दस्तक-विशेष

लोकमंगल से जुड़ा हठयोग

हृदयनारायण दीक्षित
शोध-बोध की धरती है। यहां के इतिहास में अनेक विलक्षण नायक हैं। वे लोक मंगल के लिए काम करते हैं। सामान्य प्राणियों की तरह अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं लेकिन भूतकाल नहीं होते। वे न होकर भी हमारे बीच होते हैं। अपने विचार और कर्म के कारण। वे वर्तमान को प्रभावित करते हैं। वैसे ही जैसे वे अब भी हमारे बीच हों। बेशक हम उन्हें देख नहीं पाते। वे हमको देखा करते हैं। वे अनुकम्पा करते रहते हैं। गोरक्ष पीठ के ऐसे ही एक महान साधक गंभीरनाथ हैं। हम उन्हें छू नहीं सकते, देख नहीं सकते लेकिन अनुभव कर सकते हैं। गंभीरनाथ ने अनेक सिद्धियां प्रत्यक्ष की। अनेक रहस्य कथाएं चलती हैं। हम कथित वैज्ञानिक युग में हैं। बिना शरीर भ्रमण के तथ्य नहीं मानते। लेकिन ऐसा हुआ है। योग है ही ऐसा विज्ञान। पतंजलि योगसूत्रों में इस विज्ञान की चर्चा है। गंभीरनाथ ने गुरु गोरखनाथ की परंपरा को बढ़ाया था।
गोरख क्षेत्र की इसी परंपरा में योगी आदित्यनाथ हैं। योग ऊर्जा से लबालब लोक कल्याण को अर्पित मुख्यमंत्री सिद्ध के साथ प्रसिद्ध भी हैं। आमजन उन्हें प्यार करते हैं। द्वन्द्व और द्वैत से रहित है उनका व्यक्तित्व। सबका साथ, सबका विकास और लोकमंगल ही उनके कर्मयोग का ध्येय है। लगातार सांसद हैं। मुख्यमंत्री बने तो एक सप्ताह में ही राज्य का रसायन बदल गया। वे उत्तर प्रदेश का सर्वांगपूर्ण विकास चाहते हैं। तीन दिन पहले गंभीरनाथ की स्मृति में गोरखपुर में एक भव्य कार्यक्रम था। मैं भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बना। योगिराज गंभीरनाथ पर एक सुंदर पुस्तक सहित कई पुस्तकों का विमोचन हुआ। पुस्तक में गंभीरनाथ पर योगी आदित्यनाथ का लेख पठनीय है। लिखा है, “गया प्राचीनकाल से अध्यात्म की भूमि रही है। महात्मा बुद्ध ने यहीं सिद्धि प्राप्त कर ज्ञान प्राप्त किया था। साधना की चरमसिद्धि के लिए योगी गंभीरनाथ जी ने भी ‘गया’ को चुना। उन्होंने इसके लिए ‘गया’ के समीपवर्ती ब्रह्मयोनि पर्वत की चोटी पर कपिलधारा को चुना। वे ब्रह्मयोनि आदि ऊंचे पर्वत पर जाकर समाधि में निमग्न हो जाते थे। योगिराज के ही एक शिष्य ने उनकी साधना के लिए कपिलधारा में एक योगगुफा का निर्माण किया। इस गुफा में योगिराज ने 12 वर्षों तक एकान्तिक साधना की। इस अविराम साधना से उन्हें तुरीयातीत अवधूत अवस्था प्राप्त हो गयी। तुरीयातीत अवधूत योगी के लिए इस अवस्था में कुछ भी अलभ्य नहीं रह जाता है।
