समय मिले तो नेहरू, वाजपेयी और इंदिरा से आगे निकलेंगे नरेंद्र मोदी

- in फीचर्ड, स्तम्भ

है नरेंद्र मोदी के वुजूद पर हिंदोस्तां को नाज
कहते हैं उसे अहल-ए-नजर ही इमाम-ए-पदक


हम जब भी किसी मामले में तुलना करते हैं तो यह आवश्यक नहीं कि वह शत-प्रतिशत हर मामले में खरी उतरे। फिर भी, तुलना का अपना अलग ही औचित्य होता है मौजूदा प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी, भारत के 14वें प्रधानमंत्री हैं और उनकी तुलना कभी भारत प्रथम प्रधानमंत्री, पण्डित जवाहर लाल नेहरू, तो भारत की तीसरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, तो कभी उनके अपने ही, संघी गुरु एवं पिता समान दसवें प्रधानमंत्री, अटल बिहारी वाजपेयीजी से की जाती है। तुलना करने वाले अपने विचारों एवं आंकड़ों के आधार पर तुलना करते ही चले आए हैं और करते रहेंगे। जाहिर सी बात है कि अब जब मोदी का प्रधानमंत्रीत्व काल पूरा होने को आया है तो उनकी भी तुलना की गई है और की जाती रहेगी। देश में अब तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, सभी का कुछ न कुछ योगदान रहा है मगर जब हम उन्हें इस बात के लिए आंकें कि जनता के दिलों पर किसने राज किया है और किस का जादू जनता के सर चढ़ कर बोला है तो उसमें, लेखक के अनुसार प्रथम नरेंद्र मोदी, द्धितीय अटल बिहारी वाजपेयी, तृतीय पण्डित जवाहर लाल नेहरू, और चतुर्थ, इंदिरा गांधी का नंबर आता है। हालांकि मोदी के मुकाबले, इन सभी अन्य प्रधानमंत्रियों ने उनसे अधिक समय तक राज किया है, मगर वात्सल्य की जो भावना जनता में, मोदी के लिए है, जो धाक उनकी अपने विपक्षियों में है और जिस प्रकार से संसद में वह अपना सिक्का जमा देते हैं, ऐसा सौभाग्य न ही नेहरू को मिला, न वाजपेयी को और न ही इंदिरा को, दूसरों की तो बात ही छोड़ दीजिए।

आखिर क्या कारण है कि आज भी जनता नोटबंदी और जीएसटी लागू किए जाने के बाद भी मोदी के साथ है? इसका कारण यह है कि लोग इस बात को समझते हैं कि मोदी एक ईमानदार, कर्मठ और गरीबी से जन्मा हुआ ऐसा व्यक्ति है कि जो देश के सबसे ऊंचे पद पर बैठा है। उनको मोदी की नीयत में किसी भी प्रकार का खलल नजर नहीं आता, और बात भी ठीक है, न तो मोदी ने कभी किसी से सूटकेस में पैसा लिया और न ही अपने सगे संबंधियों के लिए गांधी परिवार के वाड्रा एण्ड कंपनी की माफिक जमीनें आवंटित कीं और फण्ड बांटा और न किसी प्रकार के 2जी, 3जी, सीडब्लूजी, सोनियाजी आदि ऐसे घोटालों का नाम नहीं आया। जो खासियत भारत के इस 14वें प्रधानमंत्री में है, वह पिछले किसी प्रधानमंत्री में नहीं थी। हमारी मुराद है उनकी ‘ऐक्सेसिबिलिटी’, अर्थात् किसी भी आम व्यक्ति को समय देकर अपने घर अथवा दफ्तर में मिलना। मोदीजी की एक अप्वाइंटमेंट की इमेल आईडी, जिस पर कोई भी उनसे मिलने का समय मांगता है और काफी लोगों को उन्होंने न केवल समय दिया है बल्कि उनसे 1-2-1 वार्तालाप भी किया है। कमाल की बात तो यह है कि प्रधानमंत्री अपने चाहने वालों से रू-ब-रू बात करता है मगर उसी के मंत्री जब इसी प्रकार से जनता को समय देते हैं तो अपने कमरे में भीड़-भड़क्के के साथ जनता दरबार में मिलते हैं। यह तो मोदी का ही पित्ता है कि यह व्यक्ति अत्यंत व्यस्त होते हुए और प्रधानमंत्री होते हुए साधारण व्यक्तियों को समय देता है।

