दस्तक-विशेषस्तम्भ

बच्चे का धर्म

सुभाष गाताडे
अपनी सन्तान को क्या माता पिता के नाम जुड़ी जाति तथा धर्म की पहचान के संकेतकों से नत्थी करना अनिवार्य है। हैदराबाद उच्च न्यायालय ने स्वीकृत की एक जनहितयाचिका- जिस सम्बन्ध में उसने न केवल आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना की सरकारों को ही नहीं बल्कि केन्द्र सरकार को भी जल्द जवाब देने के लिए कहा है, इसी बहाने यह सवाल बेहद मौजूं हो उठा है। प्रस्तुत याचिका को डी वी रामाकृष्ण राव और एस क्लारेन्स कृपालिनी ने अदालत में पेश किया है। इसी मसले को लेकर उन्होंने एक आनलाइन पीटिशन भी शुरू की है।
अन्तरधर्मीय एवं अन्तरजातीय विवाह किए इस दंपति ने जिसमें से एक धर्म में विश्वास रखता है तथा एक किसी धर्म का अनुयायी नहीं है, यह तय किया है कि अपनी दोनों सन्तानों के साथ वह जाति तथा धर्मगत पहचान नत्थी नहीं करना चाहते। उन्होंने देखा कि ऐसा कोई विकल्प सरकारी तथा आधिकारिक दस्तावेजों में नहीं होता जिसमें लोग अपने आप को ‘किसी धर्म या जाति से न जुड़े होने’ का दावा कर सकें, इसलिए यह याचिका अदालत में प्रस्तुत की गयी है ताकि इन फाम्र्स में एक कॉलम ‘धर्मविहीन और जातिविहीन’ होने का भी जुड़ सकें। अपनी दोनों बेटियों- स्पंदना और सहजा को स्कूल में प्रवेश दिलाते वक्त या दसवीं के इम्तिहान में फार्म भरते वक्त़ उन्हें जिन दिक्कतों का सामना करना पड़ा उसे मददेनज़र रखते हुए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
उनका तर्क सरल है कि अगर संविधान हमें आस्था का अधिकार देता है तो वह कोई आस्था न रखने का अधिकार भी देता है। बदलते हुए समाज में जबकि सभी पहचानों के समान सम्मान की बात की जाती है, जहां हमने त्रतीयलिंगी पहचान को भी अब स्वीकारा है तो आखिर किसी के ‘धर्म से परे तथा जाति से परे’ होने की पहचान को क्यों नहीं स्वीकार सकते। इस सन्दर्भ में उन्होंने भारत की बहुलतावादी परम्परा का भी उल्लेख किया है जिसे चार्वाकों, लोकायतों, नास्तिकों, मानववादियों, रैडिकल मानवतावादियों, समाजवादियों आदि ने रौशन किया है।
बच्चे को किसी धार्मिक पहचान से विरत रखने का यह प्रयास हालिया दो ख़बरों की याद ताजा करता है, इनमें एक का फोकस भी अन्तरधर्मीय विवाह करनेवाले एक युगल द्वारा अपनी नवजन्मी सन्तान के साथ किसी धर्म को चस्पां न करने के फैसले पर था। कह सकते हैं कि मराठी परिवार में जनमी अदिति शेड्डे और और गुजराती परिवार में पले आलिफ सुर्ती- जो चर्चित कार्टूनिस्ट आबिद सुर्ती के बेटे हैं- के अपने निजी जीवन के एक इस छोटे से फैसले ने सुर्खियां बटोरी थीं। इस युगल का मानना था कि बड़े होकर उनकी सन्तान जो चाहे वह फैसला कर ले, आस्तिकता का वरण कर ले, अज्ञेयवादी बन जाए या धर्म को मानने से इन्कार कर दे, लेकिन उसकी अबोध उम्र में उस पर ऐसे किसी निर्णय को लादना गैरवाजिब होगा।
निश्चित ही अपने इस फैसले पर अमल करने में उनके सामने काफी बाधाएं आयीं थीं। सन्तान का जन्मप्रमाणपत्र तैयार करने में अलग अलग दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े, एक अफसर ने तो अदिति से पूछ लिया कि क्या तुम्हें अपने हिन्दू होने पर शर्म है? अदिति ने तपाक से जवाब दिया कि भले ही वह हिन्दू परिवार में जन्मी हो, लेकिन किसी भी रीतिरिवाज को नहीं मानती और अहम बात यह है कि क्या एक जनतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश में क्या मां-बाप यह फैसला नहीं ले सकते कि वह अपनी सन्तान को किसी धर्म से नत्थी नहीं करेंगे।
