Saturday, August 18, 2018 - 5:38 AM
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साहित्य

साहित्य स्तम्भ

उपनिषद् पूर्वाग्रह मुक्त हैं। इनमें पहले से बने बनाए विचारों का गहन विवेचन है। अंधविश्वासी कर्मकाण्ड का विरोध है। ये जिज्ञासा के जन्म और दर्शन के आदि स्रोत ...
Comments Off on भारतीय दर्शन के मूल स्रोत हैं उपनिषद्
साहित्य स्तम्भ

पृथ्वी व्यथित है। इसके अंगभूत जल, वायु, वनस्पति और सभी प्राणी आधुनिक जीवनशैली के हमले के शिकार हैं। पृथ्वी असाधारण संरचना है। “ऋग्वेद के अनुसार वह पर्वतों का ...
Comments Off on व्यथित है पृथ्वी : हृदयनारायण दीक्षित
साहित्य स्तम्भ

  पिछले कुछ वर्षों से सोशल मीडिया तेजी से पूरे देश में क्रांति की तरह फैल रहा है,सुदूर प्रान्तों में रह रहे लोगों से सम्पर्क के साथ साथ ...
Comments Off on अभिशाप बनते जा रहे हैं सोशल मीडिया पर प्रचलित अफवाह
साहित्य

प्राचीन उज्जैन में बड़े प्रतापी राजा हुए। राजा भर्तृहरि अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर मोहित थे और वे उस पर अत्यंत विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में ...
Comments Off on अपनी सुंदर पत्नी से आहत होकर बैरागी बने राजा भर्तृहरि
साहित्य

राजकुमारी मल्लिनाथ जैनों की उन्नीसवीं तीर्थंकर मानी जाती हैं। सुंदर होने के साथ वह विदुषी भी थीं। उनके सौंदर्य पर मुग्ध होकर उनसे विवाह के लिए राजकुमारों के ...
Comments Off on सोने की मूर्ति से निकली दुर्गंध, जैन भिक्षु बन गये कई राजा
दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

आशुतोष राणा वे पूरे संसार के लिए आदरणीय होना चाहते थे किंतु ये बेहद मुश्किल काम था, तो भाईसाहब ने इसका एक तोड़ निकाला और कोर्ट में ऐफिडेविट ...
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दस्तक-विशेष साहित्य स्तम्भ

हृदयनारायण दीक्षित अभिव्यक्ति हरेक व्यक्ति की स्वाभाविक अभिलाषा है। हम स्वयं को भिन्न-भिन्न आयामों में प्रकट करते हैं। अपने बाल काढ़ने का ढंग, मूंछों को छोटी, बड़ी या ...
Comments Off on सोशल मीडिया में सत्य, शिव और सुंदर
दस्तक-विशेष शख्सियत साहित्य स्तम्भ

आदरणीया उषा वर्मा जी ब्रिटेन में बसी भारतीय मूल की जानी-मानी साहित्यकार और प्रतिष्ठित भाषा-साहित्य की शिक्षिका हैं। भारत में कुछ वर्ष भागलपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन करने के ...
Comments Off on मातृभूमि की तरफ़ वापसी का अब प्रश्न ही नहीं उठता
दस्तक-विशेष साहित्य

शब्द रूठे हैं अर्थ भूखे हैं आत्मा सोई है परमात्मा खोया है मन मटमैला है तन पथरीला है अधर सूखा है अम्बर रूठा है लहरें लुप्त हैं तरंगें ...
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दस्तक-विशेष साहित्य

अड़े हैं तो मंजिल की जिद में अड़े हैं बहुत छोड़कर ही हम आगे बढ़े हैं। अदब से उठाना ज़रा उन दियों को अमावस में जो तीरगी से ...
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