मोदी के मंत्रियों को उनसे सादगी का यह सबक सीखने के साथ-साथ, यह भी सीखना होगा कि किस प्रकार से यह 68 वर्शीय व्यक्ति दिन में 20 घण्टे कार्यरत रहता है, शुद्ध भोजन एवं शुद्ध विचारों का आचरण करता है और हर व्यक्ति से बड़ी खुशमिजाजी के साथ, इस प्रकार से मिलता है कि वह व्यक्ति, उसका ही हो लेता है। लेखक ने देखा है कि किस प्रकार से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जनता में मिलने आते हैं और कैसे वे ‘हूब हू’ (गणमान्य व्यक्ति) से बगलगीर हो, सामान्य व्यक्तियों को ठेंगा दिखा वीवीआईपी की भांति चले जाते हैं। लेखक के किसी मित्र ने उनसे कहा था कि अगर मोहतरमा सोनिया गांधी को उनके 10 जनपथ स्थित निवास से मात्र 1 किलामीटर छोड़ दिया जाए तो, वह अपने घर वापस नहीं जा सकतीं। उधर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर जिस प्रकार से लगभग साढ़े तीन घण्टे, बीजेपी कार्यालय से मोदीजी 5-6 किमी सड़ा देने वाली गर्मी और उमस में उनकी शव यात्रा में पैदल चले, यह न केवल भारतवासियों बल्कि पूर्ण विश्ववासियों को उनके सादा जीवन और किसान की भांति मेहनतकाश होने का प्रमाण प्रदान करता है। यही वीडियो ट्रंप से लेकर, जिनपिंग, नेतन्याहू, इमरान, थेरेजामे आदि के मोबाइलों पर पोस्ट हो चुका है। यदि इनके अलावा और भी अन्य देशों के प्रधानमंत्री मोदी के माफिक, बैल की तरह शारीरिक परिश्रम की किसी घटना से जुड़ जाएं तो समझ लीजिए यह मोदी का ‘डोमिनो इफैक्ट’ है।

अभी हाल ही में, पोलैण्ड और इंडोनेशिया के प्रधानमंत्रियों ने भी कुछ ऐसा ही शारीरिक जतन किया मगर उम्र में वे मोदी से 15-20 वर्ष छोटे हैं। यह तो मोदी ने एक नया ट्रेंड सेट कर दिया। विपक्ष का एक बड़ा धड़ा, गुजरात दंगों के कारण मोदी को मुस्लिम दुश्मन मानता है। इससे बड़ा मखौल कोई नहीं हो सकता। यह ठीक है कि विपक्ष के द्वारा भड़काए जाने के कारण कुछ मुसलमान मोदी को पसंद नहीं करते मगर साथ ही साथ, यह भी अटल सत्य है कि मुस्लिमों में मोदी के चाहने वालों की कोई कमी नहीं। उसका कारण यह है कि मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं कि जो अंदर से भी ऐसे ही हैं कि जैसे बाहर से। वह किसी प्रकार के आडम्बर में विश्वास नहीं रखते, जैसे दिखावे की मुस्लिम टोपी पहनना या अल्पसंख्यकों को आरक्षण, उर्दू भाषा आदि के झुनझुनों से उसी प्रकार से बहलाना कि जैसे कांग्रेस मुस्लिमों को फुसलाकर उनके हाथ में सच्चर कमेटी, श्री कृष्णा कमीशन, पंजसाला मंसूब, आदि के भीक के प्याले थमाती रही है।

आज का मुस्लिम मोदी को चाहे पसंद करे या नापसंद मगर इतना अवश्य जानता है कि उनका प्रधानमंत्री देश का एक संतरी है। और बहलावे-फुसलावे की सियासत, उसके शब्दकोश में नहीं। आज कुछ लोग न केवल विपक्ष से बल्कि संघ के मानने वालों में ऐसे उठ खड़े हुए हैं जो नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी आदि को लेकर मोदी को कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि अगर मोदी को भी यदि नेहरू और इंदिरा गांधी की भांति भारत को संभालने की जिम्मेदारी, उतनी ही समय के लिए दे दी गई तो भारत अगले 5 से 10 वर्ष में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और चीन को पीछे छोड़ सकता है। भारत जैसे विशाल देश को आज तक चलाने में मुगलों और अंग्रेजों से लेकर माडर्न इण्डिया के जिम्मेदारान से भी भूल-चूक हुई है। जहां तक मोदी की बात है तो उनकी कोई ऐसी न तो भूल हुई और न ही उन्होंने किसी के साथ नाइंसाफी की है। हां इतना अवश्य हुआ है कि कुछ लोगों ने गाय और जाति-पाति को मुद्दा बनाकर एकदूसरे पर जुल्म ढाया है, जो कि नहीं होना चाहिए था और जिसकी पूर्ण रूप से मोदी ने भर्त्सना भी की। यदि देशवासियों ने मोदी को खो दिया तो वे स्वयं को कभी क्षमा नहीं कर पाएंगे और आज के मौजूदा दौर में, पाकिस्तान, चीन आदि ऐसे देशों से निपटने के लिए मोदी से बेहतर कोई व्यक्ति नहीं।

 

 

 

 

फिरोज बख्त अहमद
(लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार एवं मौलाना आजाद के पौत्र हैं)