चार बेटों का बाप

- in उत्तर प्रदेश

अन्तर्राष्ट्रीय फादर्स डे (18 जून) पर विशेष

पंडित हरि ओम शर्मा ‘हरि’

मैं और अमर सिंह बचपन के दोस्त थे। एक ही गांव में पैदा हुए, एक ही मुहल्ले में खेले- कूदे, एक ही गली में गुल्ली-डंडा खेले और एक ही गांव की पाठशाला में पढ़े, शहर आकर एक ही कालेज में भी पढ़े। मतलब यह है कि बचपन से लेकर किशोरावस्था और युवावस्था तक साथ ही रहे, और यह समय कब बीत गया, पता नही न चला। पता तब चला जब दोनों की राहें अलग-अलग होने लगी। हम दोनों के माता-पिता ने बड़े ही गाजे-बाजे के साथ गृहस्थ धर्म में प्रवेश कराकर खुद खाने-कमाने की जिन्मेदारी सौंप दी। जिम्मेदारी कंधो पर आते ही उसे पूरा करने की लालसा में भटकते-भटकते मैं तो लखनऊ आ पहुँचा और कलम घिसने लगा जो आज तक घिस रहा हूँ। मेरे दोस्त अमर सिंह अपने पिता निहाल सिंह के इकलौते बेटे थे और वह चालीस बीघा जमीन के मालिक थे। यही सोचकर उनके पिता ने जमीन जायदाद की जिम्मेदारी मेरे मित्र अमर सिंह को दे दी। अमर सिंह ने भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई, पढ़ा-लिखा होने के बावजूद वह जमकर खेती में काम करता, चारा काटने से लेकर बैलों की सेवा तक खेती के सभी काम करता। सो उनके पिता निहाल सिंह ऐसा सुपुत्र पाकर सचमुच निहाल हो गये।
मैं जब-जब कभी मैं गांव जाता तो उनके पिता अपने बेटे अमर सिंह की तारीफ के पुल बांधते थकते न थे। कहते, देख भाई हरि ओम, नौकरी में क्या रखा है। अब तुम्हीं देखो, नौकरी करते हो, कितनी पगार पाते हो? अगर घर से राशन पानी न ले जाओ तो भूखे मर जाओ लखनऊ में। बात तो बहुत कड़वी कही थी निहाल सिंह चाचा ने, मगर सच कही थी। सो मैं कड़ुआ घूंट पीकर भी जरा भी नहीं तिलमिलाया और उनके पांव छूकर आशीर्वाद लिया और चल दिया अपने दोस्त अमर सिंह से मिलने के लिए। सामने से मुझे आता देखकर अमर सिंह ऐसे खिलखिलाकर हंसा जैसे कालेज के दिनों में हम दोनों किसी शहरी लड़के को देखकर हंसते थे। मुझे देखते ही बोला, भाई हरिओम शक्ल सूरत से तो बिल्कुल शहरी से लगते हो? मैने बीच में ही टेाकते हुए कहा, क्या मतलब शहरी लगते हो? अरे हम शहरी हैं, प्रदेश की राजधानी में रहते हैं, अखबार में काम करते हैं, बड़े-बड़े नेता हमें चाय पर बुलाते हैं। मैने खूब लम्बी चौड़ी छोड़ी थी। जैसे मैं ही प्रदेश का मुख्यमंत्री हूँ। इसके बाद जैसे ही गपशप का दौर शुरू हुआ तो पता चला कि मैं तो अभी एक ही बेटी का बाप बना हूँ, लेकिन मेरे मित्र के घर में दो बेटे उछल-कूदकर रहे हें, उनके राम रखे गये हैं राम सिंह और हरी सिंह। इन दोनों बेटों को देखकर मेरे मित्र का सीना चार इंच और चौड़ा लग रहा था। तभी मेरे मित्र ने सीना फुलाकर कहा था, देखो भाई हरि ओम, दो बेटे तो भगवान ने दे दिये हैं, दो बेटों की और लालसा है, वह इसलिए कि चार बेटों के होते मुझे अन्तिम समय में किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी। चारों बेटों के कंघो पर बैठकर ही अन्तिम यात्रा पूरी करूँगा।
अपने मित्र की भावनाओं को सुनकर कुछ अटपटा सा लगा कि क्या यह वही अमर सिंह है जो कालेज के दिनों में माइक पर लिंगभेद विषय पर लम्बे-चौड़े भाषण दिया करता था? क्या हो गया है इसकी बुद्धि को? ऐसा मैं सोचते-सोचते कब घर आ गया, पता ही न चला। पता तब चला जब मेरी पत्नी ने कहा कि सामान पैक कर लो, कल सुबह की गाड़ी से लखनऊ जाना है। पत्नी के दिशा-निर्देशानुसार सामान पैक कर लिया और दूसरे दिन की गाड़ी से लखनऊ आ गये, फिर इस जीवन चक्र में कई वर्षों तक गांव के दर्शन ही न कर पाये। इस