दूसरी ख़बर में बच्चे को धर्म के बंधन में जबरदस्ती बांधे जाने की कोशिशों से अदालतों के विरत रहने की नज़ीर दिखती है। पिछले दिनों मुंबई की उच्च अदालत ने तीन साल की एक बच्ची की कस्टडी के मामले में इसी पर विचार करते हुए एक अहम फैसला दिया और ईसाई पिता एवं हिन्दू मां की इस बच्ची की कस्टडी नाना-नानी को सौंप दी।
दरअसल बच्ची का पिता अपनी पत्नी की हत्या के जुर्म में इन दिनों जेल में है और हत्या की घटना के बाद से ही बच्ची अपने नाना-नानी के संरक्षण में रह रही है। बच्ची के पिता एवं बच्ची की बुआ ने कुछ समय पहले अदालत में यह याचिका दायर की थी कि उसकी कस्टडी उन्हें मिले क्योंकि वह बच्ची का लालन-पालन कैथोलिक तरीके से करना चाहते हैं, ताकि आगे चल कर वह बेहतर इन्सान बन सकें। याचिका में उन्होंने यह भी जोड़ा था कि बच्ची का धर्म वही होना चाहिए, जो उसके पिता का है। अदालत ने उनके सभी तर्कों को खारिज करते हुए यह भी जोड़ा कि सन्तान के धर्म को लेकर उनके तर्क संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
अपने-अपने धर्म की मान्यताओं के प्रति लोगों के विशिष्ट आग्रह, अगर किसी मुल्क के कानून की किताबों में दर्ज हों, तो वह किस तरह मानवाधिकारों के हनन का जरिया बन सकते हैं, इसे हम रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय बहुल आयलैण्ड में भारतीय मूल की एक चिकित्सक सविता की असामयिक मौत के सन्दर्भ में भी देख चुके हैं, जिनका वक्त रहते गर्भपात न करने से यह स्थिति बनी थी। कई बार यह भी स्थिति बनती है कि माता-पिता के विशिष्ट धार्मिक आग्रह उनकी सन्तान के इलाज तक में बाधा बनते हैं और अगर राज्य की एजेसियां बाल अधिकारों को लेकर सम्वेदनशील न हों, तो सन्तान के जान पर भी बन आ सकती है। कुछ वक्त़ पहले, तेरह साल की आराधना, जो हैदराबाद के सेण्ट फ्रांसिस स्कूल में आठवीं की छात्रा थी तथा जो समदारिया नामक समृद्ध जैन परिवार की सदस्य थी, जिसके परिवार में तमाम पढ़े लिखे लोग हैं, उसकी मौत के बाद इस कड़वी सच्चाई से हम सभी रूबरू हुए थे।
मालूम हो कि जैन समुदाय से सम्बद्ध आराधना समुदाय के पवित्रा कहे जानेवाले समय चौमासा के पूरी कालावधि में व्रत पर थी, अर्थात उसने अन्न ग्रहण नहीं किया था। व्रत समाप्ति पर उसकी शोभायात्रा निकाली गयी थी और उसे ‘बाल तपस्वी’ घोषित किया गया था। डाक्टरों के मुताबिक व्रत की समाप्ति के बाद अचानक उसकी तबीयत बिगड़ी और दिल का दौरा पड़ने से उसका निधन हुआ। आराधना की मौत पर बाल अधिकार संरक्षक समूहों में जबरदस्त आक्रोश था और उनके दबाव के चलते उसके आत्मीय जनों के खिलाफ मुकदमा भी कायम हुआ था। इस संबंध में मनोवैज्ञानिकों की राय स्पष्ट है जो कहते हैं कि माता पिता द्वारा अनजाने से जो दबाव डाला जाता है वह बच्चे को मनोवैज्ञानिक तौर पर पंगु बना सकता है। और जब हम इसमें धर्म को खींच कर लाते हैं तो उसके साथ अपराधबोध भी जुड़ जाता है कि फलां चीज़ नहीं की गयी तो उससे विपत्ति आ सकती है। बच्चे को यह यकीन दिलाया जाता है कि यह सब परिवार की बेहतरी के लिए है और उसे महज अपने स्वास्थ्य का कुछ त्याग करना है।
प्रश्न उठता है कि आज जबकि विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रचण्ड तरक्की ने हमें अब तक चले आ रहे तमाम रहस्यों को भेदने का मौका दिया है और दूसरी तरफ हम आस्था के चलते सुगम होती विभिन्न असहिष्णुताओं या विवादों के प्रस्फुटन को अपने इर्दगिर्द देख रहे हैं, उस दौर में सन्तान और माता-पिता/अभिभावक की धार्मिक आस्था के सन्दर्भ में किस किस्म की अन्र्तक्रिया अधिक उचित जान पड़ती है।
एक रास्ता यह दिखता है कि 21वीं सदी में भी अपनी अपनी धार्मिक मान्यताओं से अपनी सन्तानों को लैस करने के माता-पिता के विशेषाधिकार पर हुबहू अमल होता रहे या दूसरा रास्ता यहभी हो सकता है कि इस मसले को खोल दिया जाए तथा इसे बालमन की विशिष्ट स्थिति में सिचुएट करके देखा जाए।
प्रख्यात ब्रिटिश विद्वान रिचर्ड डॉकिन्स- जिन्होंने बाल मन पर होने वाले धार्मिक प्रभावों के परिणामों पर विस्तार से लिखा है- के विचारों से इस मसले पर रोशनी पड़ती दिखती है। अपनी बहुचर्चित किताब ‘गाड डिल्यूजन’ में वह एक छोटासा सुझाव यह देते हैं कि क्या हम ‘‘ईसाई बच्चा/बच्ची’’ कहने के बजाय ‘‘ईसाई माता-पिता की सन्तान’’ के तौर पर बच्चे/बच्ची को सम्बोधित नहीं कर सकते ताकि बच्चा यह जान सके कि आंखों के रंग की तरह आस्था को अपने आप विरासत में ग्रहण नहीं किया जाता।
स्पष्ट है कि इसमें फैसला लेने में हम सब अधिक दुविधा का सामना इसलिए करते हैं क्योंकि हम अक्सर धार्मिक मान्यता एवम नैतिकता को आपस में गड्मड्ड करते हैं। हमें यह लगता है कि बच्चे को अगर धर्म की शिक्षा नहीं दी जाएगी तो उसके ‘अनैतिक’ होने की सम्भावना है। यह हम देख नहीं पाते कि दरअसल नास्तिक लोग अपनी सन्तानों को उन्हीं नैतिक मूल्यों से अवगत कराते दिख सकते हैं, भले ही वह इन मूल्यों/सिद्धान्तों को किसी खुदा के आदेश के तौर पर पेश न करते हों, बल्कि अन्य मानवजीवों के प्रति तदानुभूति के बात पर जोर देते हों।
बच्चे की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि उसके बड़े जो कहें उसे चुपचाप मान लेना, उस पर प्रश्न न करना; लेकिन उसका दूसरा पहलू यह भी होता है कि हर चीज पर प्रश्न करना क्योंकि जिस भी चीज के सम्पर्क में आता है, वह उसके लिए नयी है। अगर हम बच्चों के अपने अधिकार की अहमियत भी समझें तो उसके स्वस्थ्य विकास के लिए क्या तरीका बेहतर होगा कि वह बिना प्रश्न किए- अपने बड़ों के आदेशानुसार कहीं पहले झुकना सीखें या हम उसके मनोविकास के द्वार चतुर्दिक खोलें ताकि उसकी संज्ञानात्मक प्रक्रिया ठीक से आगे बढ़ सके।
इस सन्दर्भ में हमारी दुविधा इस वजह से भी बढ़ जाती है क्योंकि हम अपने इर्दगिर्द- फिर चाहे राजनीति हो या सामाजिक जीवन हो- धार्मिकता के बढ़ते विस्फोट को भी देखते हैं। दक्षिण एशिया के इस हिस्से में ईशनिन्दा के नाम पर सुनायी जानेवाली सज़ा ए मौत की घटनाएं भी हमारे अन्तर्मन को कहीं न कहीं प्रभावित भी करती रहती हैं। इस सन्दर्भ में अधिक स्पष्टता तभी मिल सकती है जब हम समूची दुनिया पर निगाह डालें।
ब्रिटेन के चर्चित गार्डियन अख़बार ने पिछले दिनों ब्रिटिश सोशल एटिटयूडस सर्वे के ताजा शोध को प्रकाशित किया था। मालूम हो कि इसके अन्तर्गत हर साल यह पता किया जाता है कि ब्रिटेन में कितने लोग धर्मालु हैं। वर्ष 1985 में जब पहली दफा यह सर्वेक्षण किया गया था तो 63 फीसदी लोगों ने कहा था कि वे क्रिश्चियन हैं, जबकि 34 फीसदी ने कहा था कि वे किसी भी धर्म में आस्था नहीं रखते। आज पूरी चौथाई सदी बाद प्राप्त सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि केवल 42 फीसदी ब्रितानियों ने कहा है कि उनकी धार्मिक आस्था है, जबकि 51 फीसदी ने कहा है कि उनका कोई धर्म नहीं है। बीता क्रिसमस ब्रिटेन के इतिहास का पहला अवसर था, जब उसकी बहुसंख्य आबादी ऐसी थी जो किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखती थी। ब्रिटेन के तीन प्रमुख राजनीतिक दलों में से दो का नेतृत्व नास्तिकों के हाथ में है और खुद प्रधानमंत्राी भी स्वीकारते हैं कि उनकी धार्मिक आस्था डांवाडोल रहती है।
