सम्पादकीय फरवरी 2017

रामकुमार सिंह

पांच राज्यों के चुनाव में उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा है जिसमें इस समय विधानसभा चुनाव का महासंग्राम शुरू हो चुका है। पहले चरण के मतदान 11 फरवरी से प्रारंभ हो जाएंगे जो सात चरणों में सम्पन्न होंगे। प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के पारिवारिक कलह और ड्रामे के बीच कांग्रेस के साथ गठबंधन की कभी हां, कभी ना की स्थिति को पार करते हुए आखिरकार गठबंधन तय हो चुका है, कांग्रेस सपा की हर शर्त को विकल्प के अभाव में सहर्ष मान चुकी है। अखिलेश और राहुल की संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस के बाद एक साथ प्रचार करते हुए मैदान में आ चुके हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी जो देश की सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ विद्यमान है, वह भी प्रदेश में अपनी लहर की बात कर अपने को नंबर वन पार्टी बता रही है। कमोवेश स्थिति ऐसी थी भी किन्तु नोटबंदी के व्यापक असर के बाद अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति क्या होगी? रही-सही कसर टिकट बंटवारे में पूरी हो गयी। जिस तरह से संगठन के वरिष्ठ और कैडर कार्यकर्ताओं को टिकट वितरण में तरजीह नहीं दी गयी वहीं दूसरे दलों से आये लोगों को टिकट देने से भाजपा में अंतरकलह चरम पर है। भाजपा कार्यकर्ता अपने को ठगा महसूस कर रहा है। टिकट बंटवारे को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि दो दिन तक प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण ताला लगा दिया गया। कार्यकर्ताओं ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के लिए अपशब्दों का भी इस्तेमाल करने में गुरेज नहीं की। इन सब परिस्थितियों के बीच भाजपा जो एक मजबूत विकल्प के रूप में उत्तर प्रदेश में दिखाई दे रही थी, उसकी यह स्थिति कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक अलग-अलग स्थानीय समीकरणों में भाजपा फंसती नजर आ रही है। इस चुनाव में भाजपा के बैकवर्ड कार्ड चलने का उसे कितना फायदा मिलेगा यह तो वोटिंग के बाद ही पता लगेगा, किन्तु पश्चिम उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जो जाट समुदाय पूरी तरह से भाजपामय हो गया था, विधानसभा चुनाव आते-आते उसमें भी कमी आ चुकी है। अब देखना यह है कि भाजपा इन भितरघात और असंतोष के बावजूद कितना बेहतर स्कोर कर पाने की स्थिति में अपने को ले जा पाती है। तीसरी बहुजन समाज पार्टी जो अपने दलित वोट बैंक के लिए जानी जाती है, की दावेदारी भी मजबूत मानी जा रही है। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने मुस्लिमों को अपनी ओर आकर्षित करने का हर संभव प्रयास किया। मायावती ने अपनी रैलियों में हर जगह इस बात को बहुत गंभीर तरीके से कहा है कि मुस्लिमों की रहनुमा उनकी ही पार्टी है और इसीलिए उन्होंने टिकट बंटवारे में मुस्लिम उम्मीदवारों का शतक भी पूरा करके दिखा दिया। चुनावी सर्वे अभी तक सपा-कांग्रेस गठबंधन और भाजपा को ही पहले, दूसरे स्थान पर बता रहे हैं और बसपा को तीसरे नंबर पर सबसे कम सीटों के आंकड़ों के साथ दर्शा रहे हैं। लेकिन आम जन में यह चर्चा खास है कि बसपा को कम आंकना गलत है। एकमात्र बीबीसी के सर्वे ने बसपा को 200 सीट का आंकड़ा पार करने का अनुमान लगाया है। उधर बहुजन समाज पार्टी और दलित चिंतकों ने बहुजन समाज पार्टी को मीडिया में तरजीह न दिये जाने की बात कही जा रही है।
एक ओर जहां समाजवादी पार्टी ने कौमी एकता दल के अफजाल और मुख्तार अंसारी बंधुओं को पार्टी में शामिल कराया किन्तु एक राय न बन पाने के कारण बाद में कौमी एकता दल ने बसपा का दामन थाम लिया और जिस तरह से मायावती ने प्रेस मीडिया के सामने उनका विजुअल पेश किया वह पूर्वांचल में मुस्लिम ध्रुवीकरण बसपा के पक्ष में होने के लिए कारगर साबित हो सकता है। किन्तु यही ध्रुवीकरण भाजपा को भी फायदा पहुंचा सकता है। प्रदेश के प्रमुख चार दलों भाजपा, सपा, कांग्रेस, बसपा के अलावा कुछ छोटे दल भी ऐसे हैं जो अपनी जाति समीकरण के साथ गठबंधन के द्वारा चुनाव मैदान में अपनी ताकत दिखाने को बेताब हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा से टिकट न मिल पाने के कारण कुछ मजबूत उम्मीदवारों के लोकदल में शामिल हो जाने से अचानक लोकदल भी खूब चर्चा में है। उधर राष्ट्रीय लोकदल भी पूरे प्रदेश में अपने उम्मीदवारों के साथ चुनावी समर में डटा हुआ है। तो वही पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में पीस पार्टी, निषाद पार्टी और महान दल के एलायंस में कुछ बाहुबलियों के साथ मैदान में आने से कुछ सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर रही है। कुछ चुनिंदा विधानसभाओं में अपनी जाति समीकरणों को एकजुट कर पाने में ये पार्टियां सफल भी हो रही हैं। इन सब समीकरणों के बीच उत्तर प्रदेश का चुनाव बहुत ही रोचक होने वाला है। यह अलग बात है कि किसी भी दल को पूर्ण बहुमत मिलता न दिख रहा हो किन्तु उत्तर प्रदेश की राजनीति में सोच से परे कुछ नये समीकरण जरूर उभरकर सामने आएंगे। उत्तर प्रदेश के सत्ता के संग्राम का बिगुल बज चुका है, सारी सेनाएं अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र और योद्धाओं के साथ चुनावी समर कूद चुकी हैं। देखना यह है कि जीत का सेहरा किसके सिर बंधता है। इसके लिए अभी 11 मार्च तक इंतजार करना होगा।