‘हम भारत के लोग’ : हृदयनारायण दीक्षित

‘हमारे पूर्वजों ने धरती को माता और आकाश को पिता बताया’

‘हम भारत के लोग’ हैं। यही हमारा मूल परिचय है। भारत हमारा कुल, गोत्र, वंश और माता पिता हैं। हमारी पहचान भारत है। हमारा अस्तित्व भारत में है, भारत से है। भारतीय संविधान की उद्देशिका ‘हम भारत के लोग – वी दि पिपुल आॅफ इण्डिया’ से प्रारम्भ होती है। ‘भारत के लोग’ होने के कारण हमारे तमाम अधिकार हैं। भारत के लोग होने के कारण ही हमारे ढेर सारे कर्तव्य हैं। हम भारत के लोगों की राष्ट्रीय जीवनधारा विश्व में प्राचीनतम है। हम अपनी प्राथमिक अस्मिता में ‘परिवार’ रूप में संगठित और सामूहिक हुए थे। परिवार हम भारत के लोगों की सबसे प्रिय संस्था है। परिवार प्रियता और सदस्यों की आत्मीयता हमारे मन और प्राण तक रची बसी है। परिवार संस्था के प्रति भारतीय प्रीति अनूठी है। इसी प्रतीति और अनुभूति के कारण अग्रजों पूर्वजों ने सम्पूर्ण पृथ्वी को भी परिवार बताया है। परिवार गठन और विकास का मूल स्रोत माता पिता हैं। पूर्वजों ने धरती को माता और आकाश को पिता बताया है। आकाश को पिता और धरती को माता जानने बताने की यह अनुमति ऋग्वेद के मंत्र उगने के पहले से है और आधुनिक भारत तक विस्तृत है।

भारत का शाब्दिक अर्थ सरल तरल है लेकिन आग्नेय है। शब्द भारत में भा का अर्थ प्रकाश है और रत का अर्थ संलग्न या सम्बद्ध है। भारत शब्द का प्रयोग सबसे पहले ऋग्वेद में हुआ है। दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य ‘महाभारत’ है। इस काव्य के नाम में भी भारत है। भारत के लोग आदिम काल से परिवार, गण और जन जैसी इकाइयों में संगठित रहे हैं। गण नाम की इकाई परिवार से बड़ी थी। परस्पर प्रीति और आत्मीयता से गण व्यवस्था का विकास हुआ। कृषि उपज और जीवन की जरूरतों से जुड़े तमाम उपकरणों के निर्माता शिल्पकारों के परस्पर आर्थिक सम्बंधों से गण व्यवस्था को मजबूती मिली। गण के साथ, थोड़ा आगे पीछे ग्राम व्यवस्था का भी विकास हुआ। गण का मुखिया गणपति कहा गया और ग्राम का प्रमुख ‘ग्रामणी’। आधुनिक राजव्यवस्था का ग्राम प्रधान वैदिक ग्रामणी का विकास है। है। गण सांस्कृतिक दृष्टि से भी आत्मीय थे। इसलिए प्रत्येक गण का एक देवता या उपास्य भी होना चाहिए। गणेश नाम के देवता गण-ईश कहे गये। ऋग्वेद में ‘गणानां तवां गणपति’ आया है। ग्राम का भी देवता था। आधुनिक कर्मकाण्ड में ग्राम देवता को नमस्कार किया जाता है। गण छोटी इकाई थे। सांस्कृतिक कारणों के साथ आर्थिक मिले। विभिन्न गणों में मिलन हुआ। गणों से मिलकर ‘जन’ बने। जन बड़ी सामूहिक इकाई थे। इनके संगठित क्षेत्र से जनपद बने।

राष्ट्रगान के ‘जन गण मन’ में जन और गण दोनो हैं। ऋग्वेद से लेकर संपूर्ण वैदिक वांग्मय में मुख्यतया पांच जनों की लगातार चर्चा है। सामूहिकता की प्रीति में उन्हें पांचजन्य भी कहा गया है। वैदिक मंत्रों में अनेक नदियों के नाम हैं। लेकिन 7 नदियां सप्तसिंधु की महत्ता है। सरस्वती इन ऋषियों कवियों की प्रिय नदी है। वे उसे ‘नदीतमा’ कहते हैं। वह ‘पंचजातावर्द्धयंती’ भी है। यह पांच जनों को समृद्धि देती है। शोध, बोध और आनंद की यह धरती पूर्वजों को प्रिय है। वे इस भूमि को देवप्रिय भी बताते हैं। पूर्वज बहुदेव उपासक हैं। कुछेक आधुनिक व्याख्याकार बहुदेव उपासना को बहुदेववाद कहते हैं। बहुदेववाद एक विचार है। बहुदेव उपासना अपनी मौज है। हमारे पूर्वजों की देव प्रतीति निराली है। मेढक देवता हैं। भाव जगत की श्रद्धा भी देवता हैं। सूर्य प्रत्यक्ष प्रकाशमान देवता हैं। इन्द्र वरूण अनुभूति वाले देव हैं लेकिन अग्नि प्रत्यक्ष प्रकृति की शक्ति है, सो वे ऋषियों कवियों के लाड़ले देव हैं। जल देवता भी हैं और बहुवचन रूप माताएं भी हैं। पूर्वजों ने कर्म को आदर्श माना है। ऋषि ने कहा है कि श्रम न करने वाले मनुष्य का साथ देवता भी नहीं देते। यह विचार भारत के लोगों को श्रमशील बनाता है।