योगी जी ने आगे लिखा है कि गंभीरनाथ सन् 1901 में गोरखपुर आये। उन्होंने मंदिर की व्यवस्था में अपना योगदान देना प्रारम्भ किया। कुछ समय बाद वे वापस ‘गया’ चले गये। यदा-कदा गोरखपुर आकर व्यवस्था का निरीक्षण करने लगे। सन् 1906 से स्थायी रूप से रहने लगे। उनका गोरखपुर आगमन उसी प्रकार था जैसे बुद्धदेव ने ज्ञान प्राप्ति के उपरांत अपने को लोक-कल्याण के लिए समर्पित कर दिया था। विकास की सर्वोच्च स्थिति में पहुंची अन्तरात्मा के लिए स्वर्ग और मुक्ति की तनिक भी कामना नहीं रहती है। तब उनकी एक ही कामना रहती है कि- मैं लोकहित के लिए बार-बार जन्म लूंगा और बार-बार मरूंगा। योगिराज बाबा गंभीरनाथ ने सन् 1906 से सन् 1917 तक का अपना अधिकांश समय गोरखपुर से लोककल्याण के लिए समर्पित किया। जो भी उनके सान्निध्य में आया, उसका कल्याण हो गया। उनके प्रधान शिष्य बाबा ब्रह्मनाथ जी बाद में सन 1932 से सन् 1935 तक गोरखनाथ मंदिर के श्रीमहंत पद पर विराजमान रहे।”
योगी जी ने लिखा है कि दार्शनिक अक्षय कुमार बनर्जी उनके गृहस्थ भक्तों में थे। हजारों भक्तों का उन्होंने उद्धार किया। राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत दो प्रमुख संतों को योगिराज बाबा गंभीरनाथ का सान्निध्य प्राप्त हुआ था। इनमें से प्रथम महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज थे जो योगिराज बाबा गंभीरनाथ के प्रधान शिष्य बाबा ब्रह्मनाथ से योग दीक्षित थे। नाथ सम्प्रदाय को संगठित करने के साथ ही वे हिन्दू धर्म संस्कृति के ध्वजवाहक, हिन्दुत्वनिष्ठ, राष्ट्रवादी राजनीति के पुरोधा, पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्था महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के संस्थापक हुए तो दूसरे भारत सेवाश्रम संघ के संस्थापक स्वामी प्रणवानंद जी थे, जिन्होंने 1913 में योगिराज बाबा गंभीरनाथ जी से ही योगदीक्षा प्राप्त की। योगिराज बाबा गंभीरनाथ की सिद्धि एवं चमत्कार के अनेक दृष्टान्त हैं।” उन्होंने आनंद प्राप्ति के अध्यात्म मार्ग खोजे।
आनंद इकाई में अनंत की अनुभूति है। इसे मोक्ष कहा गया और ब्रह्म उपलब्धि भी। यही आनंद है। भारतीय दर्शन की कई धाराएं हैं। योग दर्शन अनूठा है। यह दर्शन के साथ विज्ञान भी है। प्रकृति सृष्टि एक अखण्ड इकाई है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसे ‘कासमोस’ कहा है। कार्लसागन की किताब का नाम ‘कासमोस’ है। उन्होंने प्रारम्भ में एक ‘कास्मिक एग’ की कल्पना की। कास्मिक एग का अनुवाद है ब्रह्म-अंड। सागन के अनुसार यही अंड फूटा तो कण तेज रफ्तार भागे। बिंग बैंग सिद्धांत के अनुसार सभी कण तेज रफ्तार भाग रहे हैं। सागन ने लिखा है- जो अब तक हो चुका है और जो आगे होगा सब कास्मिक एग है। कासमोस नया शब्द है। भारत के छन्दस में इसका नाम ब्रह्म है। कास्मिक एग ब्रह्म अंड है। ऋग्वेद में एक देवता हैं अदिति। मंत्र के अनुसार “वे धरती है, आकाश है। माता और पिता हैं। वे और हमारे पुत्र भी हैं।” जो अब तक हो चुका है और जो भविष्य में होगा वह सब अदिति है। ऋग्वेद के पुरुष देवता भी ऐसे ही हैं, “जो अब तक हो चुका वह और जो आगे होगा वह सब पुरुष ही है। आनंद इसी का तत्वबोध आनंद है। ब्रह्म जानकर व्यक्ति ब्रह्म हो जाता है।
