
प्रेमी का चित्त।

-प्रेमी के चित्त में किसका वास होता है ?
निर्भयता का।

-निर्भय कौन है ?
शंका रहित व्यक्ति।

-शत्रुघन का अर्थ क्या होता है ?
शंका रूपी शत्रु का समूल नाश करने वाला ही शत्रुघन होता है, व्यक्ति और वृत्ति रूपी शत्रु को नष्ट करने वाला शत्रुघन होता है।

-तब शत्रुघन को इस समय कहाँ होना चाहिए ?
जहाँ प्रेम होता है वहाँ शंका का कोई स्थान नहीं होता.. हो ना हो शत्रुघन भरत के आसपास ही कहीं होगा, क्योंकि भरत प्रेम का साक्षात् स्वरूप है, इसलिए शत्रुघन रूपी निर्भीकता सदैव उसके साथ होती है।

लक्ष्मण जैसे राम की प्रतिछाया है वैसे ही शत्रुघन भरत की प्रतिमूर्ति है।
जहाँ ज्ञान होता है वहाँ वैराग्य होता ही है और जहाँ प्रेम होता है वहीं निर्भयता का वास होता है।
मेरा बड़ा पुत्र राम तो स्वयं ज्ञान है इसलिए, वैराग्य रूपी लक्ष्मण उसके साथ वन में विचरण कर रहा है, वहीं पुत्र भरत तो साक्षात् प्रेम का स्वरूप है इसलिए निर्भयता की प्रतिमूर्ति शत्रुघन को उसी के समीप होना चाहिए।

इस विचार के आते ही कैकेयी ने पवन की रास को नंदीग्राम की ओर मोड़ दिया।
रात्रि की नीरवता में पवन हल्के क़दमों से दुलकी चाल में चल रहा था, क्योंकि वो समझ रहा था कि इस समय उसपर सवारी करने वाली अवध राज्य की राजमाता है, और किसी भी माँ को अपने बच्चों कि निद्रा में व्यवधान उपस्थित करना रुचिकर नहीं होता।#आशुतोष_राणा

#क्रमशः॰॰॰

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