बीच पता चला कि मेरे दोस्त अमर सिंह की मुराद पूरी हो गई है और अब चार बेटों का बाप बन गया है। इधर हमारी झोली में भी ईश्वर ने एक बेटा और दो बेटी और देकर मालामाल कर दिया। सो दोनों ही अपनी-अपनी गृहस्थी में ऐसे रम गये कि एक लम्बे अरसे बाद जब मैं गांव गया था, तो अमर सिंह के चारों बेटे राम सिंह, हरी सिंह, भगत सिंह और बलबीर सिंह जवान हो गये थे और चारों की शादी भी हो गई थी। मेरे मित्र सिर पर पगड़ी बांधकर मजे से चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। मुझे देखकर उनके चेहरे पर ऐसी विजयी मुस्कान झलक रही थी जैसे उन्होंने मुझे युद्ध में पराजित कर दिया हो और उन्होंने चार बेटे पाकर चारो दिशाओं पर जैसे विजय प्राप्त कर ली हो। गले मिलने के बाद बड़े सम्मान से उसने हुक्का मुझे पेश किया तो मैंने सहज भाव से कहा कि भइया मैं हुक्का नहीं पीता हूँ। मेरे दोस्त को यह अपना अपमान लगा और तपाक से बोला, पियोगे कहां से? वहां हुक्का के लिए आग कहां है और फिर आग भी हो तो हुक्का भरेगा कौन? तीन बेटियां थी, वह चली जायेगी अपने-अपने घर, रह गया एक बेटा, सो वह गुलामी (नौकरी) की खातिर तुमसे दूर चला जायेगा। अमर सिंह ने भले ही यह मुझसे मजाक में कही हो किन्तु मुझे अपने दोस्त के यह शब्द जहरीले बाणों से भी अधिक तीखे लगे। किन्तु बचपन का दोस्त था, यह सोचकर मैं खिसियानी हंसी हंसता हुआ अपने घर आ गया और चारपाई पर लेट गया। लेटे-लेटे सोचने लगा कि क्या सचमुच में ही बेटों के बाप अधिक सुख से रहते हैं? और बेटियों के बाप एक गिलास पानी को तरसते हैं? क्या बेटों के बाप को इस अहम की पराकाष्ठा तक जाना चाहिए? ऐसा सोचते-सोचते मैं सो गया।
प्रातः तैयार होकर मैंने गाड़ी पकड़ी और लखनऊ आ गया। गांव में जो थोड़ी सी खेती-बाड़ी थी, उसको भी मैं बेच आया था। सो आना जाना गांव में बहुत कम हो गया था। समय तो मानों पंख लागकर उड़ रहा हो। इस बीच मेरी तीनों बेटियां अपने-अपने घर विदा हो गई। वहां जाकर उन्होंने अपना घर बहुत अच्छी तरह संभाल लिया और में ईश्वर का हर पल गुणगान करता रहता था कि मेरी तीनों बेटियां पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी थी। सो दिन में एक बार फोर पर अवश्य बात कर लेती थी और मेरा इकलौता बेटा भी बंगलोर में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हो गया था और वह भी अपने परिवार की जिम्मेदारी बखूबी उठा रहा था। होली-दीपावली पर बहू-बच्चों के साथ वह अवश्य आता। मैं और मेरी पत्नी रिटायर होकर बड़ी हँसी-खुशी समय व्यतीत कर रहे थे कि एक दिन एक कोना फटा लिफाफा जब पोस्टमैन ने मुझे थमाया तो अनहोनी की आशंका से मैं एक बार सिहर गया। मन अनंकों आशंकाओं से ग्रसित हो गया। काँपते हाथों से कार्ड लेकर पढ़ा तो सचमुच ही मेरी आशंका सच साबित हुई। वह कार्ड मेरे परम मित्र अमर सिंह की तेरहवीं का था जिसमें चारों बेटों की तरफ से आने की अपील की गई थी। उसी समय मुझे अमर सिंह की बातें याद आ गई। कितना सौभाग्यशाली था मेरा दोस्त! बड़े गाजे-बाजे से चारों बेटों के कंघो पर गया होगा। फिर अपनी भी चिन्ता सताने लगी कि तेरा क्या होगा हरिओम! तू तो एक ही बेटे का बाप है और वह भी सैकड़ो मील दूर है। तभी मेरी पत्नी हाथ से कार्ड लेकर पढ़ने लगी, पढ़ते ही बोली, अरे अमर भइया नहीं रहे! इनके यहाँ तो अवश्य जाना पड़ेगा। अरे परसों ही तो तेरहवीं है, चलो चलने की तैयारी करते हैं।