श्वेताश्वरार उपनिषद् में यह रुद्र शिव है। द्वितीयों नास्ति। दूसरा है ही नहीं। परम सत्ता ब्रह्म है, शिव है। दो नहीं। यह पूर्ण है। पूर्ण में पूर्ण घटाओ तो भी पूर्ण पूर्ण ही रहता है। अपनी अपनी अनुभूति। भक्ति भी वहीं ले जाती हैं जहां ज्ञान। भक्ति में विश्वास प्रथमा है- बोध परिणाम है। ज्ञान में बोध प्रथमा है और भक्ति परिणाम। लेकिन योग की अन्तर्दृष्टि अनूठी है। बिल्कुल गणित या विज्ञान जैसी। ऋग्वेद से लेकर उपनिषद् तक अद्वैत की धारा है। शंकराचार्य ने इसी अद्वैत को अनुभूत किया था। शंकराचार्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के सिद्ध थे। महादार्शनिक। उन जैसा व्यक्तित्व भारत में ही संभव था। गोरखनाथ उन जैसे अंतर्राष्ट्रीय साधक हुए। शंकराचार्य में तत्व अनुभूति का बोध था। गोरखनाथ की अनुभूति भी उसी तल पर थी लेकिन तबका भारत भिन्न था। तमाम भेद थे। एक ही मार्ग को मानने वाले विभाजित थे। शंकराचार्य के समय बौद्ध दर्शन था तो गोरखनाथ के सामने उससे भिन्न वातावरण था। उनमें शंकराचार्य का अद्वैत था लेकिन अद्वैत को लोक तक पहुंचाने वाली प्रतिभा भी थी। तब नेपाल में महायान शाखा का प्रभाव था। गोरखनाथ के प्रभाव में नेपाल में अद्वैत की धारा बही। उनके समर्थक गोरखे कहलाए। महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर भक्त थे लेकिन निवृतिनाथ के शिष्य थे। माक्र्सवादी विचारक डॉ0 राम विलास शर्मा ने लिखा है “गोरखनाथ के अनुयायियों में मुसलमान भी थे।”
गोरखनाथ का तत्व चिंतन अनूठा है। गोरखवाणी में उल्लेख है “न उसे बस्ती कह सकते हैं और न शून्य। यह भाव और अभाव, सत और अस्त से परे है। उपनिषदें का ब्रह्म ऐसा ही है। गोरखवाणी में आकाशमण्डल है, “आकाश तत्व को सदाशिव जानिए।” ऋग्वेद में आकाश में ही ऋचाएं हैं। देवता भी वही रहते हैं। ऋचाएं जागृतों की कामना करती हैं। यहां जागना योग जागरण है। गोरखनाथ ने कहा है कि- परमतत्व न बाहर है। न भीतर। न निकट। न दूर। सारे संसार में परब्रह्म व्याप्त है। ईशावास्य उपनिषद् में तदैज्जैति तन्नेजेति तद्दूरे तद्वन्तिके कहा गया है। कठोपनिषद् के अग्नि/वायु सर्वव्यापी हैं। अग्निर्थेको/वायुअथैको। गोरखनाथ भी ब्रह्मअग्नि व पवन को ऐसा ही बताते हैं। गोरखनाथ संसार को प्रसन्न और सुखी बना रहे थे, गाया है, “हंसिबा खेलिबा रहिबा रंग/काम क्रोध न करिबा संग। इसी परंपरा में यू0पी0 के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। यू0पी0 के कुण्डली का राजयोग अनूठा है। 22 करोड़ जन को रिद्धि सिद्धि समृद्धि दिलाने का हठयोग।

(लेखक वर्तमान उ.प्र. वि.स. अध्यक्ष हैं) 

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