दस्तक-विशेषस्तम्भ

नहीं, विपक्ष का अंत नहीं होगा

-नवीन जोशी

सन 2019 के चुनाव तक भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता के प्रयासों को लगातार झटके लग रहे हैं। उधर, नरेंद्र मोदी के नेतृत्त्व में राजग खेमा लगातार मजबूत होता जा रहा है। राजनैतिक विश्लेषक ‘विपक्ष के अंत’ की भविष्यवाणी तक करने लगे हैं। लोकतंत्र में विपक्ष का अंत नहीं होता। विपक्ष को दबाने या खत्म करने के प्रयास सता-पक्ष की निरंकुशता को जन्म देते हैं। इसी से विपक्ष पैदा होने लगता है अथवा उसे ताकत मिलने लगती है। इसलिए, विपक्ष चाहे जितना कमजोर हो जाए, या नदारद मालूम दे, उसके किसी भी समय खड़े हो जाने और क्रमश: मजबूत होने की सम्भावना हमेशा मौजूद रहती है।

मायावती का पटना रैली में जाने से इनकार प्रकट में विपक्षी एकता के लिए निराशाजनक भले लग रहा हो, मगर इसकी सम्भावना खत्म नहीं हुई है कि वे देर-सबेर उसमें शामिल हों। गौर करना चाहिए कि मायावती ने पटना रैली में शामिल होने से इनकार किया है लेकिन भाजपा के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष दलों की एकता का विरोध नहीं किया है। बल्कि वे ‘भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी’ के खिलाफ ‘सेकुलर दलों की एकता’ की हिमायती हैं। बसपा के उसमें शामिल होने की उनकी शर्त है कि सीटों का बंटवारा पहले हो जाए। जाहिर है वे गठबंधन में बड़ा हिस्सा चाहती हैं। यह स्वाभाविक है। मुझे लगता है कि मायावती आज खुद को राजनैतिक बियाबान में पा रही हैं और शायद यह मान चुकी हैं कि वहां से निकलने का रास्ता विपक्ष की एकता से मिलेगा। अभी उनके दो संशय हैं। पहला यह कि वे अपना दलित आधार अक्षुण्ण रखना चाहती हैं। ऐसा न हो कि गठबंधन के चक्कर में उनका दलित, खासकर जाटव आधार खिसक जाए। दूसरा, उनको भय है कि भाजपा विरोधी मोर्चे में शामिल होने पर सीबीआई उनके पीछे भी उसी तरह न पड़ जाए, जैसे लालू परिवार के खिलाफ पड़ गयी है। मामले उनके खिलाफ भी कम नहीं। इसलिए सम्भावना है कि मायावती विपक्षी मोर्चे में ऐन चुनाव के समय शामिल हों। तब तक भाजपा विरोधी गठबंधन की शक्ल भी साफ हो जाएगी।

भाजपा की ताकत लगातार बढ़ रही है। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के दोनों गुटों का विलय हो गया। किसी पार्टी में विभाजन के बाद विलय की यह सम्भवत: पहली घटना है, लेकिन इससे ज्यादा इसका महत्व इसलिए है कि अब अन्नाद्रमुक के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल होने का रास्ता साफ हो गया है। अर्थात दक्षिण भारत का यह बड़ा राज्य भी भाजपा के खेमे में आ जाने वाला है, जिसे अन्यथा जीतने का ख्वाब फिलहाल वह देखने की स्थिति में नहीं थी। आज भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की जगह ले चुकी है। केंद्र में उसकी भारी बहुमत वाली सरकार है। चंद बड़े राज्यों को छोड़ कर ज्यादातर प्रदेशों में वह सत्तारूढ़ है। गुजरात, कर्नाटक और हिमाचल जैसे राज्यों में उसका आक्रामक चुनाव अभियान अभी से दिख रहा है। लोकसभा में उसके पास भारी बहुमत है। अगले वर्ष तक राज्यसभा में भी उसका बहुमत हो जाएगा। बिहार और तमिलनाडु भी उसके खेमे के हो चुके हैं।

