सम्पादकीय मार्च 2017

मेरी कलम से…

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में चार राज्यों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं और पांचवें सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के चुनाव अपने अंतिम चरण में हैं। बात उत्तर प्रदेश के विधानसभा की करें या सम्मिलित पांच राज्यों की, सभी राज्यों के सभी राजनीतिक दलों का स्थानीय मुद्दों पर जोर कम और एक दूसरे पर लांछन लगाने का काम ज्यादा जोरशोर से किया गया। अपने को अच्छा और दूसरे को बुरा बताने के अलावा कोई प्रमुख मुद्दा चर्चित नहीं हो सका। ले-देकर सभी राजनीतिक पार्टियां मोदी के प्रचार शैली और मोदी के बुने चुनावी राजनीतिक जाल में फंसी नजर आयीं। सभी दल पूरे चुनाव भर मोदी को ही घेरते नजर आये और यही मोदी टीम चाहती भी थी कि सभी मोदी को ही निशाना बनायें जिससे इन चुनावों में मोदी के कद को ही सबसे बड़ा दिखाया जा सके और ऐसा हुआ भी। सभी राजनीतिक दल जाने-अनजाने मोदी को ही निशाना बनाते गये और मोदी बड़ी आसानी से असल मुद्दों से जनता का ध्यान तर्कों के बजाय कुतर्कों पर केन्द्रित करते गये। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा का गठबंधन हो जाने के बाद भी समाजवादी गठबंधन बहुत अच्छा स्कोर नहीं कर पाएगा। वहीं बहुजन समाज पार्टी भी मुसलमानों को लुभाने के और हर तरह के प्रलोभन देने के बाद भी आंशिक रूप से ही मुस्लिम वर्ग को अपने पक्ष में ला पायी है, ऐसा प्रतीत होता है। भारतीय जनता पार्टी जो उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के चुनावी परिणामों में प्रथम श्रेणी की पार्टी बनती दिखाई दे रही है, वो इसलिए कि वह असल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाकर हार्डकोर हिन्दुत्व को उभार पाने में सफल रही है। क्योंकि जितना समाजवादी गठबंधन और बहुजन समाज पार्टी मुस्लिम वर्ग को अपने पक्ष में करने के अथक प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे थे, उतना ही इसका फायदा भाजपा को बिना मेहनत के ही मिलता चला गया। क्योंकि एक बड़े वर्ग ने मोदी की नीतियां और ऐक्शन को न पसंद करने के बावजूद विकल्प के अभाव में भाजपा के ही पक्ष में मतदान कर दिया। ऐसा मतदान के बाद लोगों की आम बातचीत से आभाषित होता है। खैर, परिणाम तो 11 मार्च के बाद ही पता लग पाएंगे किन्तु चुनावों के ट्रेंड से यह जरूर आभास होता है कि भारतीय जनता पार्टी ही उत्तर प्रदेश में पहले नंबर की पार्टी बनकर उभरेगी। अब देखना यह है कि उसे पूर्ण बहुमत प्राप्त होता है कि नहीं। वैसे भाजपा के लिए इन दिनों देश के और राज्यों से भी खुशखबरियां मिल रही हैं। देश के महत्वपूर्ण राज्य महाराष्ट्र के मुंबई सहित नगर पालिका के चुनावों में भाजपा के शानदार प्रदर्शन से और उड़ीसा के पंचायत चुनावों में पहले से दस गुना ज्यादा स्कोर करके भाजपा के पक्ष में एक बहुत आधारशील जनमत बनता दिख रहा है जिसको भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जोड़कर अपने नंबर गिनाने में जरा भी चूकेगी नहीं। पर इन सब वाकयों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता में राजनीतिक शुचिता का ह्रास जरूर हुआ है। सारे दलों ने एक दूसरे पर भद्दी भाषाई टिप्पणियों के सभी मापदंड पार कर लिये हैं। हर व्यक्ति अपने को राम और दूसरे दल को रावण बताने के चक्कर में मोदी की आलोचना के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि विकल्पहीनता की स्थिति में लोग मोदी की नीतियों से विरोध रखने के बावजूद धार्मिक उन्माद में सही निर्णय नहीं ले सके और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है। यह अलग बात है कि रिजल्ट अगर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में आते हैं तो मोदी टीम इसे मोदी लोकप्रियता के नाम पर भुनाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ेगी और आम मतदाता इस बात से इत्तफाक न रखने के बावजूद इसी बात को मानने को बाध्य होगा। किन्तु स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए हमारे देश के नेताओं को राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर भी आम जनता की इस अंतद्र्वन्द्व को समझना होगा कि अगर वो इसी तरह पूरे देश के समाज को एक वर्ग और एक वर्ग विशेष के आईने से देखते रहेंगे और वही बात समाज में भी फैलाते रहेंगे तो ये देशहित में नहीं होगा और किसी एक व्यक्ति को इतनी ताकत मिलती चली जाएगी कि उसका रांग भी राइट माना जाने लगेगा। इन सब चुनावी घमासान के बीच 11 मार्च को सभी राज्यों के परिणाम आ जाएंगे और उसके दो दिन बाद होली का त्योहार किसके लिए हर्षोल्लास का विषय बनेगा और किसके लिए बदरंग साबित होगा, इसके लिए हमें भी 11 मार्च तक इंतजार करना होगा।