सवर्णों की नाराजगी दूर करने का फार्मूला ढूंढ रही है भाजपा

भाजपा ये नहीं चाहती कि उसकी इमेज एससी, एसटी विरोधी बने, क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में 24 प्रतिशत दलितों ने पार्टी के लिए मतदान किया था।


नई दिल्ली : सवर्ण भाजपा के कोर वोटर माने जाते हैं, इसके बावजूद उन्होंने छह सितंबर के बंद में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ नाराजगी दिखाई। एससी, एसटी एक्ट ने भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलेें बढ़ा दी हैं, भाजपा सवर्णों को मनाने के लिए अचूक फार्मूला ढूंढ रही है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे चुनावी राज्यों में बंद का काफी असर दिखा था, इसलिए पार्टी की चिंता जायज है। दिल्ली के अंबेडकर भवन होने वाली पार्टी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में न सिर्फ लोकसभा और विधानसभा चुनाव को लेकर लेकर रणनीति पर चर्चा होगी, बल्कि एससी/एसटी एक्ट पर पार्टी के स्टैंड को लेकर सवर्णों में पनपी नाराजगी को भी दूर करने का फार्मूला निकाला जा सकता है।

पार्टी के कुछ लोगों की राय ये है कि गृह मंत्रालय इस एक्ट के तहत मामला दर्ज करने से पहले राज्यों को सावधानी बरतने की सलाह दे। ऐसा करने के बाद पार्टी विभिन्न राज्यों के सवर्ण संगठनों से बातचीत करके नाराजगी दूर करने का प्लान बना सकती है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि सवर्णों के गुस्से को लेकर सतर्कता बरतने की जरूरत है। मतलब साफ है कि देश में एससी/एसटी एक्ट में संशोधन के बाद जो हालात बने हैं उस पर इस बैठक में प्रमुखता से चर्चा हो सकती है। हालांकि, सवर्णों को मनाने की रणनीति तैयार करते वक्त यह भी ध्यान रखा जाएगा कि कहीं अनुसूचित जाति के लोग फिर से नाराज न हो जाएं। वहीँ बीते 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट में एक बदलाव कर दिया था, तब अनुसूचित जाति के संगठनों ने कहा कि इसे सरकार ने कमजोर कर दिया। इस वर्ग के सांसदों, मंत्रियों ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया, क्योंकि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों में सरकार विरोधी माहौल बनना शुरू हो गया था, इसमें बदलाव के खिलाफ 2 अप्रैल को अनुसूचित जाति के लोगों का देशव्यापी आंदोलन हुआ था। इसलिए सरकार एससी/एसटी एक्ट संशोधन बिल ले आई और वह दोनों सदनों में पास हो गया, अब सवर्णों के संगठन इस एक्ट को 20 मार्च से पहले वाली स्थिति में करने का विरोध कर रहे हैं, इसे लेकर उनके निशाने पर सरकार आ गई है, इसलिए सूत्र बता रहे हैं कि इसका किसी न किसी रूप डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश हो सकती है।

राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को चुनाव में बड़ा मुद्दा बनाने की रणनीति बन सकती है। बीजेपी देश में एनआरसी लागू करने की बात कह सकती है। बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या को भारत की धरती से बाहर निकालने का संकल्प लिया जाएगा। इस पर पार्टी को फायदा मिलने की उम्मीद है। एक पूरा सत्र लोकसभा चुनाव की तैयारियों पर चर्चा के लिए रखा गया है, ताकि सवर्णों, पिछड़ों और अनुसूचित जातियों सहित सभी वर्गों को खुश करने वाली रणनीति का खाका खींचा जा सके। पार्टी ये नहीं चाहती कि उसकी इमेज एससी/एसटी विरोधी बने, क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में 24 प्रतिशत दलितों ने बीजेपी के लिए मतदान किया था। ओबीसी का भारी समर्थन मिला था, इसलिए सामाजिक समरसता बीजेपी का 2019 के लिए जीत का नया मंत्र होगा। एससी/एसटी कानून को उसके मूल स्वरूप में पहुंचाने और ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलवाने के लिए प्रधानमंत्री का अभिनंदन भी किया जाएगा। बताया जाएगा कि ओबीसी और अनुसूचित जातियों के लिए सरकार ने क्या काम किया है। कार्यकारिणी में राज्यों के अध्यक्षों को अपने-अपने प्रदेश का रिपोर्ट कार्ड पेश करने के लिए कहा गया है।

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