सम्पादकीय जनवरी 2017

- in संपादकीय

नोटबंदी के 50 दिन बीत जाने के बाद भ्रष्टाचार पर अंकुश का तो कोईअता-पता नहीं है कि आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक किस मोड में है। जैसे पाकिस्तान में की गयी सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में खूब चर्चाएं हुईं और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला, पूरा विपक्ष सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रश्नचिह्न लगाता रहा। उसी तरह नोटबंदी का निर्णय था तो अप्रत्याशित, 50 दिन के अंदर देश की आर्थिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को निकाल फेंकने की बात कही गयी थी लेकिन 50 दिन से अधिक समय बीत जाने के बाद नोटबंदी पर चर्चाएं शिथिल होती दिखाई दे रही हैं। नोटबंदी के कोई विशेष लाभ उभरकर सामने नहीं आ सके हैं। उल्टे मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर और तमाम तरह के व्यापारिक संस्थान जरूर कोमा में चले गये हैं। अब जबकि 50 दिन से ज्यादा का समय बीत चुका है, कोई भी इस निर्णय के लाभ को ठीक से बता पाने की स्थिति में नहीं है कि आखिर इतना बड़ा निर्णय लिया गया उसके निहितार्थ क्या हुए? 31 दिसम्बर 2016 को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधन से आम जन को बहुत आशाएं थीं कि शायद मोदी अपने भाषण में कुछ नयी नीतियों की घोषणा करेंगे किन्तु उनके भाषण पूर्ण होने के बाद ऐसा लगा कि वो किसी बजट भाषण का आंशिक अंश ही था ना कि नोटबंदी जैसे बड़े फैसले के बाद कोई सुनियोजित योजना का परिणाम। उसके बाद लोगों को लगा कि लखनऊ की 2 फरवरी की भाजपा रैली में उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव के मद्देनजर मोदी कोई लोकलुभावन और आम जन को लाभ पहुंचाने वाली बात कहेंगे किन्तु यहां भी लोगों को निराश होना पड़ा। केवल स्थानीय पार्टियों पर आरोप-प्रत्यारोप तक ही उनका पूरा भाषण राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता को दर्शाने तक सीमित रहा।
दूसरी तरफ भाजपा नेताओं में अब नोटबंदी की चर्चा ही बंद कर दी है और इसके बदले अमीर और गरीब के अंतर को उभार कर नये मुद्दे को जन्म दे दिया है। पांच राज्यों में चुनाव की तारीखें तय हो चुकी हैं, जिनमें पंजाब में तो भाजपा गठबंधन में ही चुनाव लड़ रहा है, गोवा में मनोहर पर्रिकर के केन्द्र में चले जाने के बाद राज्य के नेतृत्व में अभी कोई सशक्त नाम उभरकर सामने नहीं आया है, वहीं मणिपुर आर्थिक नाकेबंदी और स्थानीय विवादों के बीच पहले से ही विवादास्पद स्थिति में है। बचे उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी में कोई भी मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया है। वैसे तो पांचों राज्यों में चुनाव मोदी के ही पोस्टर पर लड़ा जाना है लेकिन उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश में विशेष तौर पर मोदी के ही पोस्टर को आगे किया जा रहा है। भाजपा की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी यह तय हो गया कि भाजपा अपने पुराने एजेण्डे पर, हिन्दुत्व और विकास के एजेण्डे पर ही विधानसभा के चुनावों में मोदी के कंधे पर ही अपनी चुनावी कांवर पार लगाने की जुगत में है क्योंकि स्थानीय नेताओं में स्थानीय स्तर पर कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे मतदाताओं को अवगत कराकर अपने पक्ष में वोट मांग सकें। हर राज्य में दलीय गुटबंदी का शिकार सभी एक दूसरे की टांग खींचने को तैयार हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के पास मोदी के पोस्टर के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी ने भी भारतीय जनता पार्टी में कोई दूसरा चेहरा उभरने दिया भी नहीं। इत्तेफाक से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पारिवारिक कलह ने भाजपा की राजनीतिक लड़ाई को और आसान कर दिया है। समाजवादी पार्टी का कांग्रेस के साथ एलायंस होने की चर्चाएं तो खूब रही हैं पर अभी कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है। दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी अपने मजबूत दलित वोटबैंक के आधार पर मुसलमानों को अपने पक्ष में करने का हरसंभव प्रयास करती हुई दिख रही है। मायावती समाजवादी पार्टी की पारिवारिक कलह को उभार कर अपने को सशक्त विकल्प के रूप में पेश कर रही हैं। अब देखना यह होगा कि मतदाता किसको पसंद करता है। देश की राजनीति की दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों से देश की राजनीति में क्या बदलाव होंगे, उसकी झलक जरूर मिल जायेगी। देखना यह होगा कि उत्तर प्रदेश का मतदाता अखिलेश के विकास या मोदी के सशक्त नेतृत्व को महत्व देता है या जातीय या धर्म की मजबूरियों के वश में होकर बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश की सत्ता पर सत्तासीन करता है। अभी इस क्लाइमेक्स के लिए कुछ दिनों का इंतजार करना होगा।