हम भारत के लोगों ने स्वयं अपनी राजव्यवस्था बनाई है। यहां राजव्यवस्था की शुरूवात वैदिक काल में ही हो चुकी थी। वैदिक काल का राजा भूपति नहीं है। भूमि सबकी है। राजा भूपति न होकर नृपति है। तब सभा और समितियां भी सक्रिय थीं। वे विचार विमर्श का केन्द्र थी। वैदिक काल के साहित्य में प्राचीन राजव्यवस्था के महत्वपूर्ण सूत्र हैं। हम भारत के लोगों का राष्ट्र वैदिक काल में ही प्रकट हो चुका था। राजव्यवस्थाएं और राजा भिन्न भिन्न थे, लेकिन राष्ट्र एक था। राष्ट्र गठन का मूल आधार संस्कृति है। अथर्ववेद में राष्ट्र गठन और विकास की सुंदर झांकी है। प्राचीन भारत संपन्न और समृद्ध देश था। यहां की धन संपदा के लोभ में कई विदेशी समूह आए। हमले हुए। मो0 बिन कासिम भी लूटमार और धर्मांतरण कराने के लिए हमलावर होकर आया था फिर ऐसे तमाम हमलावर आते रहे। बाद में यहां मुगल सत्ता ने पैर जमाए। 1757 के बाद अंग्रेजी सत्ता का विकास हुआ। 1857 के बाद भारत का राजकाज संचालन ब्रिटिशों के हाथ गया। उन्होंने यहां की सम्पदा लूटने के लिए तमाम संस्थाएं बनाई। प्रतिरोध हुआ तो 1935 में भारत शासन अधिनियम बना।

स्वाधीनता संग्राम में भारतीय राष्ट्रवाद ने अपना मूल रूप प्रकट किया। 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन विदेशी सत्ता और सभ्यता के विरूद्ध निर्णायक प्रतिकार था। भारत स्वतंत्र हुआ। भारत के लोगों ने अपनी संविधान सभा बनाई। अपना संविधान बनाया। संविधान का दर्शन प्रस्तुत हुआ। उद्देशिका की घोषणा हुई। स्वयं संविधान बनाना और उसके प्रति आत्मार्पित होना हम भारत के लोगों की ही विशेषता है। संविधान राजव्यवस्था का सर्वोपरि केन्द्र है। यहां संविधान का ही राज है। संविधान में अनेक संस्थाएं हैं। स्वतंत्र न्यायपालिका है। स्वतंत्र निर्वाचन आयोग है। स्वतंत्र महालेखाकार है। जवाबदेह सरकारें है। संसद संविधान संशोधन की शक्ति से समृद्ध है। राज्यों में विधान मण्डल है। 2014 के पहले के दशक में संवैधानिक संस्थाओं की शक्ति घटी थी। संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण अभूतपूर्व दुखदायी था। 2014 में बनी नरेन्द्र मोदी की सरकार के बाद संवैधानिक संस्थाओं के सम्माान में बढ़त हुई। प्रधानमंत्री मोदी जी न संसद भवन प्रवेश के पहले दिन ही सीढ़ियों पर लेटकर अपनी श्रद्धा व्यक्त की थी।

‘‘हम भारत के लोग’’ विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संविधान का मौलिक अधिकार स्वीकार कर चुके हैं। 4 वर्ष की इस अवधि में इस अधिकार का प्रयोग बढ़ा है। दुरूपयोग भी कम नहीं हुआ। राज और समाज गतिशीलता में ही उन्नति करते हैं। इस अवधि में दोनों गतिशील रहे हैं। दुनिया के तमाम देशों में भारत की सघन उपस्थिति देखी गई है। तेज रफ्तार गति को पकड़ना आसान नहीं होता। बीते भूत को पकड़ना आसान होता है लेकिन भूत का द्रव्यमान भी स्थाई नहीं होता। भूत भी प्रतिदिन हर पल बढ़ता रहता है। हमारी आशा और योजना का नाम भविष्य है। भविष्य अनिश्चियत होता है। पीछे के 50 माह राष्ट्रजीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इस कालखण्ड की छोटी छोटी घटनाएं भी अध्ययन के लिए उपयोगी है। इनमें उत्साह और उमंग के बीज है। निश्चित ही इन बीजों के पौध बनने व फूल फल बनने की आशा की जा सकती है। हम समय को रोक नहीं सकते। घटनाओं की गति का अनुमान ही लगा सकते हैं। इस अनुमान में आशा के पंख लगाकर उड़ते हुए भविष्य के भारत की नियति परम वैभवशाली राष्ट्र बनना है। भारत एक तत्व है। भारतीय होना इस तत्व से भरापूरा होना है। भारतीयता एक विशेष प्रकार की संवेदनशीलता है। यही संवेदनशीलता प्रत्येक सामाजिक कार्यकत्र्ता की प्रेरणा है। मैं अपने लम्बे सार्वजनिक जीवन में इसी प्रेरणा के प्रभाव में हजारों आलेख व 27 किताबें लिखी हैं। इस लेखन का प्रयोजन भारतीय तत्व का संवर्द्धन करना है। 2014 से 2018 तक माह में मैंने तमाम तत्कालिक विषयों पर लेख लिखे हैं। इन लेखों में तात्कालिकता का संदर्भ छोटा है और दीर्घकाल का प्रयोजन बड़ा है। तात्कालिका के समय संदर्भ के बावजूद ये निबंध सर्वकालिक महत्व के हैं। यहां उन्हीं प्रकाशित निबंधों को ‘हम भारत के लोग’ से संकलित किया गया है।

 

 

 

 

 

 

हृदयनारायण दीक्षित
(रविवार पर विशेष)