वर्षों बाद कुछ थोड़ी ही मुस्कराहट

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प्रसंगवश

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ज्ञानेन्द्र शर्मा

साल दर साल अनेक लोग अपने घरों की जवान-बूढ़ी विधवाओं को वृन्दावन के रेलवे स्टेशन पर छोड़कर नदारत हो जाते हैं। वे कभी लौटकर यह देखने नहीं आते कि जिस बेकसूर विधवा को भगवान भरोसे वृन्दावन के विधवा आश्रमों की शरण में धकेल जाते हैं, वे कैसे रह रही हैं, उन्हें खाने को रोटी मिलती है कि नहीं, सोने को बिस्तर है कि नहीं और इलाज की व्यवस्था है कि नहीं। इन विधवाओं को दुबारा विवाह करने की अनुमति नहीं दी जाती और लोग अपने घर की इन सदस्यों से ऐसी बेरुखी दिखाते हैं जैसी कि कोई अपने जानवरों के साथ भी नहीं दिखाता। सालों से यह क्रम चलता रहा है। यहां तक कि अदालतों की भी सुनवाई राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन ने नहीं की।
आज से कोई 16 साल पहले मार्च 2000 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने एक जनहित याचिका पर इस मामले की सुनवाई की। वकील धर्मेन्द्र सिंघल की याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर कड़ा रोष प्रकट किया कि वृन्दावन में विधवाएं अत्यंत दयनीय और दुर्भाग्यपूर्ण हालातों में जीने को मजबूर हैं। कुछ सामाजिक प्रणेताओं द्वारा की गई जांच-पड़ताल पर अदालत ने गौर किया। इस पड़ताल में पता लगा था कि इन विधवाओं को न तो ठीक से भोजन मिलता है, न इलाज और कुछ विलासी गुरु उन्हें अपनी हवस का शिकार तक बनाते हैं। वे इस हाल में नहीं होती कि अपने दुखड़ों की शिकायत दर्ज करा सकें और मान सम्मान की रक्षा कर सकें। 3 मार्च 2000 को उच्च न्यायालय ने राज्य के मुख्य सचिव से चार सप्ताह में इन हालातों पर रिपोर्ट देने को कहा। यह भी आदेश दिया गया कि मथुरा के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक अदालत को बताएं कि इन विधवाओं के मान-सम्मान की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। लेकिन हुआ कुछ नहीं।
smilingh9 मई 2012 को जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर विचार किया तो फिर कड़े आदेश दिए और वृन्दावन की विधवाओं के सामाजिक और आर्थिक हाल जानने के लिए सात सदस्यों की एक समिति बना दी। फिर 4 अगस्त 2012 को जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर फिर विचार किया तो उसे पता लगा कि बहुत सी विधवाएं भीख मांगने को मजबूर हैं। यह भी बताया गया कि उनकी मौत होने पर किस तरह उन्हें बोरे में भरकर फेंक दिया जाता है। सरकार के चार आश्रमों में कोई 1700 विधवाएं उस समय रह रही थीं। इनके अलावा भी सैकड़ों विधवाएं विभिन्न आश्रमों में वृन्दावन में रहती हैं। इनमें से 85 प्रतिशत पश्चिम बंगाल की हैं। बहुत सी विधवाओं को सात से आठ घंटे तक भजन गाने के रोजाना 18 रुपए मिलते हैं। तब सर्वोच्च न्यायालय ने कई आदेश दिए जिनमें विधवाओं को अच्छा भोजन दिए जाने, उनके इलाज के लिए स्थाई व्यवस्था किए जाने और उनकी मौत होने पर उनका अंतिम संस्कार उनके धर्म की रीतियों से करना शामिल था। फिर भी संतोषजनक परिणाम सामने नहीं आए। इसका पता तब लगा जब पहली बार इस मामले को उच्च न्यायालय द्वारा सुने जाने के 16 बरस बाद पिछली 12 मार्च 2016 को सर्वोच्च न्यायालय के सामने यह मसला फिर विचारार्थ प्रस्तुत हुआ।
सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रुख और लगातार मानीटरिंग के बाद भी विधवाओं की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। बेसहारा विधवाएं जर्जर आश्रय सदनों में जीने को मजबूर हैं। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता गौरव भाटिया ने न्यायालय को बताया कि विधवाओं के लिए 500 बेड का एक हास्टल बनाया जा रहा है। हालांकि उन्होंने बजट की कमी का रोना रोया। बजट 19 करोड़ का है लेकिन फिर भी 13 करोड़ की कमी है। पिछले साल 15 मार्च को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वृन्दावन का दौरा किया था और आश्रय सदनों की मरम्मत और सुविधाओं के लिए तीन करोड़ देने की घोषणा की थी। पर कई काम अभी भी शुरू नहीं हुए।
अभी 24 मार्च को मुख्यमंत्री ने यह घोषणा की कि वृन्दावन के विधवा आश्रमों को कई आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। उनके लिए शुद्ध पेयजल, वाटर कूलर और सौर बिजली से चलने वाले हीटर आदि की व्यवस्था की जाएगी।
पर कई विधवाओं को उनके वैधव्य में पहली बार थोड़ी सी खुशी तब मिली जब उन्हें होली खेलने का मौका मिला। सफेद लिबास में ढकी रहने वाली ये विधवाएं गोपीनाथ मंन्दिर में पहली बार रंगों की फुहार से रूबरू हुईं। लेकिन उनकी कथा यह तो बताती है कि देश की सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बाद भी उनकी दशा-दिशा सुधारने की सुध किसी को नहीं। =

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