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दस्तक-विशेष

अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष फीचर्ड साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ: अयोध्या पीछे छूट चुकी थी, जनशून्य क्षेत्र आरम्भ हो चुका था। कैकेयी इस सत्य को जानती थीं कि जब कोई राज्य, राजा विहीन होता है तो असामाजिक ...
Comments Off on रामराज्य : आशुतोष राणा की कलम से..{.भाग_४}
अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष फीचर्ड साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ: वे अपने महल के विशाल कक्ष में बेचैनी से चहल क़दमी कर रहे थे, मृत्यु के मुख पर खड़े होने के बाद भी जो अपनी बाँसुरी से ...
Comments Off on वासुदेव_कृष्ण : आशुतोष राणा की कलम से.. {भाग_१}
अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ : कंस ने लगभग डाँटते हुए कहा- मुझे बहलाओ मत कृष्ण। मैं गोकुल की गोपी नहीं हूँ, जो तुम्हारे बोले गए प्रत्येक शब्द को सत्य मान लूँ। ...
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अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ : कृष्ण अपने हृदय की आत्मीयता को कंस पर उड़ेलते हुए बोले- मुक्त होने के लिए रिक्त होना पड़ता है मामा। कृष्ण एक ऐसा रिक्त पात्र है ...
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अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ : कृष्ण, मेरी माँ पवनरेखा अनिंद्य सुंदरी थी, अपने पति उग्रसेन के प्रति पूर्णतः समर्पित। किंतु किसी भी स्त्री के लिए सम्बंध से अधिक महत्वपूर्ण सम्मान होता ...
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आशुतोष राणा दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ: मेरा अनुभव है कृष्ण, कि #दुर्भाग्य व्यक्ति को #अपने_पास_बुलाता_है, किंतु #सौभाग्य व्यक्ति तक #स्वयं ही पहुँच जाता है। कंस मधुर हास्य से हँसते हुए बोला- देखो ना, ...
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अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

स्तम्भ : मेरी माँ पवनरेखा जब अपने पितृगृह पहुँची तब वह अपने पति से विरह और हृदय की वेदना से बुरी तरह प्रभावित थी। मन की शांति के ...
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अद्धयात्म दस्तक-विशेष फीचर्ड साहित्य स्तम्भ

अध्यात्म : भगवान् को प्राप्त करने का अभियान भगवद्जन के लिए जितना सरल और सरस है विषयी व्यक्ति के लिए उतना ही कठिन और नीरस है। भगवान् कोई आकार ...
Comments Off on संसार भगवान की छाया, भगवान मिल जाए तो छाया के लिए प्रयास करने की क्या जरूरत
अद्धयात्म आशुतोष राणा दस्तक-विशेष फीचर्ड स्तम्भ

स्तम्भ : काम का ज्वर उतरते ही पवनरेखा की देह पर आरूढ़ उग्रसेन ने भी अपनी दृष्टि की कोर से प्रकोष्ठ के द्वार पर खड़ी उस पुरुष आकृति ...
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अद्धयात्म दस्तक-विशेष फीचर्ड साहित्य

अध्यात्म : संसार में हाथ, दो पैर वाले जीवों की भरमार है। सामान्यतया उन्हें ‘मनुष्य’ कहते है। लेकिन ‘मनुष्य’ ये सब-के-सब होते नहीं। दो हाथ, दो पैर तो ...
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