सऊदी अरब और पकिस्तान जैसे इस्लामिक देश चीनी मुस्लिमों पर चुप क्यों हैं?

पेइचिंग : संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी ने तीन सप्ताह पहले उइगुर मुस्लिमों को री-एजुकेशन कैंप में रखे जाने पर सवाल उठाया था। लेकिन अब तक किसी भी इस्लामिक मुल्क की सरकार ने इस संबंध में कोई बयान तक जारी नहीं किया है। हालांकि सोशल मीडिया पर बात उठाई जा रही है, लेकिन प्रभावी नहीं हो पा रही है। एक यूजर ने सोशल मीडया पर कमेट किया है कि ‘इस्लाम केवल शांतिप्रिय समुदायों पर ही हल्ला बोलना जानता है जहां ठुकाई दिखती है वहां इनकी आवाज़ गायब हो जाती है। चीन के खिलाफ बोल के देखो… पीछे वाला भाग लाल हो जाएगा।’ इस्लामिक मुल्कों की यह चुप्पी इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि इसी सप्ताह अमेरिका के दोनों प्रमुख दलों के सांसदों ने चीन में उइगुर मुस्लिमों पर लगने वाली पाबंदियों को लेकर सवाल उठाया था। एक रिपोर्ट के अनुसार सीनेटर मार्को रुबियो के नेतृत्व वाले सांसदों के समूह ने कहा था, हमें उम्मीद है कि विदेश मंत्रालय इन ज्यादतियों के खिलाफ अपना पक्ष रखेगा और समान विचारधारा वाली सरकारों को साथ लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाएगा।

सांसदों ने यह पत्र विदेश मंत्री माइकल पोम्पियो और वित्त मंत्री स्टीवन न्यूचिन को लिखा था। इससे पहले यूरोपियन यूनियन के अधिकारियों ने भी शिनजियांग में मुस्लिमों के कथित उत्पीड़न को लेकर चिंता जताई थी। दूसरी तरफ इंडोनेशिया, सऊदी अरब, मलेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों की सरकारों ने चीन में उइगुर मुस्लिमों पर ज्यादती को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया है। यही नहीं इन देशों की ओर से कोई औपचारिक बयान तक जारी नहीं किया है। सबसे आश्चर्यजनक रवैया तुर्की का है, जिसने पिछले दिनों तुर्की भाषी इन मुस्लिमों को अपने ही यहां जगह देने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन इस बार आर्थिक संकट से जूझ रहे इस देश की ओर से कोई बयान तक सामने नहीं आया है। इस्लामिक देशों की चुप्पी की एक अहम वजह चीन के साथ उनके कारोबारी संबंध हैं। वे कारोबार में नुकसान के चलते किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल न देने का तर्क देते हुए कोई टिप्पणी करने से पीछे हट रहे हैं।