उधर, विपक्षी एकता की कोशिशों को सबसे बड़ा धक्का नीतीश कुमार के जाने से लगा। उससे यह भी साबित हुआ कि विपक्षी एकता की सूत्रधार बनी कांग्रेस प्रभावहीन है अथवा उसकी बात सहयोगी सुन नहीं रहे। यदि कांग्रेस लालू को इस बात के लिए मना लेती कि विपक्षी एकता के लिए तेजेश्वरी यादव नीतीश सरकार से अलग हो जाएं, भले ही लालू परिवार का कोई दूसरा उसकी जगह ले ले, तो नीतीश इतनी आसानी से राजग खेमे में न गये होते। इधर शरद पवार की भी कांग्रेस से नाराजगी सामने आ रही है। दरअसल विपक्षी एकता के लिए जिस धुरी की जरूरत है, वह इस समय नजर नहीं आ रही। कांग्रेस का कमजोर नेतृत्व सबसे बड़ी दिक्कत है। सोनिया कोशिश जरूर कर रही हैं लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं और स्वास्थ्य भी खराब है। राहुल में कतई परिपक्वता नहीं है। इसलिए आज ऐसा लग रहा है कि भाजपा की बाढ़ के सामने विपक्ष बह जाएगा। ऐसा मानना ठीक नहीं। हमारे लोकतंत्र और समाज में वह खाद-पानी मौजूद है जो जरूरत के वक्त विपक्ष को पैदा करने में सक्षम है।

सत्तर साल के हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में विरोधी दलों ने कई बार नदारद-सा होने के बावजूद अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। नेहरू के शासनकाल में जब कांग्रेस के मुकाबिल कोई सशक्त विपक्षी दल नहीं था, तब भी लोहिया जैसे प्रखर नेता ने ताकतवर विपक्ष की भूमिका बखूबी निभायी। उन्होंने 1960 के दशक में ‘गैर-कांग्रेसवाद का नारा बुलंद किया जिसने 1967 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कमजोर किया और नौ राज्यों में कांग्रेस के पैर उखाड़ कर संयुक्त विधायक दल (संविद) की सरकारें बनवाईं। 1975 में तानाशाह बन गयी इंदिरा गांधी के खिलाफ सभी विरोधी दल एक हुए और इंदिरा कांग्रेस को 1977 में बनी जनता पार्टी ने बड़ा सबक सिखाया। 1984 में लोकसभा की 400 से ज्यादा सीटें जीतने का कीर्तिमान बनाने वाले राजीव गांधी को भी उनकी कुछ बड़ी गलतियों के कारण 1988-89 के जनता दल ने सत्ता से बाहर किया। 1967 का ‘संविद’ कई विरोधी दलों के विधायकों का मोर्चा था।

जनता पार्टी और जनता दल कई दलों से मिल कर बनी राजनैतिक पार्टियां थीं। भारतीय राजनीति के ये प्रयोग दीर्घजीवी साबित नहीं हुए लेकिन इन्होंने उस समय आवश्यक हस्तक्षेप करके स्थितियां बदल दीं, जब अनेक कारणों से कांग्रेस सरकारें निरंकुश या अराजक हो गयी थीं। भाजपा में भी निरंकुशता के लक्षण दिख रहे हैं। चुनाव नतीजों में पिछड़ने के बावजूद उसने जिस तरह मणिपुर और गोवा में सरकारें बनायीं और हाल ही में राज्य सभा चुनाव में जो तमाशा गुजरात में किया, वह और क्या है? अमित शाह देखिए क्या बोल रहे हैं, कि भाजपा पचास साल शासन करने के लिए आयी है! इसलिए मायावती विपक्षी मोर्चे में शामिल हों या नहीं, या ममता बनर्जी ही ऐन मौके पर बिदक जाएं, विपक्ष 2019 और उसके बाद भी मौजूद रहेगा। वह कमजोर हो सकता है, खत्म नहीं। 

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