स्वस्थ, मस्त जीवन मधुअभिलाषा है, रोगरहित दीर्घ जीवन के अभिलाषी थे हमारे पूर्वज

हृदयनारायण दीक्षित : कालद्रव्य बदल गया है। समय भी प्रदूषण का शिकार है। दिक् भी स्वस्थ नहीं। मन और आत्म द्रव्य भी विष तनाव में हैं। स्वस्थ, मस्त जीवन मधुअभिलाषा है। रोगरहित दीर्घ जीवन के अभिलाषी थे हमारे पूर्वज प्रत्येक मनुष्य की जिजीवीषा है कि स्वस्थ रहें, खूब जिएं। सुखी रहें लेकिन रोग बढ़े हैं। रेागों की मारक क्षमता बढ़ी है। चिकित्सा विज्ञान में तमाम चमत्कारिक शोध भी हुए हैं। निजी अस्पताल बढ़े हैं। उपचार शुल्क आमजन की पहुंच से बाहर हुआ है। रोगियों से लूटमार बढ़ी है। सरकारी अस्पताल बीमार हैं। रोगी शय्या बहुत कम हैं, चिकित्सक भी पर्याप्त नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांच लाख रूपए तक प्रत्येक परिवार को उपचार देने की घोषणा की है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार के साथ हम सबकी भी है। जल प्रदूषित है। नदियां भी प्रदूषण की शिकार हैं। वायु प्रदूषण में रिकार्ड बढ़ोत्तरी है। स्वच्छ हवा में सांस लेने का जन्म सिद्ध अधिकार भी निलम्बित है। मेडिकल पत्रिका “दि लेसेंट” के अध्ययन के अनुसार 2015 के साल जल और वायु प्रदूषण जनित रोगों के कारण भारत में 25 लाख मौते हुई थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पीछे साल आयुर्विज्ञान की महत्ता बताते हुए देश में ‘स्वास्थ्य क्रान्ति’ का आह्वान किया था। आयुर्वेद आयु का वेद (ज्ञान) है। मोदी ने प्रत्येक जिले में आयुर्वेदिक अस्पताल की घोषणा करते हुए प्रकृति की ओर लौटने का आह्वान किया था।
जल प्रकृति का उपहार है और वायु भी। वैदिक पूर्वजों ने वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्म बताया था। वायु जगत् की प्राण शक्ति हैं। वायु प्रदूषण गहराया है। जल के बिना जीवन असंभव और वायु के बिना प्राण की गति नहीं। लेकिन दोनो जीवन तत्व प्रदूषित हैं। दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भी प्रदूषित वायु में सांस लेना मुश्किल है। अधिकांश महानगरों की स्थिति भयावह है। रोग बढ़ना स्वाभाविक ही है। प्राचीन काल में प्रदूषणजनित रोग नहीं थे। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ ‘चरक संहिता’ के अनुसार पूर्व काल में रोग नहीं थे। फिर हजारों बरस पहले रोग बढ़े। ऋषियों ने हिमालय के सुंदर स्थान में सभा बुलाई। रोगों की वृद्धि पर चर्चा हुई। तय हुआ कि भरद्वाज इन्द्र से रोग दूर करने की जानकारी करें। इन्द्र ज्ञात इतिहास के पात्र नहीं हैं। वे प्रकृति की शक्ति हैं। अर्थ हुआ कि भरद्वाज तमाम विद्वानों से ज्ञान लेकर सभा को बताएं। भरद्वाज ने आयुर्वेद का ज्ञान आत्रेय को बताया और आत्रेय ने अग्निवेश को। चरक संहिता व सुश्रुत के विवेचन में आयुर्विज्ञान की ठोस जानकारी है। चरक संहिता की सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, देश, काल और मन के साथ आत्मा को भी द्रव्य बताया है। चरक का आत्मा द्रव्य गीता वाली अमर आत्मा से भिन्न है।
आयुर्वेद का विकास ऋग्वेद से भी प्राचीन है। ऋग्वेद (10.97) में कहते हैं कि “औषधियों का ज्ञान तीन युग पहले से ही हैं।” बताते हैं कि औषधि के सैकड़ो जन्म क्षेत्र हैं। कुछ फल वाली और कुछ फूल वाली हैं। औषधियों का प्रभाव शरीर के अंग अंग और पोर पोर पर होता है। मैकडनल और कीथ ने ‘वैदिक इंडेक्स’ (खण्ड 2) में बताया है कि भारतीयों की रूचि शरीर रचना से सम्बन्धित चिंतन की ओर बहुत पहले ही आकर्षित थी।” उन्होंने अथर्ववेद से शरीर के अंगों से सम्बंधित सूक्त का उद्धरण दिया है और कहा है कि यह विवरण व्यवस्थित है। उन्होंने चरक और सुश्रुत का उल्लेख भी किया है। ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों के चिकित्सा ज्ञान की प्रशंसा है। ग्रिफ्थ ने उन्हें “अंधो, दुबलो और टूटी हड्डी जोड़ने वाला सुयोग्य चिकित्सक” बताया है।” आधुनिक सभ्यता में मानसिक रोग बढ़े हैं। चरक संहिता में कहते हैं “ईष्र्या, शोक, भय, क्रोध आदि मनोविकार हैं। जब मन और बुद्धि का समान योग होता है, संतुलन ठीक रहता है तब मनुष्य स्वस्थ रहता है जब इनका अयोग, अतियोग और मिथ्या योग होता है तब रोग पैदा होते हैं।” बताते हैं “अच्छी नींद के कारण ज्ञानेन्द्रियों की उचित प्रवृत्ति होती है। आयु नियत बनी रहती है। अनिद्रा में ज्ञानेन्द्रियों की उचित प्रवृत्ति नहीं होती। तमाम मानसिक विकार पैदा होते हैं।” आयुर्वेद में शरीर के साथ मन को भी समान महत्व दिया गया है।


