ग़ज़ल

अड़े हैं तो मंजिल की जिद में अड़े हैं
बहुत छोड़कर ही हम आगे बढ़े हैं।

अदब से उठाना ज़रा उन दियों को
अमावस में जो तीरगी से लड़े हैं।

झुके हैं फलों से लदे ये शजर जो
यकीनन ये हमसे बहुत ही बड़े हैं।

बिना अन्न के है नहीं कुछ भी मुमकिन
सृजन के तो हथियार हल-फावड़े हैं।

तपन में जो शीतल बनाते हैं जल को
वे मिट्टी के अनमोल सुन्दर घड़े हैं।

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तुलसी के, जायसी के, रसखान के वारिस हैं,
कविता में हम कबीर के ऐलान के वारिस हैं।
हम सीकरी के आगे माथा नहीं झुकाते,
कुम्भन की फ़कीरी के, अभिमान के वारिस हैं।

सीने में दिल हमारे आजाद का धड़कता,
हम वीर भगत सिंह के बलिदान के वारिस हैं।

एकलव्य का अंगूठा कुछ पूछता है हरदम,
हम तीर कमानों के संधान के वारिस हैं।

हमने समर में पीठ दिखाई नहीं कभी भी,
आल्हा के हम सहोदर, मलखान के वारिस हैं।

 

प्रो. वशिष्ठ अनूप
(हिंदी-विभाग)
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी