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मेयर चुनाव परिणाम से पहले छूटे योगी के पसीने

महान रूसी लेखक लियो टॉलस्टॉय ने वर्षों पूर्व अपनी रचनाओं में यह आशंका जता दी थी कि सियासत में शीर्षस्थ होने के लिए राजनेता कुछ भी कर सकते हैं। यानी ऊपर चढ़ने के लिए उनमें निम्नत्तम स्तर की गिरावट देखी जा सकती है। यदि भारत के संदर्भ में टॉलस्टॉय की इन बातों को परखें तो वह सौ फीसदी खरी उतरेगी। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहे जाने वाले भारत में आज सरेआम लोकतंत्र का चीरहरण हो रहा है, पर किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंग रहा है। यह संकेत देशहित में नहीं है। बेशक, इसका बड़ा खामियाजा देश के लोगों को भुगतना होगा, मेरी इन बातों को कयास मान लेना चाहिए। मूल विषय यह है कि यूपी में नगर निकाय चुनाव हुए थे। इनमें मुख्य रूप से 16 नगर निगम और सैकड़ों नगरपालिकाएं, नगर पंचायत व सभासदों के चुनाव हुए। तीन चरणों में हुए मतदान के बाद 01 दिसम्बर को चुनाव परिणाम आया। रिजल्ट आने के बाद मानो यह प्रतीत हो रहा था कि वर्ष 2014 की मोदी लहर भी फेल हो गई है। थोक में भाजपा उम्मीदवार चुनाव जीते हैं। इस चुनाव की कमान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र पाण्डेय के अलावा मुख्य रूप से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथ में थी। यदि यह कहें कि इस चुनाव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पसीने छुड़ा दिए, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि यह पहला नगर निकाय चुनाव था जब मुख्यमंत्री स्तर के बड़े नेता को अपने उड़न खटोले (हेलीकॉप्टर) से नीचे उतरना पड़ा था। अव्वल ये कि भाजपा नेताओं को छोड़कर किसी को भरोसा नहीं था इस चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होगा क्योंकि नोटबंदी और जीएसटी की तबाही किसी के दिल-ओ-दिमाग से हटा नहीं था।

 

-राजीव रंजन तिवारी

सियासत में ऊंची उड़ान भरने के लिए नेता कितने नीचे तक गिर जाएंगे, इसका अंदाजा लियो टॉलस्टॉय की आशंकाओं से साबित हो रही हैं। वरना, स्थानीय नेताओं द्वारा लड़े जाने वाले इस चुनाव में भला मुख्यमंत्री का क्या काम? लेकिन यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया और प्रदेश की ज्यादातर सीटों पर भाजपा काबिज हो गई। आपको बता दें कि मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही योगी आदित्यनाथ का फोकस विवादित रामजन्म भूमि अयोध्या पर है। हर खास मौके पर उन्होंने अयोध्या को बेहद अहम बनाने का प्रयास किया। दिवाली का मौका आया तो सीएम योगी आदित्यनाथ खुद वहां पहुंच गए। दिवाली समारोह का ऐसा आयोजन कराया गया, जो पहले कभी नहीं हुआ। भगवान राम के लौटने पर जिस अंदाज में दिवाली मनाई गई थी, उसी तर्ज पर अयोध्या नगरी को सजाया गया। योगी आदित्यनाथ लाव-लश्कर के साथ यहां पहुंचे और दिवाली का पर्व मनाया। नगर निकाय चुनाव के लिए योगी आदित्यनाथ जब प्रचार पर निकले तो उन्होंने इसका श्रीगणेश अयोध्या से ही किया। 14 नवंबर को योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या जाकर निकाय चुनाव में जनता से वोट की अपील का आगाज किया। इससे पहले जब योगी आदित्यनाथ ने बतौर मुख्यमंत्री अयोध्या का दौरा किया तो वहां उन्होंसने हनुमानगढ़ी के दर्शन किए और पूजा-अर्चना की। साथ ही योगी ने रामलला के दर्शन भी किए और सरयू नदी के तट पर आचमन के अलावा घाटों का निरीक्षण भी किया। कहा जा रहा है कि अयोध्या पर योगी सरकार का खास ध्यान है। यहां 723.54 लाख रुपये की लागत से राम कथा गैलरी और पार्क निर्माण कराने के साथ-साथ पार्किंग का विकास, अंदरूनी रास्ते और बाउंड्री वाल का निर्माण, फुट ओवर ब्रिज, सोलर लाइट्स, कचरा मैनेजमेंट और पत्थर के बेंच लगाए जाने हैं। 1206.54 लाख रुपये की लागत से बस डिपो व पार्किंग की व्यवस्था होनी है।

आपको बता दें कि तीन चरणों में 22, 26 और 29 नवम्बर को निकाय चुनाव के लिए मतदान हुआ था। इस चुनाव में वोटरों को लुभाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने करीब 40 सभाएं कीं। राजनीति के पुराने जानकार बताते हैं इतिहास में यह पहली बार देखने को मिला कि कोई मुख्यमंत्री स्थानीय निकाय चुनाव के लिए वोट मांग रहा है। चलिए कोई बात नहीं, यहां तक तो ठीक है, लेकिन तीनों चरणों में हुए मतदान के दरम्यान कोई भी चरण एसा नहीं रहा जिसमें यह शिकायत न मिली हो कि सारे वोट कमल छाप यानी भाजपा को ही जा रहे हैं। मतदाताओं का आरोप था कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में हम साईकिल (सपा), हाथ (कांग्रेस), हाथी (बसपा) या निर्दलीय किसी के सामने का बटन दबा रहे हैं तो वोट बत्ती केवल कमल (भाजपा) छाप के सामने वाली जल रही है। इसकी मामले की शिकायत स्थानीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक के चुनाव अधिकारियों से किया गया, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात। निर्वाचन अधिकारियों ने उक्त गंभीर आरोपों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह कोरा अफवाह है। विरोधी दलों के नेता फर्जी आरोप लगा रहे हैं। जबकि इस आरोप में सौ फीसदी सच्चाई थी। 01 दिसम्बर को जब चुनाव परिणाम आया तो स्पष्ट हो गया कि कुछेक स्थानों को छोड़ दें तो ज्यादातर जगहों पर ईवीएम ने कमल ही उगला है। स्वाभाविक है, जब चुनाव आयोग की मुहर लग गई तो भाजपा की जीत पक्की हो गई। इस चुनाव परिणाम को देखकर हर कोई यही कहने को विवश है कि भाजपा की लहर इससे पहले इतनी अधिक कभी नहीं देखी गई। दिलचस्प यह है कि इस लहर की चर्चा के साथ लोग ईवीएम द्वारा कमल उगलने की बात को भी जोड़ना नहीं भूल रहे हैं। जब रिजल्ट सामने आया तब भी वोटरों को यह कहते हुए सुना गया कि ज्यादा वोट तो गैर भाजपा प्रत्याशी को पड़ा था, भाजपा कैसे जीत गई।

नगर निकाय चुनाव से पूर्व यह माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश का नगर निकाय चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए अग्निपरीक्षा की भांति है। यदि इस चुनाव में योगी सफल रहे तो वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की राह को आसान मानी जाएगी। राजनीति के जानकार मानते हैं कि जिस अंदाज में चुनाव जीता जा रहा है, यदि यही प्रक्रिया कायम रही तो 2019 क्या सारे चुनाव ही सिर्फ भाजपा जीतेगी। विपक्ष रहेगा। सबके बावजूद यह बताना जरूरी है कि इस चुनाव में योगी आदित्यनाथ के पसीने छूट गए हैं। उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी है। चूंकि मामला संवैधानिक है, इसलिए इस पर सवाल उठाना कि गलत ढंग से मतदान कराकर चुनाव जीतने की कोशिश की गई, ठीक नहीं है। पर, हां यह कहने में तो साफगोई बरतनी ही होगी कि यदि इसी तरह चलता रहा तो यह देश दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश कहलाने वाली अपनी पदवी को खो बैठेगा। जिसकी पूरी जिम्मेदारी मौजूदा लोकतांत्रिक प्रणाली को संचालित करने वाली स्वायत संस्थाओं और राजनेताओं की होगी। बहरहाल, अब देखना यह है कि लोकतंत्र की मर्यादा की रक्षा के लिए क्या कुछ किया जा रहा है। किया जा भी रहा है या नहीं। यदि किया जा रहा है तो क्या किया जा रहा है। चूंकि लेख की शुरूआत लियो टॉलस्टॉय से की थी इसलिए समापन भी उन्हीं से करना समीचीन होगा। टॉलस्टॉय की बातें कि बड़ी कुर्सी पाने के लिए नेता छोटा से छोटा काम करेंगे। वही हो रहा है।

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