घर की देखभाल की व्यवस्था कर मैं अपनी पत्नी के साथ गांव पहुच गया। वही गांव, वही गलियारे देखकर अपना बचपना याद आ गया। लगा कि मैं अभी 65 वर्ष का नहीं, 21 वर्ष का हूँ और मेरी पत्नी अभी 18 वर्ष की हैं और मैं गौना कराकर ला रहा हूँ। इसी सपने के भंवर जाल में गांव में प्रवेश किया तो देखा कि गांव तो बिल्कुल ही बदल गया है। अब तो बिजली भी आ गई है, किसी-किसी घर में टी0वी0 की आवाज भी सुनाई दे रही है। परचून की दुुकान पर पन्नी में कुछ अटपटा सा देखकर मैं चौक गया कि गावों का सचमुच ही शहरीकरण हो गया है। जो चाचा, ताऊ गलती पर डांटते-फटकारते थे, वही अब बच्चों को बीड़ी सिगरेट, मसाला और पन्नी बेच रहे हैं। ऐसा सोचते-सोचते मैं अपने दोस्त अमर सिंह के घर पहुँच गया। वहां पहुंचकर देखा तो चौपाल पर सन्नाटा देखकर अपने मित्र अमर सिंह की याद में बरबस ही आँखे गीली हो गईं। सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था किन्तु हुक्का की गुड़गुड़ाहट और मेरे मित्र की पगड़ी से सजा चेहरा नदारत था। अब इस सत्य को आत्मसात करने में मन बड़ा विचलित हो रहा था, तभी पीछे से आवाज आई, अरे पंडित चाचा, बापू नहीं रहे! मैने पीछे मुड़कर देखा तो अमर सिंह का ज्येष्ठ पुत्र राम सिंह था। मैने राम सिंह को ढांढस बंधाते हुए अमर सिंह की बीमारी के बारे में पूछा, तो उसने जो कुछ बताया उसे सुनकर तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। राम सिंह ने बताया कि हम चारों भाई अलग-अलग रहने लगे हैं। चारों के बंटवारे में दस-दस बीघा जमीन आई थी। अब बापू ने अपने लिए कुछ जमीन नहीं रखी थी, सो उनकी कौन सेवा करता? कौन रोटी पानी देता? सब अपने-अपने परिवार के बोझ तले दबे जा रहे थे, सो बापू का बोझ कौन संभालता? फिर भी मैं ही उनको अपने घर ले आया। एक दिन मेरी पत्नी ने उनसे कुछ कह दिया , जो बापू को सहन नहीं हुआ, वह एक दिन अचानक गायब हो गये। हम चारो भाइयों ने काफी ढूंढा लेकिन वह कहीं नहीं मिले। थक-हारकर हमने गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी। कई दिनों बाद उनके न रहने की खबर स्थानीय पुलिस ने दी, वह दिल्ली चले गये थे। एक दुर्घटना में उनका देहान्त हो गया। जब तक हम चारों भाई वहां पहुंचे थे, तब तक पुलिस ने लावारिस समझकर उनका अन्तिम संस्कार कर दिया था। हमने उनके फोटो और कपड़ों से पहचान की थी।
यह सुनकर बरबस ही मेरे मुंह से निकल गया, चार बेटो का बाप, बेचारा अमर सिंह। पता नहीं, अभी कितने ऐसे और अमर सिंह है जो चार बेटों के बाप बनने पर गर्व से समाज में अत्याचार, अनाचार और व्यभिचार करते हैं। कम से कम मेरे दोस्त ने तो ऐसा कोई गलत काम नहीं किया था। बस उसकी तमन्ना तो अपने चारों बेटों के कंधो पर अन्तिम यात्रा करने की थी। सो वह भी पूरी न हुई। चार बेटों के बाप को भी पुलिस को लावारिस समझकर क्रिया कर्म करना पड़ा। तभी मुझे सहसा भाभी रामवती की याद आई। सो मैं पूछ बैठा कि भाभी कहां है? तो राम सिंह ने बताया कि बंटवारे के समय हम चारों भाइयों में झगड़ा हो गया था। छोटे भाई ने माँ के सामने ही बापू (पिता) पर हाथ उठा दिया था, सो वह कुपित होकर अपने छोटे भाई के पास चली गईं। हमारे छोटे मामाजी मुंबई में रहते हैं, मामा व मामी दोनों नौकरी करते हैं, सो माँ को उनकी जरूरत थी, वह लिवा ले गये। कार्ड भेज दिया है, खबर आ गई है बस आते ही होंगे। इतना कहकर राम सिंह रोने लगा, तभी मुझे अपनी माँ की एक कहावत बहुत याद आई। मेरी माँ अक्सर कहा करती थी कि ‘‘जीवन कन्या पूछी ने बात, मरे लगाये अपने साथ’ अर्थात जीवित रहने पर तो उनकी कोई इज्जत की नहीं और मरने पर घड़ियाली आँसू बहा रहे हैं।

 

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