मनुष्य पांच महाभूतों से बना है। वे हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। चरक संहिता में वायु को विश्वव्यापी शक्ति बताया गया है। वायु से आयु है। आयु का मूल प्राण है और प्राण की गति शुद्ध वायु पर आश्रित है। खुली वायु में टहलना प्राणवर्द्धन और आनंदवर्द्धन है लेकिन वर्तमान परिस्थिति भिन्न है। वायु प्रदूषण के कारण प्रातः उठने, घूमने या योग आदि के माध्यम से शरीर को प्राण संवर्द्धित करने के अवसर नहीं हैं। “वायु को प्रत्यक्ष देव” कहा गया है। आधुनिक सभ्यता में वायुदेव भी विषाक्त हैं। वायु सहज उपलब्ध है, सबको, धनी और गरीब को भी लेकिन वह दिन दूर नहीं जब महानगरों में महंगे आक्सीजन मास्क लगाए बिना घर से निकलना मुश्किल होगा। जाहिर है कि यह सुविधा संपन्न वर्ग ही पा सकेंगे। खतरे की घंटे कई बार बज चुकी है। कुछ साल पहले न्यायालय के आदेश पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से तमाम पुराने वाहन हटाए गए थे।
जल रस और रक्त का स्पंदन है। लेकिन भारत का जल प्रदूषण भयावह है। चरक संहिता में तमाम नदियों की जल गुण चर्चा है। अथर्ववेद को आयुर्वेद का स्रोत कहा जाता है। यहां कहते हैं “यह जल रसों व प्राण से युक्त हो। जल औषधि है।” पूर्वज जल के प्रति संवेदनशील थे। पाराशर ने जल प्रदूषण के दोषी को कड़ी सजा सुनाई है कि जल प्रदूषित करने वाले को कुत्ते की योनि में जन्म मिलेगा। पाराशर के समय वर्ण व्यवस्था थी। ब्राह्मणों को कुछ छूट थी। पाराशर ने प्रदूषण के दोषी ब्राह्मणों को भी वही सजा सुनाई है। शरीर निर्माण का मुख्य स्रोत अन्न है। वे शरीर को अन्नमय कोष बताते हैं। अन्न की शुद्धता पर जोर था। आज अन्न पैदा होने से भंडारण तक कीटनाशक रसायनों का घालमेल है। अन्न का ओज तेज और प्राण नष्ट हो रहा है। फल भी विषाक्त हो रहे हैं। आदर्श जीवन चर्या वाले भी असुरक्षित हैं। पुराणकारों ने चार युगों की चर्चा की है। संप्रति पांचवा युग है प्रदूषण युग। स्वस्थ भारत का स्वप्न पूरा हो तो हो कैसे? भारतीय मनीषा धन्वन्तरि को आयुर्वेद और अमरत्व का प्रतीक मानती है।
रोग रहित होना अलग बात है और स्वस्थ होना बिल्कुल भिन्न आनंद। चरक ने बताया है कि स्वस्थ होना सुख है और रोगी होना दुख। आयुर्वेद में स्वस्थ रहने के स्वर्ण सूत्र हैं। वात, पित्त और कफ तीन दोष हैं। सत्व, रज और तम तीन गुण हैं। गुणों का प्रभाव मन पर पड़ता है और दोषों का प्रभाव तन पर। रोगी मन शरीर को भी रोगी बनाता है और रोगी तन मन को। धन्वन्तरि, चरक, सुश्रुत, सहित तमाम पूर्वजों ने आयु के विज्ञान का विकास किया था। वात पित्त और कफ की धारणा अरब देशों तक गई थी। वनस्पतियां और औषधियां उपास्य थीं। यहां वनस्पतियों के साथ औषधियों से भी शांति प्राप्ति की प्रार्थना की गई है। ‘उपचार’ प्रथमा नहीं होता। आचार प्रथमा है, आचारहीन को ही ‘उप-चार’ की जरूरत पड़ती है। वैदिक जीवनचर्या में “काम करते हुए ही 100 वर्ष जीवन” का अधिकार है।

(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार व पत्रकार हैं, वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं)

सौन्दर्यबोध से भरेपूरे हैं वैदिक पूर्वज