मालूम हो कि धर्म के सामाजिक जीवन में धीरे-धीरे हाशिये पर जाने का सिलसिला अकेले ब्रिटेन तक सीमित नहीं है। नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के अध्ययन तो यह अनुमान भी लगाते हैं कि वह दिन दूर नहीं कि धर्म का नामोनिशान मिट जाएगा। विश्वविद्यालय स्थित अमेरिकन फिजिकल सोसायटी ने नौ देशों के अध्ययन पर यह निष्कर्ष निकाला है। ये देश हैं आस्टेज्लिया, कनाडा, चेक गणराज्य, फिनलैण्ड, आयरलैण्ड, नीदरलैण्डस, न्यूजीलेण्ड और स्विट्जरलेंड। नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी की उपरोक्त रिसर्च टीम ने इसे समझने के लिए एक गणितीय मॉडल का निर्माण किया ताकि विभिन्न धर्मावलम्बियों और उसके पीछे अन्तर्निहित सामाजिक प्रेरणाओं की पड़ताल की जा सके। टीम ने इसके लिए विगत एक सौ साल के अन्तराल का इन देशों की जनगणना का विवरण हासिल किया जिसमें धार्मिक प्रतिबद्धताओं का भी उल्लेख था। ‘रिसर्च कारपोरेशन फार साइन्स एडवासमेंट’ के डाक्टर रिचर्ड वीनर के मुताबिक बहुत से आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रों में लोग खुद को धर्म से अलग करते जा रहे हैं। नीदरलेण्ड में जहां ऐसे लोगों की संख्या 40 फीसदी है तो चेक गणराज्य में 60 फीसदी लोगों ने किसी धर्म के प्रति प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है।
अन्त में, अपनी सन्तान को किसी आस्था के साथ नत्थी न करने के माता पिता का आग्रह कभी शेष समाज के दबाव में रक्तरंजित शोकांतिका में भी बदल सकता है, इसे भी ध्यान में रखने की जरूरत है। पिछले दिनों तमिलनाडु के कोईम्बतूर कार्पोरेशन के पास ए फारूक नामक तर्कवादी की हत्या के पीछे यही फौरी कारण बताया जा रहा है, जब इस्लामिस्टों के एक गिरोह ने उसे घर से बुला कर मार डाला। पुलिस के मुताबिक अपनी सन्तान की सालगिरह पर साझा की उसकी एक तस्वीर- जिसमें बच्ची ‘ईश्वर नहीं है’ लिखी तख्ती पकड़ी हुई थी- उसके पिता की बर्बर ढंग से हत्या का सबब बनी। ए फारूक- पेशे से लोहे के कबाड़ के व्यापारी थे, मगर वह सूबे में पेरियार रामस्वामी नायकर के विचारों के वाहक एक संगठन द्रविडार विदुथलाई कझगम के कार्यकर्ता भी थे और समाज में तर्कशीलता का प्रचार करते थे। वह एक वाटसएप ग्रुप का संचालन करते थे, जिसमें तमिलनाडु के अलग अलग इलाकों में फैले 400 से अधिक लोग सम्बद्ध थे, जिनमें अधिकांश मुस्लिम थे, जिसके जरिए वह तर्कशीलता की बातों को लोगों तक पहुंचाते थे।
वैसे बच्चे के धर्म को लेकर जारी चर्चा में हम भारतीय संस्कृति की धूमिल होती जा रही वैज्ञानिक चिन्तन की धारा की झलक भी देख सकते हैं। सभी जानते हैं कि आज से ढाई हजार साल पहले महात्मा बुद्ध ने एक वैचारिक क्रान्ति का आगाज़ किया था। बुद्ध के बारे में यह बात प्रसिद्ध है कि उनके मृत्यु के पहले उनके परमशिष्य आनन्द ने उनसे अन्तिम सन्देश पूछा था। बुद्ध का जवाब था ‘अप्पो दीपम् भव’! अपने दीपक आप बनो। क्या हम अपनी सन्तानों को भी यह कहने का साहस बटोर सकते हैं।

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